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वह गांव जिसने भारत के प्रधानमंत्री को अंग्रेजों से बचाया

Sat, 30 Sep 2017 02:20 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला
टीम डिजिटल, अमर उजाला Updated Sat, 30 Sep 2017 02:20 PM IST
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Special Story On Lal Bahadur Shastri, the place to hide from british soldiers
पूर्व प्रधानमंत्री लाला बहादूर शास्त्री

उत्तराखंड का चंपावत जिला एक ग्रामीण इलाका है, जहां के ज्यादातर लोग कृषि पर निर्भर हैं, लेकिन ये गांव किसी पहचान को मोताज नहीं है। इस गांव का भारत की आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 

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भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री इस गांव में जागोली धर्मशाला में एक हफ्ते तक के लिए ठहरे थे। जागोली धर्मशाला स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई की प्रमुख गवाह रही है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ये धर्मशाला, भारतीय सेनानियों के लिए ऐसा महफूज ठिकाना थी, जहां वे अंग्रेजों से छुपते थें। 
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साल 1934 में लाल बहादूर शास्त्री भी इस धर्मशाला में आए थे। उन्होंने यहां लगभग एक हफ्ते का वक्त गुजारा था। शास्त्री जी ही नहीं बल्कि कई नामचीन स्वतंत्रता सेनानी इस धर्मशाला में रूक चुके हैं। इतिहासकार देवेंद्र ओली के मुताबिक खेतीखान के ओलीगांव में स्वतंत्रता सेनानी दिवंगत हर्षदेव ओली के मकान के पास जागोली मंदिर परिसर की धर्मशाला गुलामी की बेड़ियों को काटने का हथियार बनी थी। 
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उस दौर में यह धर्मशाला अंग्रेजों के खिलाफ चलने वाली तमाम गतिविधियों के प्रमुख केंद्र के रूप में रही। वर्ष 1920 में बनी यह धर्मशाला वीरान जगह पर होने से अंग्रेजों के निशाने पर भी कम रहती थी। गोरों के आतंक से बचने और रणनीति बनाने के लिए ये स्थान बेहद सुरक्षित था।

हर साल होता है खीर का भंडारा

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पूर्व प्रधानमंत्री लाला बहादूर शास्त्री

वर्ष 1932 में हुए तीसरे गोलमेज सम्मेलन के दो वर्ष बाद कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में लाल बहादुर शास्त्री यहां आए। जागोली धर्मशाला उनकी गुफ्तगू का सबसे महफूज स्थान हुआ करता था। वह एक सप्ताह यहां रुके तथा आजादी की लड़ाई की कई महत्वपूर्ण योजनाओं को क्रियान्वित करने का तरीका खोजा।

सेनानी हर्षदेव ओली के प्रपौत्र राजेश ओली बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने भी यहां डेरा डाल ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ रणनीति तैयार की थी।

इसके अलावा विख्यात बैरिस्ट और अंग्रेजी अखबार इंडिपेंडेट के संपादक श्रीयुत रंगायर भी अपने बेटे के साथ यहां छह माह तक रुके। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान क्रांतिकारी मदनमोहन उपाध्याय, हरगोविंद पंत, कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडेय जैसे दिग्गजों ने भी यहां कई-कई बार बसेरा बना आजादी की लड़ाई को मुकाम तक पहुंचाया था।

भले ही पूरे देश में दो अक्तूबर को गांधी जयंती के रूप में ही ज्यादा तवज्जो दी जाती रही हो, लेकिन खेतीखान क्षेत्र में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन भी खास तरीके से मनाया जाता है। जागोली जागृति स्थली के नाम से प्रसिद्ध धर्मशाला में प्रतिवर्ष शास्त्री जी की याद में दो अक्तूबर को खीर का भंडारा लगाया जाता है, जिसमें आसपास के गांवों के लोग सहभागिता करते हैं।

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