''जब ज्यादा पिटाई की तो मैंने कहा कि हां, मैं बनाता हूं”
- गृहनगर में तनाव की स्थिति
- परिवार को टुंडा की गतिविधियों के बारे में कुछ नहीं पता था
- परिवार कह रहा है कि अब टुंडा को छोड़ दिया जाना चाहिए
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पहली कड़ी: टुंडा कैसे पहुँचे पिलखुआ से पाकिस्तान? दिल्ली पुलिस ने टुंडा को चरमपंथी गुट लश्कर का बम एक्सपर्ट बताया था जिनका कथित तौर पर एक बहुत बडा गिरोह था, लेकिन अदालत ने टुंडा को एक के बाद एक चार मामलों में बरी कर दिया।
इससे पहले मालेगांव और मक्का मस्जिद धमाका जैसे केसों में मुसलमान लडके गिरफ्तार किए गए थे, पर बाद में बरी कर दिए गए। टुंडा के वकील एमएस खान के मुताबिक, "पुलिस की सूची में टुंडा के खिलाफ पूरे भारत में 33 मामले हैं और दिल्ली में उनके खिलाफ 20-22 मामले थे, लेकिन टुंडा को मात्र चार मामलों में गिरफ्तार किया गया था।" खान के अनुसार, ताजा मामले में बरी होने के बावजूद टुंडा अभी जेल में ही रहेंगे क्योंकि दिल्ली के बाहर भी उनके खिलाफ कई मामले लंबित हैं। उधर अगर आप टुंडा के परिवार से बात करें तो एक ऐसे शख्सटट की तस्वीर उभरती है जो कम बोलता था, अपने काम के बारे में बात नहीं करता था और जिनके परिवार को उनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।
कुछ ऐसा है टुंडा का घर
पिलखुआ की संकरी गलियों, उनमें खेलते बच्चों के पास से गुजरते हुए हम अशोक नगर कॉलोनी में टुंडा के घर पहुंचे। छत से जमीन तक जुडी बाहरी दीवार पर सस्ता सा चूना लगा था। न कोई तख्ती, न नाम। दीवार में एक आयताकार सूराख था, जहां दरवाजा बना था। घुसते ही दाएं, बाएं दो कमरे। थोडा आगे जाने पर दाहिने खुला सा बरामदा जबकि बाईं ओर ढकी हुई बैठक। साथ में लगा एक और कमरा। इस छोटी सी जगह में दर्जन भर से ज्यादा लोग रहते हैं। टुंडा की साली ताहिरा ने बताया, ''पहले तो लोग हमें सलाम करने से भी डरते थे लेकिन 2013 में उनकी (टुंडा) की गिरफ्तारी के बाद हालात ठीक हुए हैं।'' अदालती कागजों के अनुसार, एक गुप्त जानकारी के आधार पर 16 अगस्त को टुंडा को भारत-नेपाल सीमा से गिरफ्तार किया गया लेकिन वो पाकिस्तान से भारत क्यों और कैसे आए, इनके जवाब नहीं मिलते।
परिवार के सदस्यों के मुताबिक उन्हें टुंडा की गतिविधियों के बारे में कुछ नहीं पता कि वह कहां जाते थे, किससे मिलते थे। उनके मुताबिक टुंडा कारपेंटर थे। ज्यादा वक्त पिलखुआ से बाहर बिताते थे। टुंडा लखनऊ से होम्योपैथी की डिग्री लेकर आए थे और दुकान खोलने की बात करते थे। 1993 के आसपास पहले टुंडा और करीब एक-डेढ साल बाद उनके परिवार के भारत से गायब होने के बाद पुलिस का शक टुंडा के भारत में बचे परिवार पर गया था।
टुंडा के साढू महमूद आलम बताते हैं कि टुंडा के गायब होने के बाद स्थानीय पुलिस ने उन्हें थाने बुलाया और यातनाएं दीं। महमूद आलम ने छह साल जेल में बिताए।
'तुम अब्दुल करीम के पास जाते हो?'
इन आरोपों की सत्यता जांचना आसान नहीं। टुंडा की साली ताहिरा भी पुलिस और इंटेलिजेंस के लोगों पर उन दिनों उन्हें परेशान करने का आरोप लगाती हैं। वह बताती हैं कि 90 के दशक में उनका परिवार टुंडा के घर से थोडी दूर किराए पर रहता था, लेकिन जब टुंडा पर बम धमाकों में हिस्सा लेने के आरोप लगे तो उनके लिए मकान में रहना मुश्किल हो गया। उन्हें कोई भी किराए का मकान देने को तैयार न था, इसलिए टुंडा के परिवार के पाकिस्तान जाने के बाद वो टुंडा के घर में चले आए।
ताहिरा कहती हैं, ''(हमारे पास) रहने को मकान नहीं था, मजबूरी में यहां रहे हैं। पुलिस हमें बहुत परेशान करती थी, रात के दो बजे-तीन बजे (घर में पुलिस आ जाती थी)। बच्चे हमारे छोटे-छोटे थे, हम कहां जाते।''
2013 में पकडे जाने के बाद अब्दुल हक टुंडा से जेल में मिल चुके हैं। उनके अनुसार, मुलाकात में टुंडा ने कहा कि उन पर लगाए गए मामले झूठे हैं। धमाकों के मामले में अब्दुल हक भी छह साल जेल की सजा काट चुके हैं और वह गुजरे दिनों पर बहुत बात नहीं करना चाहते। वे कहते हैं, ''हम (टुंडा से) दुआ सलाम करने गए थे। स्पेशल सेल वालों ने बुलाया था कि तुम्हारा भाई मिलना चाहता है। वह (टुंडा) मुझसे कह रहे थे कि (उन पर) झूठे केस लगाए हैं। हमारे ऊपर भी मामले लगाए थे। वो कौन से सच्चे थे।"
अब्दुल हक बताते हैं, "मैंने आरोपों के बारे में कभी नहीं पूछा। मेरे साथ जो गुजरी, मैं सब्र करके बैठ गया। मेरा उनसे बहुत मेलजोल नहीं था। उनसे दुआ-सलाम होती थी। जेल में मुश्किल से पांच मिनट बात होती है। आधी बात समझ में आती है, आधी समझ में नहीं आती।''
वह कहते हैं कि अगर हमारी उनसे मुलाकात होती है तो हम उनसे जरूर पूछना चाहेंगे कि आखिर उन्होंने ऐसा क्या किया जिससे पूरे परिवार पर इतनी मुसीबत आ गई। परिवार की नाराजगी मीडिया से भी है।टुंडा के भांजे और महमूद आलम के बेटे आतिफ खान कहते हैं, ''मीडिया वालों ने छुरी को तलवार बना दिया। काटने की छुरी तो हर मुसलमान के घर में मिलेगी आपको।''