Supreme Court: खास मामलों में अधिकारियों की भौतिक पेशी, पोशाक के लिए भी सलाह; जानें केंद्र की SoP में क्या
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि शीर्ष अदालत के विचार के लिए पेश किए गए एसओपी को सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों और अन्य सभी अदालतों के समक्ष सरकार से संबंधित मामलों की सभी कार्यवाही में लागू किया जाना चाहिए।
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केंद्र सरकार ने अदालतों में सरकारी अफसरों की पेशी को लेकर शीर्ष कोर्ट में मानक संचालन प्रक्रिया के लिए अपने सुझाव पेश किए हैं। बुधवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अवमानना कार्यवाही सहित अदालती कार्यवाही में सरकारी अधिकारियों की उपस्थिति के संबंध में शीर्ष अदालत में एसओपी का उद्देश्य न्यायपालिका और सरकार के संबंधों में सुधार लाना बताया। इस मसौदे में सरकार ने कहा है कि सरकारी अधिकारियों को असाधारण और बहुत जरूरी होने पर ही भौतिक रूप से अदालत में पेश होने के लिए कहा जाए। सामान्य मामलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से ही उन्हें पेश होने की सहूलियत दी जाए। साथ ही सरकारी अधिकारियों की शैक्षिक पृष्ठभूमि पर टिप्पणी करने से बचने का भी सुझाव दिया गया है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि शीर्ष अदालत के विचार के लिए पेश किए गए एसओपी को सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों और अन्य सभी अदालतों के समक्ष सरकार से संबंधित मामलों की सभी कार्यवाही में लागू किया जाना चाहिए। जो अपने संबंधित अपीलीय या मूल क्षेत्राधिकार के तहत या अदालत की अवमानना से संबंधित कार्यवाही की सुनवाई कर रहे हैं।
इस एसओपी मसौदे में कहा गया है कि अदालतों को सरकारी अफसरों को किसी मामले में पेशी के लिए बुलाने से पहले अग्रिम सूचना देनी चाहिए। अदालतों को अधिकारियों की पोशाक पर टिप्पणी करने से भी बचना चाहिए, जब तक कि उनका पहनावा गैर-पेशेवर या उनके पद के हिसाब से अशोभनीय न हो। इसमें कहा गया है कि अधिकारियों को बुलाते समय अदालतें संयम बरतें। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये अधिकारियों को पेशी की अनुमति मिले, इससे अदालत और सरकार दोनों के समय और संसाधनों की बचत होगी।
नियमित नहीं, असाधारण मामलों में ही हो अफसरों की पेशी
एसओपी में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति केवल असाधारण मामलों में ही हो, न कि नियमित रूप में। अगर सरकारी अधिकारी के पास अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के अलावा कोई विकल्प नहीं हो तो व्यक्तिगत उपस्थिति के लिए उचित नोटिस और पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। असाधारण मामलों में भी सरकारी अधिकारी को पहले विकल्प के रूप में वीसी (वीडियो कॉन्फ्रेंस) के माध्यम से पेश होने की अनुमति दी जानी चाहिए।
पटना हाईकोर्ट के मामले का उल्लेख
एसओपी में पटना हाईकोर्ट के समक्ष सुनवाई का एक उदाहरण भी दिया गया है जिसमें विचाराधीन अधिकारी राज्य में आवास और शहरी विकास के प्रधान सचिव थे। सुनवाई के लिए उन्होंने औपचारिक सफेद शर्ट और पैंट पहन रखी थी, लेकिन पोशाक के कारण उन्हें फटकार लगाई गई। न्यायाधीश ने आगे पूछा कि क्या वह मसूरी में सिविल सेवा प्रशिक्षण संस्थान में गए थे और क्या उन्होंने उन्हें यह नहीं बताया था कि अदालत में कैसे पेश होना है।
अपने अवमानना मामले को न सुने न्यायाधीश
अवमानना कार्यवाही के संबंध में इसमें कहा गया है कि न्यायाधीश को आदर्श रूप से अपने आदेशों से संबंधित अवमानना कार्यवाही पर नहीं विचार करना चाहिए। यह प्राकृतिक न्याय का एक स्थापित सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति उस मामले में न्यायाधीश नहीं बन सकता जिसमें उसका हित हो या दूसरे शब्दों में कहें तो वह अपने मामले में न्यायाधीश नहीं बन सकता।
कार्यपालिका के क्षेत्र में दखल देने से बचें
एसओपी में यह भी कहा गया है कि अदालतों को उन मामलों को निपटाने से बचना चाहिए जिनका समाधान केवल कार्यपालिका के अधीन वाले वाले कार्यकारी/प्रशासन-संबंधित निर्णय के माध्यम से हल किया जा सकता है। अदालत के समक्ष सार्वजनिक नीति से जुड़े मामले, जो न केवल केंद्र सरकार बल्कि राज्यों और अन्य हितधारकों पर भी व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं, पर फैसला सुनाने से पहले कानून के मुद्दे को निपटाने में सावधानी बरतने की सिफारिश की जा सकती है। यह भी कहा कि यदि सरकार की ओर से समय सीमा को संशोधित करने का अनुरोध किया जाता है तो अदालत ऐसे न्यायिक आदेशों के अनुपालन के लिए उचित समय दे सकती है।