आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा- केवल कुछ जातियां को मिल रहा लाभ, कुछ अब भी पिछड़ी हैं

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 28 Aug 2020 08:25 AM IST
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : ANI

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹299 Limited Period Offer. HURRY UP!

ख़बर सुनें
उच्चतम न्यायालय 2004 के अपने उस फैसले पर पुनर्विचार करेगा जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों (एससी-एसटी) को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के उद्देश्य से छोटे उप वर्ग में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गुरुवार को एससी-एसटी में वर्गीकरण के मामले को सात जजों की पीठ को भेज दिया। इस फैसले के  दूरगामी राजनीतिक प्रभाव हो सकते हैं।
विज्ञापन

माना जा रहा है कि सुनवाई के जरिए एससी-एसटी की तथाकथित क्रीमी लेयर को लेकर एक बार फिर बहस शुरू हो जाएगी। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गुरुवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि एससी-एसटी समूह के अंदर असमानता है, राज्यों को देश के संघीय ढांचे के मद्देनजर ऐसे उप-वर्गीकरण करने का अधिकार दिया गया है, जो उन्हें पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण प्रदान करने का अधिकार देता है।



पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के एससी-एसटी उप-वर्गीकरण को लेकर दिए अपने पिछले फैसले की समीक्षा करने को कहा। पीठ ने कहा, ‘मामले में लाभ एससी की सूची में शामिल सभी जातियों के लिए है। इसका इस्तेमाल कुछ जातियों द्वारा किया जा रहा है जिनके पास पर्याप्त प्रतिनिधित्व है, वे उन्नत और क्रीमी लेयर से हैं। ऐसे में यह असमानता घातक होगी क्योंकि भूख लगने पर प्रत्येक व्यक्ति को खाना खिलाना और रोटी उपलब्ध कराना आवश्यक होता है। एक सजातीय वर्ग बनाने की आड़ में दूसरों के हक की कीमत पर सारी चीजें शक्तिशाली वर्ग को नहीं दी जा सकती हैं। सच्चाई ये है कि कुछ जातियां पहले जहां थीं, अब भी वहीं हैं।’

यह भी पढ़ें- सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सरकार को निर्देश: कर्ज में दी गई छूट पर अपना रुख स्पष्ट करें

पीठ ने यह भी कहा कि कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण का संविधान निर्माताओं द्वारा स्थायीता पर विचार नहीं किया गया था और सामाजिक परिवर्तन को ध्यान में रखे बिना संवैधानिक लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। अदालत की पीठ ने कहा कि यदि राज्य सरकार के पास आरक्षण देने की शक्ति होती है, वह उप-वर्गीकरण बनाने की भी शक्ति रखती है। 

बता दें कि क्रीमी लेयर का इस्तेमाल अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के अंदर धनी व्यक्तियों के लिए किया जाता है, जो आरक्षण के लिए अयोग्य होते हैं। इस वर्ग में वे लोग आते हैं जिनकी सालाना कमाई आठ लाख से अधिक है। सरकारी नौकरियों और विश्वविद्यालय की सीटों में एससी के पास 15 प्रतिशत, एसटी के पास 7.5 प्रतिशत और ओबीसी के पास 27 प्रतिशत कोटा है।

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us

X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00
X