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शोध में खुलासा, दुनिया में आग से होने वाली मौत में हर पांचवां व्यक्ति भारतीय

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 22 Dec 2019 09:57 AM IST
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आग के कारण 2017 में  27,027 लोगों की जान चली गई
आग के कारण 2017 में 27,027 लोगों की जान चली गई - फोटो : अमर उजाला
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दुनिया में रोजाना कहीं न कहीं आग लगती है और इसकी चपेट में आने से कई लोगों की जान चली जाती है। साल 2017 में पूरी दुनिया में आग के कारण होने वाली मौतों में हर पांचवा शख्स भारतीय था। उस साल आग से होने वाली 90 लाख घटनाओं में  1.2 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई। अकेले भारत में 27,027 लोगों को आग ने लील लिया। उस साल भारत में 16 लाख आग की घटनाएं घटित हुई थीं। यह जानकारी बीएमजे इंजरी प्रिवेंशन जरनल में प्रकाशित ग्लोबल डिजीज बर्डन के 195 देशों के विश्लेषण से सामने आई है।
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भारतीय मृत्यु का आंकड़ा चीन से ढाई गुना ज्यादा है। यहां 2017 में आग की घटनाओं में 10,836 लोगों की जान गई। आग से होने वाली मौतों में भारत में पाकिस्तान सहित सात देशों का आधा से अधिक हिस्सा है। शोध का कहना है कि पांच साल से कम उम्र के बच्चे और 60 साल से ज्यादा के बुजुर्गों आग से सबसे ज्यादा पीड़ित होते हैं। शहरी भारत में भी यह ट्रेंड देखने को मिलता है।
नवी मुंबई के एयरोली बर्न्स सेंटर के डॉक्टर एस केसवानी ने कहा, 'इससे पहले मुंबई में 80 प्रतिशत महिलाएं आग पीड़िताएं होती थीं लेकिन अब बर्न वार्ड में वरिष्ठ नागरिक और बच्चे ज्यादा दिखाई देते हैं।' यह बदलाव मुख्य रूप से सामाजिक परिवर्तनों के कारण आया है जैसे महिलाओं में दीर्घायु और वित्तीय स्वतंत्रता में वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा, 'महिलाएं अब नौकरी करती हैं जिसका मतलब है कि बच्चों की देखभाल या ते क्रेच में या फिर घर के बुजुर्ग करते हैं।'
शोध से पता चला है कि भारत में लैंगिग हिंसा उच्च मृत्यु दर का एक कारण है। शोध में बताया गया है कि कर्नाटक में महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली सिंथेटिक साड़ियां भी आग का दूसरा कारण हैं। तीसरा कारण अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं हैं। बर्न मैनेजमेंट को मैनपावर की जरूरत है। डॉक्टर केसवानी ने कहा, 'आग से झुलसे मरीज की पट्टी बदलने के लिए हर बार छह लोगों की जरूरत होती है। हमारे सरकारी अस्पतालों जहां सबसे ज्यादा लोग इलाज के लिए जाते हैं वहां मरीज के मुकाबले डॉक्टर और नर्स की संख्या बहुत कम है।'

निजी क्षेत्र बहुत कम झुलसे लोगों का इलाज करते हैं क्योंकि यहां ज्यादा निवेश करना पड़ता है। वहीं कमाई बेहद कम होती है। मुंबई में केवल दो निजी अस्पतालों में बर्न वार्ड हैं लेकिन हर सरकारी अस्पताल में झुलसे हुए लोगों का इलाज होता है जबकि मुट्ठीभर के पास पर्याप्त सुविधाएं मौजूद हैं। सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ने कहा, 'निजी क्षेत्र में आईसीयू की खर्च 25,000 से 50,000 तक आता है। झुलसे हुए मरीज को लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ता है और खर्च 18 लाख से ऊपर का आता है। कितने भारतीय इस खर्च को वहन कर सकते हैं।'
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