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Supreme Court: 'संविधान सभा मौजूद नहीं तो अनुच्छेद 370 को रद्द करने की सिफारिश कौन कर सकता है?', कोर्ट ने पूछा
Wed, 02 Aug 2023 11:48 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 02 Aug 2023 11:48 AM IST
सार
भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ पांच सदस्यीय बेंच की अध्यक्षता कर रहे हैं। बेंच में मुख्य न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बीआई गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत शामिल हैं।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के विशेष दर्जे को निरस्त करने के खिलाफ लगाई गई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई शुरू हो गई है। पांच अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाई थी। सरकार के इस कदम के खिलाफ कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर हुईं, जिस पर पांच सदस्यीय संविधान पीठ बुधवार से सुनवाई शुरू कर दी।
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जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने की सिफारिश कौन कर सकता है, जब वहां कोई संविधान सभा मौजूद ही नहीं है? कोर्ट ने यह सवाल उन याचिकाकर्ताओं से पूछा, जिन्होंने पूर्ववर्ती राज्य को विशेष दर्जा देने वाले संवैधानिक प्रावधान को निरस्त किए जाने को चुनौती दी है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ में न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत भी शामिल हैं।
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कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के मुख्य वकील वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से पूछा कि एक प्रावधान जिसका विशेष रूप से संविधान में एक अस्थायी प्रावधान के रूप में उल्लेख किया गया था, वह 1957 में जम्मू कश्मीर संविधान सभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद स्थायी कैसे हो सकता है? शीर्ष कोर्ट ने अनुच्छेद 370 के प्रावधान-3 का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि इस अनुच्छेद के पूर्ववर्ती प्रावधानों में कुछ भी होने के बावजूद राष्ट्रपति सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा यह घोषणा कर सकते हैं कि यह अनुच्छेद लागू नहीं होगा।
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प्रधान न्यायाधीश ने सिब्बल से पूछा कि क्या होता है जब संविधान सभा का कार्यकाल समाप्त हो जाता है? किसी भी संविधान सभा का कार्यकाल अनिश्चित नहीं हो सकता है। अनुच्छेद 370 के खंड (3) का प्रावधान राज्य की संविधान सभा की सिफारिश को बताता है। यह कहता है कि राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचना जारी किए जाने से पहले संविधान सभा की सिफारिश आवश्यक है, लेकिन सवाल यह है कि जब संविधान सभा का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा तो क्या होगा?
सिब्बल ने जवाब में कहा कि उनका पूरा मामला इस बारे में है कि राष्ट्रपति संविधान सभा की सिफारिश के बिना अनुच्छेद 370 को रद्द करने के लिए कोई अधिसूचना जारी नहीं कर सकते। इस पर जस्टिस गवई ने पूछा कि क्या यह तर्क दिया जा रहा है कि 1957 के बाद अनुच्छेद 370 के बारे में कुछ नहीं किया जा सकता था, जब जम्मू कश्मीर संविधान सभा का कार्यकाल समाप्त हो गया था।
याचिकाकर्ता अकबर लोन की ओर से बहस की शुरुआत करते हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि केंद्र सरकार ने एक राजनीतिक अधिनियम के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया। सिब्बल ने कहा कि किसी सांविधानिक प्रक्रिया के माध्यम से नहीं बल्कि एक राजनीतिक अधिनियम के माध्यम यह घोषणा की गई कि इसे (अनुच्छेद 370) खिड़की से बाहर फेंक दिया गया है। ऐसा राजनीतिक कार्य संसद द्वारा नहीं किया जा सकता है। ऐसा निर्णय नहीं लिया जा सकता।
दो दिन छोड़कर हर दिन सुनवाई
भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ पांच सदस्यीय बेंच की अध्यक्षता कर रहे हैं। बेंच में मुख्य न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बीआई गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत शामिल हैं। बता दें सोमवार और शुक्रवार छोड़कर रोजाना मामले की सुनवाई की जाएगी। सोमवार और शुक्रवार को सिर्फ नई याचिकाओं की सुनवाई होती है न कि नियमित मामलों की। बेंच ने 11 जुलाई को विभिन्न पक्षों द्वारा लिखित प्रस्तुतियां और सुविधा संकलन दाखिल करने की समय सीमा 27 जुलाई तय की थी।