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कश्मीरियों से जुड़े अनुच्छेद 35-ए की सुनवाई स्थगित, जानिए इसके बारे में सबकुछ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 06 Aug 2018 01:59 PM IST
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Article 35-A
सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू कश्मीर के लोगों को विशेष अधिकार प्रदान करने वाले अनुच्छेद 35-ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सोमवार को सुनवाई स्थगित कर दी । न्यायालय ने कहा कि उसकी तीन सदस्यीय पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है और वह इस बात पर विचार करेगी कि क्या इस मामले को वृहद पीठ के पास भेजना चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायाधीश ए एम खानविलकर की एक पीठ ने कहा कि मामले की सुनवाई तीन सदस्यीय एक पीठ को करनी है और इस पीठ के एक सदस्य न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ उपस्थित नहीं हैं ।
अब इसकी सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय 27 अगस्त को शुरू होने वाले सप्ताह के लिए मामले को सूचीबद्ध किया है। प्रधान न्यायाधीश मिश्रा ने उल्लेख किया कि उच्चतम न्यायालय को देखना होगा कि क्या अनुच्छेद 35 ए संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ जाता है।
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साल 1954 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा संविधान में शामिल किया गया अनुच्छेद 35ए जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासियों को विशेष अधिकार और विशेष दर्जा देता है । इसके तहत राज्य से बाहर के किसी भी व्यक्ति से शादी करने वाली प्रदेश की युवतियों को संपत्ति में अधिकार नहीं होगा। इस प्रावधान के कारण जिन महिलाओं का संपत्ति से अधिकार समाप्त कर दिया गया है और उनके वारिसों को भी उसमें अधिकार नहीं दिया गया है।
सीजेआई ने कहा, 'एक बार आप अनुच्छेद 35 ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हैं तो इसे पहले संवैधानिक पीठ के पास भेजना होगा। तीन सदस्यीय पीठ इसका फैसला करेगी। तीन सदस्यीय पीठ इस मामले को देख रही है। '
उन्होंनें कहा, 'तीन सदस्यीय पीठ सुनवाई कर रही है कि क्या अनुच्छेद 35 ए के मामले को संवैधानिक पीठ के पास भेजा जाए।'
अनुच्छेद 35-ए की वैधता को चुनौती वाली याचिका पर आज की सुनवाई रोकने की मांग को लेकर जम्मू कश्मीर सरकार तीन अगस्त को उच्चतम न्यायालय गयी थी और उसने इसके लिए आगामी स्थानीय निकायों के चुनाव का हवाला दिया था।
आज सुनवाई के दौरान अनुच्छेद 35-ए की वैधता को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने राज्य सरकार द्वारा मामले की सुनवाई स्थगित करने की मांग का विरोध किया। जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति बनाए रखने की मांग को लेकर कई लोगों और नागरिक समाज समूहों द्वारा अनुच्छेद 35-ए के समर्थन में कई अन्य आवेदन दायर किये जा चुके हैं।
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प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायाधीश ए एम खानविलकर की एक पीठ ने कहा कि मामले की सुनवाई तीन सदस्यीय एक पीठ को करनी है और इस पीठ के एक सदस्य न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ उपस्थित नहीं हैं ।
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अब इसकी सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय 27 अगस्त को शुरू होने वाले सप्ताह के लिए मामले को सूचीबद्ध किया है। प्रधान न्यायाधीश मिश्रा ने उल्लेख किया कि उच्चतम न्यायालय को देखना होगा कि क्या अनुच्छेद 35 ए संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ जाता है।
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साल 1954 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा संविधान में शामिल किया गया अनुच्छेद 35ए जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासियों को विशेष अधिकार और विशेष दर्जा देता है । इसके तहत राज्य से बाहर के किसी भी व्यक्ति से शादी करने वाली प्रदेश की युवतियों को संपत्ति में अधिकार नहीं होगा। इस प्रावधान के कारण जिन महिलाओं का संपत्ति से अधिकार समाप्त कर दिया गया है और उनके वारिसों को भी उसमें अधिकार नहीं दिया गया है।
सीजेआई ने कहा, 'एक बार आप अनुच्छेद 35 ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हैं तो इसे पहले संवैधानिक पीठ के पास भेजना होगा। तीन सदस्यीय पीठ इसका फैसला करेगी। तीन सदस्यीय पीठ इस मामले को देख रही है। '
उन्होंनें कहा, 'तीन सदस्यीय पीठ सुनवाई कर रही है कि क्या अनुच्छेद 35 ए के मामले को संवैधानिक पीठ के पास भेजा जाए।'
अनुच्छेद 35-ए की वैधता को चुनौती वाली याचिका पर आज की सुनवाई रोकने की मांग को लेकर जम्मू कश्मीर सरकार तीन अगस्त को उच्चतम न्यायालय गयी थी और उसने इसके लिए आगामी स्थानीय निकायों के चुनाव का हवाला दिया था।
आज सुनवाई के दौरान अनुच्छेद 35-ए की वैधता को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने राज्य सरकार द्वारा मामले की सुनवाई स्थगित करने की मांग का विरोध किया। जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति बनाए रखने की मांग को लेकर कई लोगों और नागरिक समाज समूहों द्वारा अनुच्छेद 35-ए के समर्थन में कई अन्य आवेदन दायर किये जा चुके हैं।
क्या है अनुच्छेद 35-ए
Article 35-A
यह है 35-ए में
-जम्मू एवं कश्मीर के बाहर का व्यक्ति राज्य में अचल संपत्ति नहीं खरीद सकता।
-दूसरे राज्य का कोई भी व्यक्ति यहां का नागरिक नहीं बन सकता।
-राज्य की लड़की किसी बाहरी लड़के से शादी करती है तो उसके सारे अधिकार समाप्त हो जाएंगे।
-35-ए के कारण ही पश्चिम पाकिस्तान से आए शरणार्थी अब भी राज्य के मौलिक अधिकार तथा अपनी पहचान से वंचित हैं।
-जम्मू एवं कश्मीर में रह रहे लोग जिनके पास स्थायी निवास प्रमाणपत्र नहीं है, वे लोकसभा चुनाव में तो वोट दे सकते हैं लेकिन स्थानीय निकाय चुनाव में वोट नहीं दे सकते हैं।
-यहां का नागरिक केवल वह ही माना जाएगा जो 14 मई 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या उससे पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो या इससे पहले या इस दौरान यहां पहले ही संपत्ति हासिल कर रखी हो।
इसलिए है अनुच्छेद 35ए पर इतना विवाद
देश में संविधान 26 जनवरी 1951 को लागू हुआ। इसमें अनुच्छेद 370 भी था जो जम्मू कश्मीर को एक विशेष दर्जा देता था। लेकिन 1954 में इसी अनुच्छेद में एक उपबंध के रूप में अनुच्छेद 35ए जोड़ दिया गया। यह मूल संविधान का हिस्सा ही नहीं है बल्कि परिशिष्ट में रखा गया है। इसीलिए कई सालों तक इसका पता ही नहीं चला। संस्था की वरिष्ठ सदस्य आभा खन्ना के अनुसार अनुच्छेद 35ए को न तो लोकसभा और न ही राज्यसभा में कभी पेश किया। इसे सिर्फ राष्ट्रपति के आदेश (प्रेसिडेंशियल आर्डर) के जरिए अनुच्छेद 370 में जोड़ दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 368 के मुताबिक, चूंकि यह संसद से पारित नहीं हुआ, इसलिए यह एक अध्यादेश की तरह छह महीने से ज्यादा लागू नहीं रह सकता।
-जम्मू एवं कश्मीर के बाहर का व्यक्ति राज्य में अचल संपत्ति नहीं खरीद सकता।
-दूसरे राज्य का कोई भी व्यक्ति यहां का नागरिक नहीं बन सकता।
-राज्य की लड़की किसी बाहरी लड़के से शादी करती है तो उसके सारे अधिकार समाप्त हो जाएंगे।
-35-ए के कारण ही पश्चिम पाकिस्तान से आए शरणार्थी अब भी राज्य के मौलिक अधिकार तथा अपनी पहचान से वंचित हैं।
-जम्मू एवं कश्मीर में रह रहे लोग जिनके पास स्थायी निवास प्रमाणपत्र नहीं है, वे लोकसभा चुनाव में तो वोट दे सकते हैं लेकिन स्थानीय निकाय चुनाव में वोट नहीं दे सकते हैं।
-यहां का नागरिक केवल वह ही माना जाएगा जो 14 मई 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या उससे पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो या इससे पहले या इस दौरान यहां पहले ही संपत्ति हासिल कर रखी हो।
इसलिए है अनुच्छेद 35ए पर इतना विवाद
देश में संविधान 26 जनवरी 1951 को लागू हुआ। इसमें अनुच्छेद 370 भी था जो जम्मू कश्मीर को एक विशेष दर्जा देता था। लेकिन 1954 में इसी अनुच्छेद में एक उपबंध के रूप में अनुच्छेद 35ए जोड़ दिया गया। यह मूल संविधान का हिस्सा ही नहीं है बल्कि परिशिष्ट में रखा गया है। इसीलिए कई सालों तक इसका पता ही नहीं चला। संस्था की वरिष्ठ सदस्य आभा खन्ना के अनुसार अनुच्छेद 35ए को न तो लोकसभा और न ही राज्यसभा में कभी पेश किया। इसे सिर्फ राष्ट्रपति के आदेश (प्रेसिडेंशियल आर्डर) के जरिए अनुच्छेद 370 में जोड़ दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 368 के मुताबिक, चूंकि यह संसद से पारित नहीं हुआ, इसलिए यह एक अध्यादेश की तरह छह महीने से ज्यादा लागू नहीं रह सकता।