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दक्षिण भारत: दो मुख्यमंत्री नई परंपराओं से पेश कर रहे मिसाल, किसी को किताबें भेंट में चाहिए तो किसी को ‘जीरो ट्रैफिक' का विशेषाधिकार पसंद नहीं
Thu, 02 Sep 2021 05:36 PM IST
प्रतिभा ज्योति
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Thu, 02 Sep 2021 05:36 PM IST
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तमिलानाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
तमिलानाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई बेशक अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग पार्टियो के मुख्यमंत्री है, लेकिन उनमें एक समानता है। दोनों राजनीति में नई परंपरा की शुरूआत कर रहे हैं और उन्हें किताबों से बहुत प्रेम है। इसलिए सत्ता संभालते ही दोनों मुख्यमंत्रियों ने अपने मिलने वालों को फूल या गुलदस्ता देने की बजाए किताबें भेंट करने को कहा है। सभी सरकारी कार्यक्रमों में फूल-माला देने पर रोक लगा दी गई है।मुख्यमंत्री का आदेश क्या हुआ तमिलनाडु और कर्नाटक के सचिवालय में इस पर तेजी से अमल हो रहा है। मिली जानकारी के मुताबिक अब इन दोनों राज्यों के सचिवालयों में आगंतुकों को मुख्यमंत्री या किसी वरिष्ठ अधिकारी से भेंट करने पर फूल या गुलदस्ता लाने से सख्ती से मना किया गया है। इसकी जगह उन्हें किताबें लाने को कहा जाता है।
एम के स्टालिन
स्टालिन किताबों को लेकर बहुत गंभीर नजर आते हैं। अगस्त महीने में उन्होंने लोगों को राष्ट्रीय पुस्तकालय दिवस की बधाई देते हुए अपने संदेश में कहा कि पुस्तकें नई दुनिया की पथ प्रदर्शक हैं। उन्होंने इस आदर्श वाक्य को स्वीकार करने का आह्वान किया-'पढ़ने को जीने के लिए जरूरी बना लीजिए'। स्टालिन ने इस मौके पर मीडिया से बातचीत में कहा "मैंने मिलने वालों से अनुरोध किया है कि वे मुझे शॉल और गुलदस्ते भेंट करने से बचें, और इसके बजाय उपहार में पुस्तकें दें।"
धुर विरोधी जयललिता की तस्वीरें स्कूल बैंग से नहीं हटाईं
तमिलनाडु की राजनीति की एक परंपरा रही है जब भी वहां सरकार बदलती है, तो सत्ताधारी दलों के लिए सार्वजनिक योजनाओं से विपक्षी पार्टियों के मुख्यमंत्री और अन्य नेताओं की तस्वीरें हटा दी जाती हैं। यह एक तरह से बदले की भावना से तो किया ही जाता है, साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री के नाम के प्रचार को रोकने के लिए भी ऐसा होता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने यहां भी एक नया कदम उठाया है।
उन्होंने 65 लाख स्कूल बैग पर अपने धुर विरोधी अन्नाद्रमुक के पूर्व मुख्यमंत्रियों जे जयललिता और एडप्पादी के पलानीवानी की तस्वीरें नहीं हटाने का फैसला किया। बैग सरकारी स्कूल के छात्रों को मुफ्त में बांटने के लिए थे। इस कदम से उन्होंने राजनीति में एक नई परंपरा की शुरूआत की है साथ ही सरकारी खजाने के 13 करोड़ रुपये भी बचा लिए हैं।
एमके स्टालिन
- फोटो :
पीटीआई
दक्षिण भारत की राजनीति के जानकार कहते हैं कि यह फिजूलखर्जी रोकने की दिशा में उठाया गया ऐसा कदम है जो दूसरे राज्यों में भी लागू होना चाहिए। विश्लेषकों का कहना है कि पहली बार मुख्यमंत्री बने एम के स्टालिन प्रशासन में पारदर्शी शासन पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और खर्चे को रोकना इसमें अहम है। स्टालिन कोई करुणानिधि (उनके पिता) नहीं हैं, लेकिन तमिलनाडु की राजनीति में अपनी छवि को इस तरह से रीब्रांड कर रहे हैं।
हालांकि तमिलनाडु के वरिष्ठ पत्रकार आर राजगोपालन इससे अलग राय रखते हैं। उनका कहना है स्टालिन जो कर रहे हैं उसमें कोई नया बदलाव नहीं है। वे बस दिखावे की राजनीति कर रहे हैं। 100 दिन की सरकार हो गई है और लोगों की मिलीजुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। स्कूल बैग से जयललिता की फोटो नहीं हटाई लेकिन एक यूनिवर्सिटी से जयललिता का नाम हटा दिया है। यह तो गलत है। वहीं स्टालिन के कुछ आलोचक कहते हैं कि फूल-गुलदस्ता बंद कराने का फैसला कोरोना के कारण किया गया है।
बसवराज बोम्मई
वहीं कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी कुछ ऐसे कदम उठा रहे हैं जो भारतीय जनता पार्टी में चर्चा का विषय बन गया है। बोम्मई ने मुख्यमंत्री पद संभालते ही पार्टी कार्यकर्ताओं और आगंतुकों से उन्हें माला या गुलदस्ता न देने के लिए कहा है, हां यदि वे अपने साथ कुछ लाना चाहते हैं तो किताबें ला सकते हैं। मिली जानकारी के मुताबिक कैबिनेट मंत्रियों को भी इसी निर्देश का पालन करने को कहा गया है।
मुख्यमंत्री ने सरकारी कार्यक्रमों में गुलदस्ता, माला और स्मृति चिन्ह देने की प्रथा को खत्म करने का आदेश दिया है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि यह आम चलन राज्य में समाप्त होना चाहिए क्योंकि यह एक 'अनावश्यक खर्च' हैं। इसके बजाय, उन्होंने गणमान्य व्यक्तियों को कन्नड़ किताबें उपहार में देने की वकालत की। इसके बाद मुख्य सचिव पी रवि कुमार ने मुख्यमंत्री के निर्देश पर एक सर्कुलर जारी कर दिया।
हालांकि तमिलनाडु के वरिष्ठ पत्रकार आर राजगोपालन इससे अलग राय रखते हैं। उनका कहना है स्टालिन जो कर रहे हैं उसमें कोई नया बदलाव नहीं है। वे बस दिखावे की राजनीति कर रहे हैं। 100 दिन की सरकार हो गई है और लोगों की मिलीजुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। स्कूल बैग से जयललिता की फोटो नहीं हटाई लेकिन एक यूनिवर्सिटी से जयललिता का नाम हटा दिया है। यह तो गलत है। वहीं स्टालिन के कुछ आलोचक कहते हैं कि फूल-गुलदस्ता बंद कराने का फैसला कोरोना के कारण किया गया है।
बसवराज बोम्मई
वहीं कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी कुछ ऐसे कदम उठा रहे हैं जो भारतीय जनता पार्टी में चर्चा का विषय बन गया है। बोम्मई ने मुख्यमंत्री पद संभालते ही पार्टी कार्यकर्ताओं और आगंतुकों से उन्हें माला या गुलदस्ता न देने के लिए कहा है, हां यदि वे अपने साथ कुछ लाना चाहते हैं तो किताबें ला सकते हैं। मिली जानकारी के मुताबिक कैबिनेट मंत्रियों को भी इसी निर्देश का पालन करने को कहा गया है।
मुख्यमंत्री ने सरकारी कार्यक्रमों में गुलदस्ता, माला और स्मृति चिन्ह देने की प्रथा को खत्म करने का आदेश दिया है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि यह आम चलन राज्य में समाप्त होना चाहिए क्योंकि यह एक 'अनावश्यक खर्च' हैं। इसके बजाय, उन्होंने गणमान्य व्यक्तियों को कन्नड़ किताबें उपहार में देने की वकालत की। इसके बाद मुख्य सचिव पी रवि कुमार ने मुख्यमंत्री के निर्देश पर एक सर्कुलर जारी कर दिया।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई
- फोटो :
एएनआई
‘जीरो ट्रैफिक’ का विशेषाधिकार भी नहीं चाहिए
मुख्यमंत्री ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि जब तक कोई बड़ा आयोजन नहीं हो, वह जब जिलों के दौरे पर जाएं तो उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर न दिया जाए। बोम्मई ने अपने इस फैसले के बारे में संवाददाताओं से कहा था "मैंने कहा है कि हवाई अड्डों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर गार्ड ऑफ ऑनर की कोई आवश्यकता नहीं है। हर बार जब मैं कहीं जिले में जाता हूं वहां भी इसकी जरूरत नहीं है। बोम्मई ने मुख्यमंत्री के काफिले के लिए आपात स्थिति को छोड़कर जीरो-ट्रैफिक का विशेषाधिकार नहीं देने का निर्देश दिया है।
कर्नाटक के अखबार डेक्कन हेराल्ड के राजनीतिक संपादक आनंद मिश्रा कहते हैं वीआईपी कल्चर खत्म रोकने के लिए कोई भी सरकार प्रयास करती है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। मोदी सरकार ने लाल बत्ती का चलन बंद कर दिया। आनंद कहते हैं वीआईपी को मिलने वाली वे सुविधाएं जो उन्हें आम लोगों से अलग करती हैं, यदि वे बंद हो जाती है तो यह अच्छी पहल है। प्रणब मुखर्जी भी जब राष्ट्रपति भवन पहुंचे थे कुछ ऐसे कदम उठाए थे जिससे फिजूलखर्ची रोकी जा सके। वोम्मई ने भी इसी तरह फूल और गुदस्तों पर रोक लगाकर एक तरह से फिजूलखर्जी रोकने की दिशा में एक कदम उठाया है।
मुख्यमंत्री कार्यलय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि सीएम बोम्मई बंगलूरू में आने-जाने के लिए 'जीरो ट्रैफिक' के विशेषाधिकार को नहीं चाहते हैं। बंगलूरु के ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ ट्रैफिक बी आर रविकांत गौड़ा ने कहा कि चूंकि सीएम ने कोई विशेष विशेषाधिकार नहीं रखने की इच्छा जताई है, इसलिए इस संबंध में एक आदेश जारी किया गया है। बाद में पुलिस को वीआईपी को गार्ड ऑफ ऑनर नहीं देने का सर्कुलर जारी किया। सूत्रों के मुताबिक बोम्मई के इस कदम की केंद्रीय नेता भी प्रशंसा कर रहे हैं और दूसरे राज्य के पार्टी नेताओं को अब उनका अनुकरण करने की सलाह दी गई है।
मुख्यमंत्री ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि जब तक कोई बड़ा आयोजन नहीं हो, वह जब जिलों के दौरे पर जाएं तो उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर न दिया जाए। बोम्मई ने अपने इस फैसले के बारे में संवाददाताओं से कहा था "मैंने कहा है कि हवाई अड्डों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर गार्ड ऑफ ऑनर की कोई आवश्यकता नहीं है। हर बार जब मैं कहीं जिले में जाता हूं वहां भी इसकी जरूरत नहीं है। बोम्मई ने मुख्यमंत्री के काफिले के लिए आपात स्थिति को छोड़कर जीरो-ट्रैफिक का विशेषाधिकार नहीं देने का निर्देश दिया है।
कर्नाटक के अखबार डेक्कन हेराल्ड के राजनीतिक संपादक आनंद मिश्रा कहते हैं वीआईपी कल्चर खत्म रोकने के लिए कोई भी सरकार प्रयास करती है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। मोदी सरकार ने लाल बत्ती का चलन बंद कर दिया। आनंद कहते हैं वीआईपी को मिलने वाली वे सुविधाएं जो उन्हें आम लोगों से अलग करती हैं, यदि वे बंद हो जाती है तो यह अच्छी पहल है। प्रणब मुखर्जी भी जब राष्ट्रपति भवन पहुंचे थे कुछ ऐसे कदम उठाए थे जिससे फिजूलखर्ची रोकी जा सके। वोम्मई ने भी इसी तरह फूल और गुदस्तों पर रोक लगाकर एक तरह से फिजूलखर्जी रोकने की दिशा में एक कदम उठाया है।
मुख्यमंत्री कार्यलय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि सीएम बोम्मई बंगलूरू में आने-जाने के लिए 'जीरो ट्रैफिक' के विशेषाधिकार को नहीं चाहते हैं। बंगलूरु के ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ ट्रैफिक बी आर रविकांत गौड़ा ने कहा कि चूंकि सीएम ने कोई विशेष विशेषाधिकार नहीं रखने की इच्छा जताई है, इसलिए इस संबंध में एक आदेश जारी किया गया है। बाद में पुलिस को वीआईपी को गार्ड ऑफ ऑनर नहीं देने का सर्कुलर जारी किया। सूत्रों के मुताबिक बोम्मई के इस कदम की केंद्रीय नेता भी प्रशंसा कर रहे हैं और दूसरे राज्य के पार्टी नेताओं को अब उनका अनुकरण करने की सलाह दी गई है।