फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Starlink Controversy: What Is Spectrum? Types Of Spectrum Used In Telecom And Satellite Internet

स्पेक्ट्रम: स्टारलिंक विवाद के बीच समझिए क्या है स्पेक्ट्रम, टेलीकॉम कंपनियों को क्यों पड़ती है इसकी जरूरत?

Sun, 11 Oct 2026 08:26 AM IST
संकल्प प्रकाश सिंह स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: संकल्प प्रकाश सिंह Updated Sun, 11 Oct 2026 08:26 AM IST
विज्ञापन
सार
स्टारलिंक विवाद के बीच स्पेक्ट्रम को लेकर इन दिनों चर्चा काफी तेज हो गई है। आखिर स्पेक्ट्रम होता क्या है और इसके प्रकार कितने हैं?
loader
Starlink Controversy: What Is Spectrum? Types Of Spectrum Used In Telecom And Satellite Internet
क्या होता है स्पेक्ट्रम? - फोटो : Amar Ujala AI Generated

विस्तार

इन दिनों देश में स्टारलिंक की एंट्री को लेकर काफी विवाद चल रहा है। इस विवाद में मुकेश अंबानी और भारत सरकार भी चर्चा के केंद्र में हैं। मस्क का आरोप है कि कुछ बड़े उद्योगपति भारत के बाजार में एकधिकार बनाए रखे हैं और स्टारलिंक को आने से रोक रहे हैं। इन सब के बीच उन्होंने मुकेश अंबानी पर तंज कसते हुए उन्हें डियर प्राइम मिनिस्टर भी कहा।



हालांकि, भारत सरकार ने मस्क के आरोपों को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया है। दूरसंचार मंत्रालय के मुताबिक सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए नियम सभी कंपनियों पर समान रूप से लागू होते हैं। स्टारलिंक, जियो और वनवेब जैसी कंपनियों को भी सुरक्षा और नियामकीय प्रक्रियाओं का पालन करना होगा।


भारत में सेवाएं शुरू करने से पहले स्टारलिंक को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी मंजूरियां हासिल करनी होंगी और निर्धारित डाटा सुरक्षा मानकों पर खरा उतरना होगा। सरकार के लिए डाटा संप्रभुता भी अहम मुद्दा है। इसके तहत भरतीय यूजर्स के इंटरनेट ट्रैफिक और डाटा की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है। साथ ही कानूनी जरूरत पड़ने पर सुरक्षा एजेंसियों के पास नेटवर्क की निगरानी और संदिग्ध गतिविधियों की जांच करने की व्यवस्था भी होनी चाहिए।

स्टारलिंक ने भारतीय नियमों का पालन करने की बात कही है। कंपनी ने यह सुनिश्चित किया है कि भारतीय यूजर्स का डाटा देश के भीतर ही रहेगा और सुरक्षा एजेंसियां इसकी कानूनी निगरानी भी कर सकेंगी। हालांकि, अंतिम कमर्शियल क्लीयरेंस अभी भी प्रक्रिया में है। दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के मुताबिक सैटेलाइट स्पेक्ट्रम का आवंटन अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुरूप प्रशासनिक प्रक्रिया से किया जाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर स्पेक्ट्रम क्या होता है? 

क्या होता है स्पेक्ट्रम?

आप अपने मोबाइल से किसी को कॉल करते हैं, इंटरनेट चलाते हैं या टीवी पर कोई कार्यक्रम देखते हैं, तो इन सेवाओं के पीछे रेडियो तरंगों की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इन्हीं तरंगों के जरिए एक डिवाइस से दूसरे डिवाइस तक वायरलेस सिग्नल पहुंचते हैं। इन तरंगों की अलग-अलग फ्रिक्वेंसी के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध दायरे को रेडियो स्पेक्ट्रम कहा जाता है।


इसे आप एक आसान उदाहरण से समझ सकते हैं। सड़क पर अलग-अलग गाड़ियों के चलने के लिए लेन निर्धारित होती हैं। अगर सभी गाड़ियां बिना किसी व्यवस्था के एक ही जगह चलने लगें, तो ट्रैफिक जाम हो सकता है। इसी तरह वायरलेस संचार में अलग-अलग सेवाओं और नेटवर्क को निर्धारित फ्रीक्वेंसी बैंड दिए जाते हैं ताकि उनके सिग्नल व्यवस्थित तरीके से काम कर सकें और आपसी हस्तक्षेप कम हो। 

Spectrum
Spectrum - फोटो : Amar Ujala AI Generated

मोबाइल नेटवर्क, रेडियो, टेलीविजन और सैटेलाइट संचार में स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल होता है। हालांकि, हर सेवा के लिए एक ही फ्रीक्वेंसी उपयुक्त नहीं होती। सिग्नल की पहुंच, डाटा भेजने की क्षमता और तकनीकी जरूरतों के आधार पर अलग-अलग फ्रीक्वेसी बैंड उपयोग किए जाते हैं। भारत में सरकार संबंधित नियमकीय प्रक्रियाओं के जरिए कंपनियों को निर्धारित फ्रीक्वेंसी के इस्तेमाल की अनुमति देती है। यही वजह है कि स्टारलिंक जैसी सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों के लिए भी स्पेक्ट्रम जरूरी है। इसके बिना उनके सैटेलाइट और यूजर टर्मिनल के बीच संचार स्थापित करना संभव नहीं होगा।

टेलीकॉम सेक्टर में कितने तरह के स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल होता है?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि टेलीकॉम सेक्टर में स्पेक्ट्रम को उसकी फ्रीक्वेंसी के आधार पर अलग-अलग बैंड में बांटा जाता है। हर बैंड की अपनी खासियत होती है। कोई कम दूरी में तेज इंटरनेट देने के लिए उपयोगी है, तो कोई लंबी दूरी तक सिग्नल पहुंचाने में बेहतर होता है। मोबाइल नेटवर्क और सैटेलाइट संचार में मुख्य रूप से लो, मिड और हाई-बैंड फ्रीक्वेंसी की चर्चा होती है।

लो-बैंड स्पेक्ट्रम 
आमतौर पर 1 गीगाहर्ट्ज से कम फ्रीक्वेंसी वाले बैंड को लो-बैंड कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसके सिग्नल लंबी दूरी तक आसानी से पहुंच सकते हैं और इमारतों के भीतर भी अपेक्षाकृत बेहतर कवरेज देते हैं। इस कारण दूरदराज के इलाकों में मोबाइल नेटवर्क पहुंचाने के लिए ये उपयोगी है। हालांकि, इसकी उपलब्ध बैंडविड्थ सीमित होने पर डाटा क्षमता भी कम हो सकती है।

मिड-बैंड स्पेक्ट्रम 
करीब 1 से 6 गीगाहर्ट्ज के बीच की फ्रीक्वेंसी को सामान्य तौर पर मिड-बैंड कहा जाता है। यह कवरेज और इंटरनेट की गति के बीच संतुलन बनाता है। 5G नेटवर्क में 3.3–3.67 गीगाहर्ट्ज का बैंड इसका एक उदाहरण है। इस वजह से मिड-बैंड को आधुनिक मोबाइल इंटरनेट के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

हाई-बैंड स्पेक्ट्रम 
24 गीगाहर्ट्ज से ऊपर की फ्रीक्वेंसी को आमतौर पर मिलीमीटर वेव या हाई-बैंड के रूप में जाना जाता है। यह बहुत तेज डाटा ट्रांसफर की क्षमता देता है, लेकिन इसके सिग्नल की पहुंच अपेक्षाकृत कम होती है और दीवारों जैसी बाधाओं से ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए इसके लिए अधिक बेस स्टेशन की जरूरत पड़ सकती है।

सैटेलाइट संचार में भी अलग-अलग फ्रीक्वेंसी बैंड इस्तेमाल होते हैं। उदाहरण के लिए, स्टारलिंक मुख्य रूप से Ku और Ka बैंड का उपयोग करता है। ये बैंड सैटेलाइट और जमीन पर मौजूद उपकरणों के बीच डाटा भेजने में मदद करते हैं। ध्यान देने वाली बात है कि लो, मिड और हाई-बैंड एक सामान्य वर्गीकरण है। अलग-अलग सेवाओं में इस्तेमाल होने वाली फ्रीक्वेंसी की वास्तविक सीमाएं तकनीकी और नियामकीय मानकों के अनुसार बदल सकती हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed