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छात्रों को मिलेगा पोस्टल बैलेट का अधिकार?: सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई; वोटर लिस्ट से नाम कटने पर भी अदालत सख्त

Wed, 28 Jan 2026 07:47 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु चंदेल Updated Wed, 28 Jan 2026 07:47 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों को पोस्टल बैलेट से वोट देने की मांग वाली याचिका और बिहार में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े मामलों की सुनवाई की। कोर्ट ने एक ओर युवाओं के मतदान अधिकार पर सवाल उठाए, तो दूसरी ओर नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग की भूमिका पर टिप्पणी की। दोनों मामले लोकतंत्र के भविष्य से जुड़े हैं। आइए इन दोनों मामलों को विस्तार से जानते हैं।

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students right to postal ballots Supreme Court takes strict stance on names being removed from voter list
सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI

विस्तार

देश के लोकतंत्र से जुड़े दो अहम मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ सख्त रुख दिखाया है। एक ओर घर से दूर पढ़ाई कर रहे छात्रों को वोट देने में हो रही दिक्कतों पर कोर्ट ने सुनवाई का फैसला किया है, वहीं दूसरी ओर वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवालों पर विचार किया जा रहा है। दोनों ही मामलों का सीधा असर करोड़ों मतदाताओं के वोटिंग अधिकार पर पड़ता है।

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मामला क्या है? छात्रों के वोट का सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी है, जिसमें छात्रों को पोस्टल बैलेट से वोट देने की सुविधा देने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि जो छात्र अपने गृह क्षेत्र से बाहर कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं, वे मतदान के दिन घर जाकर वोट नहीं डाल पाते। कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से चार हफ्ते में जवाब मांगा है कि छात्रों को यह सुविधा क्यों नहीं दी जा सकती।
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छात्र बनाम कानून, कहां है भेदभाव?
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि निवारक हिरासत में बंद व्यक्ति को पोस्टल बैलेट से वोट डालने का अधिकार है, लेकिन छात्र को यह सुविधा नहीं मिलती। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 135बी के तहत सरकारी कर्मचारियों को मतदान के दिन छुट्टी दी जाती है, लेकिन छात्रों को न छुट्टी मिलती है और न कोई वैकल्पिक व्यवस्था। याचिका में इसे अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है।
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कितने बड़े वर्ग पर असर?
याचिका में चुनाव आयोग के आंकड़ों का हवाला दिया गया है। इसमें बताया गया कि 18 से 19 साल की उम्र के करीब 1.84 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें अधिकांश छात्र और पहली बार वोट देने वाले हैं। वहीं 20 से 29 साल की उम्र के करीब 19.74 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें बड़ी संख्या में यूजी, पीजी और पीएचडी के छात्र शामिल हैं। अगर इन युवाओं को वोट देने का मौका नहीं मिला तो लोकतंत्र में उनकी भागीदारी कमजोर हो जाएगी।

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दूसरा बड़ा मुद्दा: वोटर लिस्ट से नाम कटने का विवाद
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में हुए वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से जुड़े मामलों की भी सुनवाई की। कोर्ट ने साफ कहा कि वोटर लिस्ट में नाम जोड़ना और हटाना एक नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर कि किसी दस्तावेज में गड़बड़ी की आशंका है, आधार जैसे वैध दस्तावेज को खारिज नहीं किया जा सकता।

नागरिकता बनाम मतदान अधिकार
सुनवाई के दौरान यह बहस भी सामने आई कि नागरिकता तय करने का अधिकार किसके पास है। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि नागरिकता तय करना केंद्र सरकार का काम है, न कि चुनाव आयोग का। वहीं कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट से नाम हटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं है, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इसका व्यावहारिक असर यह होता है कि व्यक्ति वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाता है।


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एसआईआर पर उठे सवाल और कोर्ट की टिप्पणी
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि बिहार में बिना ठोस आंकड़ों के करोड़ों मतदाताओं की जांच की गई और बड़े पैमाने पर नाम काटे गए। उनका कहना था कि यह प्रक्रिया चुनाव के करीब होने से लोकतांत्रिक भागीदारी को नुकसान पहुंचा सकती है। कोर्ट ने माना कि वोटर लिस्ट में सुधार जरूरी है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि राज्यों और चुनाव आयोग को पारदर्शिता और ठोस आधार के साथ काम करना होगा।

लोकतंत्र के भविष्य पर असर
दोनों मामलों में एक साझा सवाल उभरकर सामने आया है। क्या मौजूदा चुनावी व्यवस्था सभी नागरिकों, खासकर युवाओं और छात्रों, को बराबरी से वोट देने का मौका दे रही है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि इन मामलों का फैसला केवल कानूनी नहीं, बल्कि लोकतंत्र के भविष्य की दिशा तय करेगा। अब सबकी नजरें आने वाले फैसलों पर टिकी हैं।


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