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चुनाव आयोग को अभी भी कई ताकत और सुधारों की दरकार

Tue, 14 Feb 2017 07:21 AM IST
धीरज कनोजिया/ अमर उजाला, नई दिल्ली
धीरज कनोजिया/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 14 Feb 2017 07:21 AM IST
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still needs many reforms for Election commission

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में बेहतर ढंग से चुनाव करवाने के लिए निर्वाचन आयोग की तारीफ की जाती है। मगर अभी भी आयोग को कई ताकत और सुधारों की दरकार हैं। अब तक देश में चुनाव सुधार सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही संभव हो पाए हैं। चुनाव विशेषज्ञ मानते हैं कि देश के चुनावी सिस्टम को चलाने वाली सरकारें और राजनीतिक दलों में इच्छाशक्ति की कमी है। वे चुनाव सुधार नहीं चाहते। चुनाव आयोग ने सरकार को सुधारों की लंबी सूची भेजी है। 

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राजनीति से अपराधीकरण पर रोक, राजनीतिक पार्टियों के खातों की ऑडिटिंग, चुनाव में काले धन की जांच, पेड न्यूज और सरकार प्रायोजित विज्ञापनों को चुनावी अपराध मानना और उम्मीदवारों द्वारा फर्जी हलफनामा देने को अपराध की श्रेणी में रखना जैसे तमाम चुनाव सुधार अधूरे पड़े हैं।
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मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी का कहना है कि अगर इन चुनौतियों को नजरअंदाज किया गया तो देश की चुनाव प्रणाली पर लोगों का विश्वास कम हो जाएगा। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मेजर अनिल वर्मा कहते हैं कि चुनाव आयोग के पास राजनीतिक दलों को मान्यता देने का अधिकार है मगर उसे उसकी मान्यता रद्द करने का अधिकार नहीं। चाहे वे कोई भी गैरकानूनी काम करें। इस स्थिति में चुनाव आयोग लाचार नजर आता है। 
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हफलनामे के तहत उम्मीदवारों की संपत्ति, योग्यता, देनदारियां और आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी देने का कदम सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही लागू हो पाया। साथ ही किसी भी अपराध के लिए दोषी विधायक और सांसद को दो साल की सजा और तुरंत अयोग्य करार दिए जाने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी जुलाई, 2013 में आया।

'जाति के आधार पर वोट मांगने पर रोक सराहनीय कदम'

still needs many reforms for Election commission
सांकेतिक चित्र

मेजर अनिल वर्मा कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से जाति के आधार पर वोट मांगने पर रोक लगाने का कदम सराहनीय है। मगर चुनाव आयोग के लिए इसे लागू करना बेहद मुश्किल है। सिविल सोसायटी, चुनाव आयोग और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट चुनाव सुधार को लेकर चाहे कुछ भी आदेश दे दें लेकिन जब तक सरकार और राजनीतिक दलों में इसे लागू करने को लेकर नीयत नहीं होगी, इस पर कुछ नहीं हो सकता। 

चुनाव सुधारों को लेकर गोस्वामी कमेटी, वोहरा कमेटी, इंद्रजीत गुप्ता कमेटी, चुनाव आयोग की रिपोर्ट की कई सिफारिशें आई हैं। मगर इन सिफारिशों पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है। काफी जद्दोजहद के बाद आदर्श आचार संहिता बनाई गई। पार्टियां इसे मानने के लिए तैयार हो गईं। मगर कोई वैधानिक बाध्यता नहीं होने के बावजूद चुनाव में संहिताओं का घोर उल्लंघन होता रहा है। 

कांग्रेस के कानूनी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष केसी मित्तल कहते हैं कि आदर्श आचार संहिता राजनीतिक दलों के बीच चुनाव लड़ने की स्पर्धा को सबके लिए बराबर बनाती है। वह कहते हैं कि सत्तारूढ़ पार्टी के पास आचार संहिता का उल्लंघन करने का मौका ज्यादा होता है। वह भाजपा की तरफ इशारा करते हैं। वहीं भाजपा के मुखपत्र कमल संदेश के संपादक शिव शक्ति कहते हैं कि कांग्रेस चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने में माहिर है। केंद्र सरकार चुनाव सुधार के लिए प्रतिबद्ध है।

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