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सुप्रीम कोर्ट: 'ठोस सबूत के बिना सिर्फ अनैतिकता दोषसिद्धि का आधार नहीं'; दुष्कर्म मामले में 10 साल की सजा रद्द

Fri, 25 Sep 2026 09:46 PM IST
शिवम गर्ग पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: शिवम गर्ग Updated Fri, 25 Sep 2026 09:46 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म मामले में 10 साल की सजा पाए व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि सिर्फ किसी कृत्य को अनैतिक मान लेना दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने कहा कि आरोप साबित करने के लिए विश्वसनीय और ठोस सबूत जरूरी हैं।

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Supreme Court Acquits Man Says Immorality Alone Cannot Justify Conviction Without Credible Evidence
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए 10 साल की सजा पाए एक व्यक्ति को बरी कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी कृत्य का अनैतिक या अनुचित होना अपने आप में दोषसिद्धि का आधार नहीं हो सकता, जब तक आरोप को साबित करने के लिए विश्वसनीय और निर्णायक सबूत मौजूद न हों।

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न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंद्रकुर की पीठ ने कहा कि किसी आपराधिक आरोप में दोषसिद्धि अनुमान या नैतिक मूल्यांकन के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। 
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'नैतिकता के आधार पर नहीं, सबूत के आधार पर हो दोषसिद्धि'
पीठ ने अपने फैसले में जोर दिया कि आपराधिक मामले में आरोपों को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित किया जाना जरूरी है। केवल किसी आचरण को अनैतिक मान लेना दोषसिद्धि का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए आरोपी को IPC की धारा 376 के तहत लगाए गए आरोप से बरी कर दिया।
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पीड़िता के बयान को बताया विरोधाभासों से भरा
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में कथित पीड़िता के बयान का विश्लेषण करते हुए उसे 'विश्वसनीय नहीं' माना। पीठ ने कहा कि उसके बयान में कई विरोधाभास थे और एक ही बयान को एक आरोप के लिए खारिज तथा दूसरे आरोप के लिए स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी गवाह की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय और बेदाग है, तो उसे समग्र रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए। लेकिन एक ही बयान के अलग-अलग हिस्सों को अपनी सुविधा के अनुसार स्वीकार या अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

10 साल की सजा के खिलाफ दाखिल की थी अपील
यह मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सितंबर 2013 के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। हाईकोर्ट ने जून 2012 में लुधियाना की ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखा था। ट्रायल कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366 के तहत आरोपी को बरी कर दिया था, लेकिन धारा 376 के तहत दुष्कर्म के आरोप में दोषी ठहराते हुए 10 साल की सजा सुनाई थी। धारा 366 किसी महिला को शादी के लिए मजबूर करने आदि के उद्देश्य से अपहरण या बहला-फुसलाकर ले जाने से संबंधित थी।

'बयान का एक हिस्सा स्वीकार, दूसरा खारिज नहीं कर सकते'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए उसी बयान को धारा 366 के आरोप के लिए आंशिक रूप से खारिज और धारा 376 के आरोप को साबित करने के लिए आंशिक रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता। पीठ ने निचली अदालत की उस दलील को गलत बताया, जिसके आधार पर दुष्कर्म के आरोप में दोषसिद्धि की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने भी उसी तर्क को स्वीकार करके गलती की।

आरोपी के साथ महिला के जाने को लेकर क्या कहा अदालत ने?
अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए कहा कि महिला आरोपी के साथ पहले लुधियाना स्थित फ्लैट और बाद में मालेरकोटला गई थी। पीठ ने यह भी नोट किया कि अभियोजन के अनुसार वह व्यस्त सड़कों और चौराहों से गुजरते समय मदद के लिए शोर मचाने या विरोध करने की बात सामने नहीं आई।


हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी महिला का किसी पुरुष के साथ यात्रा करना या उसके साथ समय बिताना अपने आप में यौन संबंध के लिए सहमति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने ट्रायल कोर्ट की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया जिसमें कुछ महिलाओं के पुरुषों के साथ दूर स्थानों तक जाने की बात कही गई थी और कहा कि इस तरह की भाषा का इस्तेमाल उचित नहीं था।
 

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