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शाह की सोशल इंजीनियरिंग की काट नहीं ढूंढ पाई सपा-बसपा

Sun, 12 Mar 2017 03:28 AM IST
राजीव जायसवाल/हिमांशु मिश्र/ अमर उजाला, नई दिल्ली
राजीव जायसवाल/हिमांशु मिश्र/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 12 Mar 2017 03:28 AM IST
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SP-BSP could not understand Shah's Social Engineering
अमित शाह - फोटो : Getty Images
उत्तर प्रदेश में पार्टी को तीन चौथाई बहुमत दिलाने के शिल्पकार भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने न सिर्फ लोकसभा चुनाव के बाद सोशल इंजीनियरिंग पर काम शुरू कर दिया था, बल्कि चुनाव के दौरान हर चरण के लिए अलग-अलग रणनीति बना कर विरोधियों को मात दी। अपनी इसी सोशल इंजीनियरिंग के सहारे शाह इस सूबे में गैरयादव पिछड़ी जातियों का यादव बिरादरी के खिलाफ, गैरजाटव बिरादरी का जाटवों के खिलाफ समानांतर ध्रुवीकरण कराने में कामयाब रहे। गरीब बनाम अमीर के मुद्दे को जमीन पर उतार कर नोटबंदी के विरोध में बना माहौल भी खत्म कर दिया। 
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पहले चरण से ही भाजपा के खिलाफ नकारात्मक संदेश न जाए, इसके लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रभावी जाट बिरादरी को मनाने के लिए खुद मैदान में उतरे। उत्तर प्रदेश की सियासी जंग जीतने के लिए लोकसभा चुनाव के बाद से ही लगातार मोर्चे पर जुटे शाह ने सभी डेढ़ लाख बूथों पर संगठन खड़ा किया और सभी बूथ प्रभारियों से सीधा संवाद किया। चुनाव प्रचार के करीब दो महीने के दौरान शाह ने 150 रैलियां कीं और 17 दिन लखनऊ से बाहर बिताकर रात में कार्यकर्ताओं से सीधी बातचीत की।
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शाह के करीबी के मुताबिक उत्तर प्रदेश में पहले चरण के मतदान से बनी हवा के अंत तक कायम रहने का ट्रेंड है। ऐसे में शाह के समक्ष आरक्षण न मिलने से नाराज जाट बिरादरी और नोटबंदी से नाराज व्यापारी वर्ग को मनाने की चुनौती थी। जाट बिरादरी को मनाने के लिए शाह ने प्रथम चरण के चुनाव से ठीक पहले केंद्रीय मंत्री चौधरी बिरेंद्र सिंह के आवास पर इस बिरादरी के सभी प्रभावशाली नेताओं से मिलकर इनकी नाराजगी दूर की। मेरठ में व्यापारी की हत्या के विरोध में रोड शो रद्द कर शाह ने इस वर्ग को भी मनाने में सफलता हासिल की। तीसरा और चौथा चरण सपा का मजबूत गढ़ रहा है।
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मंत्रिमंडल में भी सामाजिक समीकरण को ध्यान रखे जाने की तैयारी

SP-BSP could not understand Shah's Social Engineering

यहां शाह ने अखिलेश सरकार पर सभी योजनाओं-कार्यक्रमों, सरकारी नौकरियों में जातिविशेष को ही उपकृत करने का जोरशोर से प्रचार करवाया। इस कारण गैर यादव ओबीसी मतदाता पार्टी के पक्ष में खड़े हो गए। शाह को गोरखपुर और इलाहाबाद क्षेत्र में कार्यकर्ताओं के नाराज होने की खबर मिली तो इसी दो क्षेत्र को रोड शो के लिए चुना। 

इस दौरान इन क्षेत्रों में रात बिताकर नाराज नेताओं-कार्यकर्ताओं से सीधा संपर्क साधा। चुनाव को गरीब बनाम अमीर बनाने के लिए घोषणा पत्र में गरीबों से जुड़े मुद्दों को काफी अहमियत दी गई। इस कारण बसपा प्रमुख मायावती को भी चुनाव प्रचार के बीच में भाजपा की तरह ही किसानों की ऋण माफी की घोषणा करनी पड़ी।

चेहरा न पेश किए जाने की रणनीति भी शाह की थी। शाह को लगता था कि अगर ऐसा हुआ तो गैर यादव ओबीसी बिरादरी और अगड़ी जातियों में तालमेल बिठा पाना संभव नहीं होगा। सोशल इंजीनियरिंग के तहत ही गैरयादव ओबीसी वोटों को सहेजने के लिए शाह ने लोकसभा चुनाव से पहले ही अपना दल से गठबंधन किया और बाद में सुहेलदेव पार्टी के मुखिया राजभर को साधा। 

शाह ने यादवों के खिलाफ दूसरी पिछड़ी जातियों और जाटवों के खिलाफ दूसरी दलित जातियों का समानांतर ध्रुवीकरण करने के लिए इन बिरादरी से जुड़े लोगों को अधिक से अधिक टिकट दिए। अब मंत्रिमंडल में भी इसी सामाजिक समीकरण को ध्यान रखे जाने की तैयारी है।

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