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क्या फिर से लौटेगा हिम युग?: कनाडा के प्राचीन ज्वालामुखीय विस्फोट से बढ़ रही आशंका, जानें वैज्ञानिकों का दावा
Mon, 29 Jun 2026 07:09 AM IST
अमन तिवारी
अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: अमन तिवारी
Updated Mon, 29 Jun 2026 07:09 AM IST
सार
वैज्ञानिकों के नए अध्ययन में दावा किया गया है कि करोड़ों वर्ष पहले पृथ्वी पर आए सबसे लंबे स्टर्टियन हिमयुग के पीछे विशाल ज्वालामुखीय गतिविधियां जिम्मेदार थीं। शोध के अनुसार वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड कम होने के कारण पृथ्वी लंबे समय तक बर्फ से ढकी रही।
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ज्वालामुखी विस्फोट (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : फ्रीपिक
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विस्तार
पृथ्वी के इतिहास के सबसे लंबे और रहस्यमय हिमयुगों में से एक स्टर्टियन ग्लेशिएशन को लेकर वैज्ञानिकों ने नया खुलासा किया है। लगभग 71.7 करोड़ से 66 करोड़ वर्ष पहले क्रायोजेनियन काल के दौरान फैला यह हिमयुग करीब 5.6 करोड़ वर्ष तक चला था।
नए अध्ययन में दावा किया गया है कि विशाल ज्वालामुखीय घटनाओं ने वातावरण से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड हटाकर पृथ्वी को बार-बार जमने और पिघलने के चक्र में धकेला। शोधकर्ताओं के अनुसार यही प्रक्रिया इस असाधारण रूप से लंबे हिमयुग की वजह बन सकती है। अर्थस्नैप में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह अध्ययन अमेरिका की हार्वर्ड जॉन ए. पॉलसन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एंड एप्लाइड साइंसेज की शोधार्थी शार्लोट मिन्स्की के नेतृत्व में किया गया है।
वैज्ञानिकों ने दिया स्नोबॉल अर्थ नाम
शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित हुआ है। क्रायोजेनियन काल के दौरान पृथ्वी पर ऐसे दौर आए जब माना जाता है कि ग्रह का अधिकांश हिस्सा बर्फ से ढक गया था। इसी कारण वैज्ञानिकों ने इसे स्नोबॉल अर्थ नाम दिया।
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ये भी पढ़ें: SDG-7 की रिपोर्ट में खुलासा: दुनिया के 65.5 करोड़ लोग अब भी बिजली से वंचित, दो अरब प्रदूषित ईंधन के सहारे
40 लाख साल बनी रही यथास्थिति
सामान्य जलवायु मॉडल बताते हैं कि ज्वालामुखी से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड धीरे-धीरे वातावरण में जमा होती है, जिससे ग्रह गर्म होने लगता है और हिमनद पीछे हटने लगते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में सामान्यतः करीब 40 लाख वर्ष लगते हैं। इसी आधार पर वैज्ञानिक मैरिनोअन ग्लेशिएशन नामक एक अन्य हिमयुग को समझ पाते हैं, जो लगभग 40 लाख वर्ष तक चला था।
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नए अध्ययन में दावा किया गया है कि विशाल ज्वालामुखीय घटनाओं ने वातावरण से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड हटाकर पृथ्वी को बार-बार जमने और पिघलने के चक्र में धकेला। शोधकर्ताओं के अनुसार यही प्रक्रिया इस असाधारण रूप से लंबे हिमयुग की वजह बन सकती है। अर्थस्नैप में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह अध्ययन अमेरिका की हार्वर्ड जॉन ए. पॉलसन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एंड एप्लाइड साइंसेज की शोधार्थी शार्लोट मिन्स्की के नेतृत्व में किया गया है।
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वैज्ञानिकों ने दिया स्नोबॉल अर्थ नाम
शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित हुआ है। क्रायोजेनियन काल के दौरान पृथ्वी पर ऐसे दौर आए जब माना जाता है कि ग्रह का अधिकांश हिस्सा बर्फ से ढक गया था। इसी कारण वैज्ञानिकों ने इसे स्नोबॉल अर्थ नाम दिया।
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40 लाख साल बनी रही यथास्थिति
सामान्य जलवायु मॉडल बताते हैं कि ज्वालामुखी से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड धीरे-धीरे वातावरण में जमा होती है, जिससे ग्रह गर्म होने लगता है और हिमनद पीछे हटने लगते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में सामान्यतः करीब 40 लाख वर्ष लगते हैं। इसी आधार पर वैज्ञानिक मैरिनोअन ग्लेशिएशन नामक एक अन्य हिमयुग को समझ पाते हैं, जो लगभग 40 लाख वर्ष तक चला था।