{"_id":"645bb3823be0fb962d079e37","slug":"special-court-acquits-1993-mumbai-riots-case-accused-says-he-may-be-innocent-bystander-2023-05-10","type":"story","status":"publish","title_hn":"1993 Mumbai Riots: मुंबई दंगों के एक आरोपी को विशेष अदालत ने किया बरी; कहा- वह भीड़ का हिस्सा भी हो सकता है","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
1993 Mumbai Riots: मुंबई दंगों के एक आरोपी को विशेष अदालत ने किया बरी; कहा- वह भीड़ का हिस्सा भी हो सकता है
Wed, 10 May 2023 08:39 PM IST
शिव शरण शुक्ला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Wed, 10 May 2023 08:39 PM IST
सार
अभियोजन पक्ष ने दलील दी थी कि राजभर 30 साल पहले हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान करीब 300 से 400 लोगों की भीड़ में शामिल था, जो एक-दूसरे पर पत्थर और कांच की बोतलें फेंक रहे थे।
विज्ञापन
कोर्ट का फैसला
- फोटो : amar ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में 1993 में हुए सांप्रदायिक दंगों के मामले में एक विशेष कोर्ट से 46 साल के एक आरोपी को बड़ी राहत मिली है। मुंबई की विशेष कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इस मामले में विशेष कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी इस मामले में भीड़ का हिस्सा या निर्दोष दर्शक भी हो सकता है।
विज्ञापन
जानकारी के मुताबिक, 1993 के सांप्रदायिक दंगों के मामले में फरार आरोपी शिवपूजन राजभर को गिरफ्तार कर 28 मार्च 2023 को कोर्ट के समक्ष पेश किया गया था। राजभर समेत कई अन्य लोगों के खिलाफ पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत हत्या के प्रयास और गैरकानूनी जमावड़े के लिए आरोपपत्र दायर किया था। मामले में सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एए कुलकर्णी ने चार मई को राजभर को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया था। मामले के अन्य आरोपियों में से अधिकांश को पहले ही बरी किया जा चुका है।
विज्ञापन
अभियोजन पक्ष ने दी दलील
अभियोजन पक्ष ने दलील दी थी कि राजभर 30 साल पहले हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान करीब 300 से 400 लोगों की भीड़ में शामिल था, जो एक-दूसरे पर पत्थर और कांच की बोतलें फेंक रहे थे। वहीं पुलिस ने कहा था कि 1993 में हुए दंगों के दौरान भीड़ अनियंत्रित और आक्रामक थी तथा उसने घटनास्थल पर पुलिस कांस्टेबल की चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया। उस समय भीड़ एक दूसरे पर आग और ट्यूबलाइट फेंक रही थी। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज का सहारा लिया था और हवा में फायरिंग भी की।
विज्ञापन
अदालत ने आरोपी को किया बरी
सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष तीन गवाहों दो पुलिसकर्मियों और एक पंच के साक्ष्य पर निर्भर था। न्यायाधीश ने कहा कि तीनों के दिए गए सबूतों के अलावा, अपराध में आरोपियों की मिलीभगत को इंगित करने के लिए रिकॉर्ड में कुछ भी नहीं है और आरोपियों की पहचान करने के लिए कोई स्वतंत्र गवाह भी नहीं है। यह सत्य है कि 1993 में घटना घटी और इतने लंबे समय के बाद भी आरोपी को पहचानने के लिए गवाह नहीं मिल रहे हैं। यह सच है कि भीड़ में 300 से 400 लोग शामिल थे और यह पता लगाना मुश्किल है कि किसने संपत्ति को नुकसान पहुंचाने में सक्रिय रूप से भाग लिया था। हालांकि तर्क के लिए, यह मान लिया जाए कि आरोपी राजभर मौके पर मौजूद था, यह संभव हो सकता है कि वह एक ‘निर्दोष दर्शक’ हो। रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह पता चले कि अभियुक्त ने गैरकानूनी जमावड़े में सक्रिय रूप से भाग लिया था। अयोध्या में बाबरी ढांचा गिराए जाने के बाद दिसंबर 1992-जनवरी 1993 में मुंबई में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। दंगों के बाद 1993 में सीरियल बम धमाके हुए थे।