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एससी-एसटी कर्मचारियों के लिए अच्छी खबर, फिलहाल जारी रहेगा प्रमोशन में आरक्षण
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 05 Jun 2018 01:07 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कानून के मुताबिक सरकारी नौकरी में प्रमोशन में आरक्षण जारी रखने की अनुमति दी है जब तक इस मुद्दे पर संवैधानिक पीठ में सुनवाई पूरी नहीं हो जाती।
हालांकि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर फैसला दिया था कि पांच जजों की संविधान पीठ मामले की सुनवाई करेगी। इससे पहले विभिन्न हाईकोर्ट ने नौकरी में पदोन्नति में आरक्षण को रद्द करने का आदेश दिया था। क्योंकि उनके अपर्याप्त प्रतिनिधत्व के बारे में आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
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जिसके बाद कई राज्य सरकारों ने हाईकोर्ट के पदोन्नति में आरक्षण रद्द करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। राज्य सरकारों ने दलील दी है कि जब राष्ट्रपति ने अधिसूचना के जरिए अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के पिछड़ेपन को निर्धारित किया है, तो इसके बाद पिछड़ेपन को आगे निर्धारित नहीं किया जा सकता।
एससी/एसटी संघों और राज्य सरकारों ने दलील दी कि क्रीमी लेयर को बाहर रखने का नियम एससी/एसटी पर लागू नहीं होता और सरकारी नौकरी में प्रमोशन दिया जाना चाहिए क्योंकि यह संवैधानिक जरूरत है। लेकिन हाईकोर्ट के आदेशों का समर्थन करने वालों का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के नागराज फैसले के मुताबिक पदोन्नति में आरक्षण के लिए यह साबित करना होगा कि सेवाओं में एससी/एसटी का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है और इसके लिए आंकड़ा मुहैया कराना होगा।
अब सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संवैधानिक पीठ को यह तय करना है कि एम नागराज के फैसले पर दोबारा विचार किए जाने की जरूरत है या नहीं। साल 2006 में नागराज फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बिना मात्रात्मक आंकड़ों के एससी/एसटी को पदोन्नति में आरक्षण नहीं दिया जा सकता।
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Supreme Court allows the Union Government to provide reservation in promotion for SC/ST employee as per law, till the issue is disposed off by the constitution bench pic.twitter.com/SJn0oz5c9L
— ANI (@ANI) 5 June 2018विज्ञापन
हालांकि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर फैसला दिया था कि पांच जजों की संविधान पीठ मामले की सुनवाई करेगी। इससे पहले विभिन्न हाईकोर्ट ने नौकरी में पदोन्नति में आरक्षण को रद्द करने का आदेश दिया था। क्योंकि उनके अपर्याप्त प्रतिनिधत्व के बारे में आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
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जिसके बाद कई राज्य सरकारों ने हाईकोर्ट के पदोन्नति में आरक्षण रद्द करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। राज्य सरकारों ने दलील दी है कि जब राष्ट्रपति ने अधिसूचना के जरिए अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के पिछड़ेपन को निर्धारित किया है, तो इसके बाद पिछड़ेपन को आगे निर्धारित नहीं किया जा सकता।
एससी/एसटी संघों और राज्य सरकारों ने दलील दी कि क्रीमी लेयर को बाहर रखने का नियम एससी/एसटी पर लागू नहीं होता और सरकारी नौकरी में प्रमोशन दिया जाना चाहिए क्योंकि यह संवैधानिक जरूरत है। लेकिन हाईकोर्ट के आदेशों का समर्थन करने वालों का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के नागराज फैसले के मुताबिक पदोन्नति में आरक्षण के लिए यह साबित करना होगा कि सेवाओं में एससी/एसटी का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है और इसके लिए आंकड़ा मुहैया कराना होगा।
अब सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संवैधानिक पीठ को यह तय करना है कि एम नागराज के फैसले पर दोबारा विचार किए जाने की जरूरत है या नहीं। साल 2006 में नागराज फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बिना मात्रात्मक आंकड़ों के एससी/एसटी को पदोन्नति में आरक्षण नहीं दिया जा सकता।