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Rajasthan: पायलट-चांदना की लड़ाई के पीछे कहानी क्या, गुर्जर वोट का झगड़ा या 2020 वाली सियासी उथल-पुथल की आहट?

Wed, 14 Sep 2022 04:59 PM IST
हिमांशु मिश्रा रिसर्च डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
रिसर्च डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Wed, 14 Sep 2022 04:59 PM IST
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सार
राजस्थान कांग्रेस काताजा विवाद क्या है? इस विवाद की वजह क्या है? इसके पीछे की सियासत क्या है? गहलोत की क्या रणनीति है? सचिन पायलट के पास क्या विकल्प हैं? प्रदेश की बदलती सियासत में क्या-क्या संभावना बनती दिख रही हैं? आइये जानते हैं 
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Story behind sachin Pilot- ashok Chandana fight in rajasthan, Gujjar vote feud or political upheaval in 2020?
राजस्थान कांग्रेस में घमासान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के संबंधों की कड़वाहट सभी को पता है। दोनों के समर्थकों में जुबानी हमले भी दो साल से जारी हैं। दोनों की इस लड़ाई में अब गुर्जर समुदाय की भी एंट्री भी हो गई है। गहलोत के करीबी गुर्जर नेता अशोक चांदना इसके केंद्र में हैं। 


कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से गुर्जर समाज के लोग नाराज चल रहे हैं। यही कारण है कि कर्नल किरोड़ी सिंह बैसला की अस्थि विसर्जन से पहले आयोजित एक जनसभा में गुर्जर समुदाय के युवाओं ने अशोक गहलोत के बेटे और उनके दो करीबी मंत्रियों को निशाना बना दिया। मंत्री अशोक चांदना पर तो जूते भी फेंके गए। इसके बाद चांदना ने भी अपने गुस्से का खुलकर इजहार किया। ट्विट कर सचिन पायलट पर निशाना साधा। 


सचिन पायलट खुद गुर्जर समुदाय से आते हैं। राज्य में गुर्जर वोटरों पर उनका बड़ा प्रभाव माना जाता है। राजनीतिक जानकार पायलट और चांदना के बीच बढ़ी अदावत के पीछे सियासी कारण बता रहे हैं। कहा जा रहा है कि ये सियासी लड़ाई आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। 

ताजा विवाद क्या है? इस विवाद की वजह क्या है? इसके पीछे की सियासत क्या है? गहलोत की क्या रणनीति है? सचिन पायलट के पास क्या विकल्प हैं? प्रदेश की बदलती सियासत में क्या-क्या संभावना बनती दिख रही हैं? आइये जानते हैं 
 

गहलोत खेमे के मंत्रियों पर फेंके गए जूते-चप्पल
गहलोत खेमे के मंत्रियों पर फेंके गए जूते-चप्पल - फोटो : अमर उजाला
ताजा विवाद क्या है? 
इस लड़ाई को समझने के लिए बीते एक हफ्ते में राजस्थान की सियासत में हुए घटनाक्रमों को समझना होगा। गुर्जर आंदोलन के नेता रहे कर्नल किरोड़ी सिंह बैसला का 19 सितंबर को अस्थि विसर्जन होना है। इससे पहले एक जनसभा का आयोजन किया गया था। इस जनसभा में कांग्रेस और भाजपा के कई नेता पहुंचे। गुर्जर समाज से आने वाले दो मंत्री अशोक चांदना और शकुंतला रावत भी इस कार्यक्रम में पहुंची। कहा जा रहा है कि गुर्जर समाज से आने वाले सचिन पायलट को इसमें नहीं बुलाया गया। इससे पायलट के समर्थक नाराज हो गए। 

जैसे ही अशोक चांदना ने बोलना शुरू किया, भीड़ हूटिंग करने लगी। बड़ी संख्या में गुर्जर युवाओं ने पहले सचिन पायलट के समर्थन में और अशोक गहलोत के विरोध में नारेबाजी की। जब अशोक चंदाना इसे बंद करने के लिए कहने लगे तो लोगों ने जूते और चप्पल भी चंदाना की तरफ फेंकना शुरू कर दिया। मंच दूर होने की वजह से चंदाना तक ये जूते नहीं पहुंच पाए। भीड़ ने चंदाना के अलावा सभा में मौजूद वैभव गहलोत और शकुंतला रावत के खिलाफ भी नारेबाजी हो रही थी। किसी तरह पुलिस ने तीनों को पीछे के रास्ते से बाहर निकाला। 

इसके तुरंत बाद अशोक चंदाना ने एक के बाद एक कई ट्विट किए। चंदाना ने लिखा, 'मुझ पर जूता फेंकवाकर सचिन पायलट यदि मुख्यमंत्री बने तो जल्दी से बन जाएं क्योंकि आज मेरा लड़ने का मन नहीं है। जिस दिन मैं लड़ने पर आ गया तो फिर एक ही बचेगा और यह मैं चाहता नहीं हूं।'
 

सचिन पायलट और अशोक चंदाना
सचिन पायलट और अशोक चंदाना - फोटो : अमर उजाला
इस विवाद की वजह क्या है?
इसे समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, दरअसल अशोक चांदना और शकुंतला रावत गहलोत खेमे के मंत्री हैं। ये दोनों मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के काफी करीबी माने जाते हैं। दोनों ही गुर्जर समुदाय से आते हैं। लेकिन, गुर्जर समाज का समर्थन सचिन पायलट को ज्यादा है। गुर्जर युवा चाहते हैं कि सचिन पायलट ही मुख्यमंत्री बनें। पायलट के मुख्यमंत्री न बन पाने के लिए गुर्जर युवा अपने ही समाज के नेताओं को जिम्मेदार मानते हैं। इसमें अशोक चंदाना भी शामिल हैं।  

प्रमोद आगे कहते हैं, गुर्जर समुदाय में कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला की मौत के बाद सचिन पायलट ही सबसे बड़े नेता माने जाते हैं। बैंसला के बेटे विजय बैंसला खुद को पायलट का प्रतिद्वंदी मानते हैं। गुर्जर समुदाय में वर्चस्व की लड़ाई काफी पुरानी है। बैंसला 75 सीटों पर गुर्जरों और अति पिछ़़ड़ा वर्ग की राजनीतिक भागीदारी का मुद्दा उठाते रहे हैं। 
 

सीएम अशोक गहलोत
सीएम अशोक गहलोत - फोटो : Social Media
इसके पीछे की सियासत क्या है?
मोजूदा दौर में गुर्जर मतदाताओं पर सचिन पायलट का प्रभाव सबसे ज्यादा माना जाता है। इसको इसी से समझा जा सकता है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को एकतरफा गुर्जर वोट मिले थे। यहां तक की भाजपा का एक भी गुर्जर उम्मीदवार नहीं जीत सका था। जबकि, कांग्रेस के आठ गुर्जर उम्मीदवार जीतने में सफल रहे थे। 

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं 2018 में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की वजह से कांग्रेस को यह सफलता मिली थी। गुर्जर मतदाताओं को उस वक्त उम्मीद थी कि पायलट ही मुख्यमंत्री बनेंगे। ऐसा हुआ नहीं। अब पायलट विराेधी धड़ा अशोक चांदना को गुर्जर समाज में बड़े नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है जो गहलोत और पायलट की लड़ाई के बीच चांदना की एंट्री हुई है।

गहलोत की क्या रणनीति है?
दो साल पहले जब सचिन पायलट ने गहोलत सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका था तब अशोक चांदना ने गहलोत का साथ दिया था। इसके बाद से ही पायलट और चांदना के रिश्तों में तल्खी बढ़ी है। विशेषज्ञ कहते हैं कि गहलोत इसी तल्खी को भुनाने की कोशिश में हैं। 

हालांकि, चांदना और पायलट के रिश्ते हमेशा से ऐसे नहीं रहे हैं। वसुंधरा सरकार के दौर में पायलट जब कांग्रेस अध्यक्ष थे तब चांदना यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष थे। उस दौर में पायलट यूथ कांग्रेस के हर विरोध प्रदर्शन में शामिल होते थे। 

 

राहुल गांधी के साथ अशोक गहलोत
राहुल गांधी के साथ अशोक गहलोत - फोटो : अमर उजाला
तो क्या राजस्थान में कुछ बड़ा होने वाला है? 
यही सवाल हमने प्रमोद कुमार सिंह से पूछा। उन्होंने कहा, 'जिस तरह से हालात बन रहे हैं, उससे दो संभावनाएं बनती दिख रही हैं। पहला कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व चुनाव से पहले राज्य में नेतृत्व परिवर्तन करे। गहलोत को राष्ट्रीय राजनीति में भेज दिया जाए। वैसे भी गहलोत को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की अटकलें हैं। गहलोत को केंद्रीय राजनीति में भेजकर राज्य की कमान सचिन पायलट को सौंप दी जाए। 

दूसरी स्थिति दो साल पहले जैसी बगावत फिर से होने की भी बन सकती है। पायलट को मानने के लिए दो साल पहले कांग्रेस नेतृत्व ने उसके कई वादे किए थे। सुलह के बाद से पायलट से किए कई वादे कांग्रेस पूरा नहीं कर सकी है। ऐसे में इन्हीं बातों का हवाला देकर पायलट फिर से बगावत कर सकते हैं। ऐसे में वह या तो कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी का गठन कर लें या भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो सकते हैं। हालांकि, भाजपा में शामिल होने से पहले पायलट बड़ी डील भी करना चाहेंगे।
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