सुदर्शन टीवी मामला: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, संस्कृति को नहीं समझकर देश का अनादर कर रहे टीवी चैनल

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Wed, 16 Sep 2020 02:08 AM IST
सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने सुदर्शन टीवी के विवादित कार्यक्रम पर रोक से जुड़ी सुनवाई के दौरान टीवी चैनलों की कार्यशैली पर तीखी टिप्पणियां कीं। शीर्ष अदालत ने कहा, भारत अलग-अलग संस्कृतियों का देश है, ऐसा नहीं समझ कर चैनल देश का अनादर कर रहे है। शीर्ष अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाए जाने की प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई।
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जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की पीठ ने कहा, हम सरकार से मीडिया पर कोई गाइडलाइंस थोपने के लिए नहीं कह रहे हैं, क्योंकि यह अनुच्छेद 19(1)(ए) के लिए अभिशाप जैसा होगा। लेकिन क्या मीडिया को खुद ही अपने मानक तय नहीं करने चाहिए। वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये की गई सुनवाई में जस्टिस चंद्रचूड़ ने चैनल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील श्याम दीवान से कहा, कार्यक्रम में यह चित्रित करने का कपटपूर्ण प्रयास है कि मुसलमानों का यूपीएससी की परीक्षाओं को पास करना सिविल सेवाओं में घुसपैठ का प्रयास है। इस देश का सर्वोच्च न्यायालय होने के नाते हम आपको यह कहने की अनुमति नहीं दे सकते। हम इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, कोई भी यह नहीं कह सकता कि पत्रकारों को कुछ भी कहने की पूर्ण स्वतंत्रता है। उन्होंने कहा, आपके मुवक्किल को सावधानी के साथ अपने अधिकारों का प्रयोग करने की आवश्यकता है।


दीवान की तरफ से ‘फ्री स्पीच’ का दावा करने पर पीठ ने कहा, यह फ्री स्पीच का मुद्दा नहीं है। जब आप कहते हैं कि जामिया के छात्र सिविल सेवाओं में घुसपैठ करने की साजिश का हिस्सा हैं, तो यह स्वीकार्य नहीं है। आप एक समुदाय को लक्षित नहीं कर सकते हैं और उन्हें एक विशेष तरीके से ब्रांड नहीं कर सकते हैं। यह एक समुदाय को बदनाम करने का दुर्भावनापूर्ण प्रयास है।

इससे पहले शीर्ष अदालत ने 28 अगस्त को कार्यक्रम के प्रसारण पर रोक लगाने की बजाय इस पर सुनवाई की आवश्यकता जताई थी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन और सुदर्शन न्यूज से एडवोकेट फिरोज इकबाल खान की याचिका पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था।

स्वतंत्र प्रेस के नाम पर अदालत से नहीं बच सकते
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, किसी एक समुदाय को बदनाम करने के प्रयास को अदालत द्वारा बहुत ही अपमान के साथ देखा जाना चाहिए, क्योंकि अदालत सांविधानिक अधिकारों की संरक्षक होती है। पीठ ने कहा, ऐसे कार्यक्रम जो एक विशेष समुदाय को गलत ढंग से दिखाने की प्रवृत्ति रखते हैं, वे सिर्फ अभिव्यक्ति के अधिकार और स्वतंत्र प्रेस के अधिकार का दावा करके अदालती परीक्षण से बच नहीं सकते। दीवान ने जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा।

कार्यकम में दिख रही तथ्यात्मक गलतियां
याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश एडवोकेट शाहदान फरासत ने विवादित कार्यक्रम की कुछ वीडियो क्लिप अदालत को दिखाई। इन्हें देखने के बाद पीठ ने 17 सितंबर तक कार्यक्रम के प्रसारण पर अंतरिम रोक लगाते हुए कहा, कार्यक्रम में कई तथ्यात्मक गलतियां हैं. यूपीएससी में मुसलमानों की आयु सीमा 35 रखने का, परीक्षा के ज्यादा मौके मिलने का गलत दावा किया गया है। हमें लगता है कि कार्यक्रम के ज़रिए मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल मेहता को भी सरकार से पूछने का निर्देश दिया कि सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने 9 सितंबर को किस आधार पर 11 और 14 सितंबर को कार्यक्त्रस्म के प्रसारण की इजाजत दी।

 

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