'सुप्रीम फटकार': जजों की नियुक्ति की सिफारिश लौटाने पर केंद्र की फिर कड़ी आलोचना, कह दी बड़ी बात
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सख्त नसीहत दी। यह भी कहा कि संसद को कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन बनाए गए कानून अदालत की जांच के दायरे में आते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि इस अदालत द्वारा निर्धारित कानून का पालन किया जाए, अन्यथा लोग उस कानून का पालन करेंगे, जो उन्हें लगता है कि सही है।
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न अदालतों में जजों की नियुक्ति की सिफारिश लौटाने को लेकर केंद्र को फिर फटकार लगाई है। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि सरकार के पास दूसरी बार भेजे गए नामों को वापस भेजना उसके पहले के निर्देश का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सख्त नसीहत दी। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून (NJAC Act) को उसके द्वारा रद्द किए जाने का जिक्र किए बगैर शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि संसद को कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन बनाए गए कानून अदालत की जांच के दायरे में आते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि इस अदालत द्वारा निर्धारित कानून का पालन किया जाए, अन्यथा लोग उस कानून का पालन करेंगे, जो उन्हें लगता है कि सही है। बता दें, जजों की नियुक्ति की फाइल सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम को वापस भेजने को लेकर केंद्र सरकार व शीर्ष कोर्ट के बीच तकरार चल रही है।
Supreme Court again criticises the Centre on the issue relating to judicial appointments. Court observes sending back a second time reiterated names is a breach of its earlier direction.
विज्ञापन विज्ञापन— ANI (@ANI) December 8, 2022
जजों की नियुक्ति की 20 फाइलें लौटाईं
दरअसल, शीर्ष द्वारा एनजेएसी कानून रद्द किए जाने और कॉलेजियम के माध्यम से उच्च अदालतों में जजों की नियुक्ति के मुद्दे पर केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच खींचतान लंबे समय से जारी है। नवंबर में सरकार ने कॉलेजियम की जजों की नियुक्ति की 20 फाइलें लौटाने की खबर आई थी। यह भी कहा था कि कॉलेजियम इन नामों पर फिर से विचार करे। इन फाइलों में अधिवक्ता सौरभ कृपाल की नियुक्ति की फाइल भी शामिल है। गौरतलब है कि उन्होंने अपने समलैंगिक होने के बारे में खुलकर बात की थी।
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया से जुड़े सूत्रों ने बताया कि सरकार ने 25 नवंबर को कॉलेजियम को फाइलें वापस भेजी थीं। इतना ही नहीं अनुशंसित नामों के बारे में कड़ी आपत्ति भी जताई थी। इन 20 फाइलों में से 11 नई फाइलें थी और नौ सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा दोबारा भेजी गई थीं।
कॉलेजियम की सिफारिश के बावजूद जजों की नियुक्ति में देरी के मसले पर नवंबर में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कॉलेजियम द्वारा प्रस्तावित न्यायाधीशों की नियुक्ति पर विचार करने में केंद्र द्वारा महीनों की देरी हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार इस बात से नाखुश है कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) ने संवैधानिक मस्टर पास नहीं किया।
रिजिजू ने कहा थी यह बात
केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू ने कॉलेजियम की सिफारिश को लेकर कहा था कि कॉलेजियम नहीं कह सकता कि सरकार उसकी तरफ से भेजा हर नाम तुरंत मंजूर करे। फिर तो उन्हें खुद नियुक्ति कर लेनी चाहिए।
कॉलेजियम सिस्टम को पटरी से न उतरने दें
इससे पहले दो दिसंबर को भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कॉलेजियम सिस्टम अच्छी तरह से काम कर रहा है, उसे पटरी से न उतरने दें। कॉलेजियम के पहले के निर्णयों के बारे में टिप्पणी करना सेवानिवृत्त जजों के लिए फैशन बन गया है, जबकि कॉलेजियम सबसे पारदर्शी संस्थान है। ऐसे में हम पूर्व जजों के बयान पर टिप्पणी नहीं करना चाहते। जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सी टी रविकुमार की पीठ ने कहा था कि कॉलेजियम दूसरों के निजी जीवन में अत्यधिक रुचि रखने वाले किसी व्यक्ति के आधार पर काम नहीं करता है। हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और कॉलेजियम को उसके कर्तव्यों के अनुसार काम करने देना चाहिए। हम सबसे पारदर्शी संस्थान हैं।