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नरसिंह जयंती पर विशेष : कुतुब से कांची तक धर्मरक्षक नरसिंह के अद्भुत दर्शन

Sat, 14 May 2022 06:15 AM IST
tarun veejay तरुण विजय
Updated Sat, 14 May 2022 06:15 AM IST
सार

पिछले दिनों मुझे दिल्ली स्थित कुतुब मीनार परिसर में अद्भुत नरसिंह प्रतिमा मिली। प्रख्यात पुरातत्वविद और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक धर्मवीर शर्मा का कहना है कि यह नरसिंह प्रतिमा दुर्लभतम प्रतिमा है। वे दिल्ली में उत्खनन के क्षेत्रीय प्रभारी रहे हैं। यह प्रतिमा उस प्रसंग को दिखाती है, हिरण्यकश्यप के वध के बाद नरसिंह की क्रोधाग्नि से धरती जलने लगी। 

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Special on Narsingh Jayanti: Amazing vision of Dharmarakshak Narasimha from Qutub to Kanchi
नरसिंह जयंती - फोटो : amar ujala

विस्तार

नरसिंह पूजा सम्पूर्ण भारत में बहुत निष्ठा से की जाती है। पुरी में भगवान जगन्नाथ की सभी विशेष पूजाएं निकटस्थ नरसिंह मंदिर में होती हैं। नरसिंह दुष्ट और मर्यादाभंजक को दंडित करने का भी प्रतीक हैं। हिंदू सनातनी समाज कभी एकतरफा कायराना अहिंसा का समर्थक नहीं रहा। हर देवी-देवता ने दुष्ट का संहार करके धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की है। 

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नरसिंह इसी धर्म स्थापना के देव हैं, विष्णु के अवतार हैं। लक्ष्मी नरसिंह की पूजा के असंख्य लाभ गिनाए गए हैं। हिरण्यकश्यप को वरदान था। उसे न दिन में न रात में, न भीतर न बाहर, न मनुष्य न पशु मार सकते थे। माओ त्से तुंग, स्टालिन, पोल पोट और आइसिस की तरह उसका अहंकार चरम पर था, अन्याय बढ़ रहे थे। तब विष्णु ने नरसिंह अवतार लिया। 
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हिरण्यकश्यप को प्रह्लाद जैसे भक्त की रक्षा हेतु नरसिंह (न मनुष्य, न पशु) ने गोधूलि के समय (न दिन न रात) देहरी पर (न भीतर, न बाहर) मार डाला। हम्पी में हिंदू सम्राट कृष्णदेव राय ने लक्ष्मी नरसिंह की अति भव्य विराट प्रतिमायुक्त मंदिर बनवाया। कांची में भी नरसिंह मंदिर बहुत लोकप्रिय है।
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पिछले दिनों मुझे दिल्ली स्थित कुतुब मीनार परिसर में अद्भुत नरसिंह प्रतिमा मिली। प्रख्यात पुरातत्वविद और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक धर्मवीर शर्मा का कहना है कि यह नरसिंह प्रतिमा दुर्लभतम प्रतिमा है। वे दिल्ली में उत्खनन के क्षेत्रीय प्रभारी रहे हैं। यह प्रतिमा उस प्रसंग को दिखाती है, हिरण्यकश्यप के वध के बाद नरसिंह की क्रोधाग्नि से धरती जलने लगी। 


तब भक्त प्रह्लाद की प्रार्थना पर प्रसन्न होकर नरसिंह ने उन्हें गोद में बिठाया और शांत हो गए। इस प्रसंग की प्रतिमा भारत में अन्यत्र उपलब्ध नहीं होती। यह आठवीं नौवीं शती में प्रतिहार राजाओं अथवा अनंगपाल तोमर काल की हो सकती है। आशा है पुरातत्वविद इस पर और प्रकाश डालेंगे। यह प्रतिमा धार्मिक और अनुसंधानकर्ता समुदाय के लिए आकर्षण का बिंदु है। इसके चित्र पुरातत्वशास्त्रियों को विशेष अध्ययन हेतु भेजे गए हैं। (लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद हैं।)

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