फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Stable Government is Rare In Uttar Pradesh, Renowned for its Fractured Verdict

यूपी में 'दुर्लभ' है स्थिर सरकार, बैसाखी के सहारे चलती आई है सूबे की सियासत

Fri, 10 Mar 2017 06:38 PM IST
amarujala.com- Presented by: पवन नाहर
amarujala.com- Presented by: पवन नाहर Updated Fri, 10 Mar 2017 06:38 PM IST
विज्ञापन
Stable Government is Rare In Uttar Pradesh, Renowned for its Fractured Verdict
उत्तर प्रदेश चुनाव - फोटो : Underground Daily
उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद सभी की निगाहें एग्जिट पोल पर थी। हर कोई टकटकी लगाए बैठे था कि इस बार सूबे में किस पार्टी को बहुमत मिलेगा। इस बार के एग्जिट पोल में कुछ लोग भाजपा को बहुमत दे रहे हैं, तो कुछ उसे सबसे बड़ी पार्टी बता रहे हैं। तमाम अनुमानों के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि उनकी पार्टी सभी विकल्पों पर विचार करेगी। हालांकि तमाम बातों के बीच त्रिशंकु विधानसभा, नए गठबंधन, विभाजन, मनमुटाव, सियासी खींचतान, राजनैतिक उठा-पटक, सत्ता का गणित, राष्ट्रपति शासन, मध्यावधि चुनावों जैसे तमाम सवाल हर पार्टी के गले की हड्डी बन चुके हैं।
विज्ञापन


उत्तर प्रदेश ने यह सब देखा है। इनमें से किसी भी बात से यूपी की राजनीति अनजान नहीं है। 2007 में पहले बसपा और फिर 2012 में सपा को पूर्ण बहुमत के साथ स्थाई सरकार देने वाले इस राज्य का इतिहास कुछ अलग रहा है। 1952 से यह राज्य 16 विधानसभाएं देख चुका है, जिसमें सिर्फ 7 बार ही किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिली है। बाकी 9 बार सरकारें आई और चलीं गई, जिसमें कुछ ने 2-3 साल तक कार्यकाल संभाला और कई चंद दिनों में ही ढह गईं।
विज्ञापन


उत्तर प्रदेश पहला राज्य है जिसने देश को गैर-कांग्रेसी सरकार दी। 1967 में चौधरी चरण सिंह और उनके साथियों ने कांग्रेस से मोहभंग कर भारतीय क्रांति दल बनाया और सत्ता भी हासिल की। यह जीत इसलिए भी खास थी क्योंकि इससे हार से पहले कांग्रेस को अजेय माना जाता रहा था। महंगाई और सूखे की मार से सुलगी आग ने कांग्रेस को लेपेटे में लिया।
विज्ञापन
विज्ञापन

मतदाता बनता गया वोटबैंक

Stable Government is Rare In Uttar Pradesh, Renowned for its Fractured Verdict
यूपी-मणिपुर चुनाव लाइव
राजनैतिक हलचल और घमासान के बीच सूबे में रिकॉर्ड 10 बार राष्ट्रपति शासन लागू हुआ है। आखिरी बार 2002 में यूपी केंद्रीय शासन में आया था। इस बीच मध्यावधि चुनाव का भी परिचय इस राज्य से हुआ। मध्यावधि चुनावों में 7 बार किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिली। आखिरी बार ऐसा 1998 में हुआ था। उतार-चढ़ाव से भरी इस यूपी का राजनीति कांग्रेस के लिए बेहद खास रही है। पार्टी के कई सबसे बड़े नाम इस राज्य से आते हैं। मगर 1967 के बाद इस पार्टी पर सवालिया निशान खड़े होने लगे। इसके पीछे विकल्पों की मौजूदगी बड़ी वजह थी।

1970 के दशक में आपातकाल के बावजूद, हटाए गए या निकाले गए मुख्यमंत्रियों की परेड ने कांग्रेस शासन को खुली चुनौती दी। हेमवती नंदन बहुगुणा ने आपातकाल के दौरान इस्तीफा दे दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। इमरजेंसी के बाद बहुगुणा विपक्ष में शामिल हो गए। कमलापति त्रिपाठी भी विद्रोह के बाद जनता पार्टी से जुड़ गए।

हालांकि कांग्रेस 1980 में फिर सत्ता पर काबिज हुई, जिसमें वीपी सिंह और नारायण दत्त तिवारी जैसे दिग्गज मुख्यमंत्री हुआ, मगर 1989 में उसके लिए सब शून्य हो गया। मतदातों ने अपना रूख बदल लिया और जनता दल को सत्ता की कुर्सी सौंप दी गई। इसके बाद राज्य में सियासी हंगामों का दौर प्रारंभ हुआ। मंडल आयोग के प्रभाव के बाद यूपी ने जाति और धर्म पर आधारित राजनीति का उदय देखा। पिछड़ गए सामाजिक वर्ग हर पार्टी के लिए हथियार-नुमा हो गए और पार्टियों के बीच वोटबैंक निर्धारित हो गए, जो आज तक चला आ रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed