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दिल्ली सीलिंग पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला- संपत्तियों को डी-सील करने का दिया आदेश

Sat, 15 Aug 2020 08:06 AM IST
संजीव कुमार झा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Sat, 15 Aug 2020 08:06 AM IST
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superme court verdict on delhi sealing, supreme court says for desealing of residential properties
supreme court - फोटो : पीटीआई

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि अतिक्रमण चिंता का विषय है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मॉनिटरिंग कमेटी अपने अधिकारों से बाहर जाकर काम करने लगे। 2006 में मॉनिटरिंग कमेटी का गठन दिल्ली में अवैध निर्माण को चिह्नित करने और रिहायशी संपतियों के दुरुपयोग की जांच करने के लिए किया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि कमेटी अपने अधिकार क्षेत्र को पार नही कर सकती और अपने प्राधिकार से बाहर जाकर कोई कार्रवाई नहीं कर सकती।

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इस टिप्पणी के साथ ही शीर्ष अदालत ने कमेटी की तरफ से अप्रैल, 2019 को दी गई रिपोर्ट, उसके आधार पर की गई सीलिंग और निर्माण ढहाने के लिए जारी नोटिसों को निरस्त कर दिया। शीर्ष अदालत ने सील की गई संपत्तियों को भी उनके मालिकों को वापस करने के निर्देश दिए गए हैं। शीर्ष अदालत ने संबंधित अथॉरिटी को तीन दिन के अंदर आदेश का पालन करने के लिए कहा है।
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जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने 70 पेज के फैसले में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कभी भी मॉनिटरिंग कमेटी को बिना व्यवसायिक इस्तेमाल वाले रिहायशी परिसरों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार नहीं दिया था। कमेटी को निजी जमीन पर बनी रिहायशी संपत्तियों के मामले में कार्रवाई करने का कोई अधिकार ही नहीं है।
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पीठ ने वसंत कुंज और रजोकरी इलाके के कथित अवैध निर्माण से जुड़ी कमेटी की पिछले साल अप्रैल महीने की रिपोर्ट का हवाला दिया और कहा कि यह सही नहीं है कि कमेटी विधायी अधिकार का इस्तेमाल करने लगे। कमेटी को न तो वैसे रिहायशी परिसरों को सील करने का अधिकार नहीं है जिनका व्यवसायिक इस्तेमाल न हुआ हो और न ही उन्हें ढहाने का अधिकार है।

पीठ ने कहा, इसमें कोई शक नहीं है कि अतिक्रमण चिंता का विषय है। लेकिन मॉनिटरिंग कमेटी को कोर्ट ने जो अधिकार दिए हैं, उन्हीं अधिकारों के तहत उसे काम करना है। पीठ ने कहा, हमने कभी भी ऐसा आदेश पारित नहीं किया कि कमेटी उन रिहायशी परिसरों के खिलाफ कार्रवाई करें, जिनका व्यावसायिक  इस्तेमाल नहीं हो रहा हो।
 
फैसले का मतलब कमेटी के प्रयासों को नकारना नहीं
जस्टिस मिश्रा के अलावा जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी की मौजूदगी वाली पीठ ने हालांकि यह भी कहा कि इस फैसले का मतबल कमेटी की मेहनत को कम आंकना नहीं है। पीठ ने कहा, हम स्पष्ट करते हैं कि यह आदेश दिल्ली की सुरक्षा के लिए मॉनिटरिंग कमेटी द्वारा दी गई अहम सेवा को कम करके आंकने के लिए नहीं है।


शीर्ष अदालत की तरफ से 24 मार्च, 2006 को गठित कमेटी में चुनाव आयुक्त के पूर्व सलाहकार केजे राव, पर्यावरणीय प्रदूषण (निवारण व नियंत्रण) प्राधिकरण के चेयरमैन भूरेलाल और अवकाश प्राप्त मेजर जनरल एसपी झिंगन मौजूद हैं।

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