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'घर' में ही रही कमान, सोनिया गांधी कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष बनीं

Sun, 11 Aug 2019 10:52 AM IST
योगेश साहू न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: योगेश साहू Updated Sun, 11 Aug 2019 10:52 AM IST
सार

  • राहुल के इस्तीफे के 77वें दिन हुई कांग्रेस कार्यसमिति बैठक में फैसला
  • नए अध्यक्ष के चुनाव होने तक सोनिया ही देंगी पार्टी को संजीवनी
  • तीन प्रस्ताव पारित, राहुल के नेतृत्व की तारीफ

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Sonia Gandhi again became interim president of Congress gets command after 17 years all updates
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक खत्म होने के बाद बाहर आतीं सोनिया गांधी। - फोटो : PTI

विस्तार

गांधी परिवार से इतर मुखिया चुनने की कवायद के बीच कांग्रेस कार्यसमिति ने एक बार फिर सोनिया गांधी के नेतृत्व पर ही भरोसा जताया है। शनिवार को दो दौर में हुई मैराथन बैठकों के बाद 1998 से 2017 तक पार्टी की कमान संभालने वालीं सोनिया को अंतरिम अध्यक्ष चुना गया। पार्टी नए मुखिया के चुनाव तक वही पार्टी की कमान संभालेंगी। इससे पहले सोनिया और राहुल गांधी पहले दौर की बैठक बीच में ही छोड़कर चले गए थे। उनका कहना था कि वे अध्यक्ष की चयन प्रक्रिया में शामिल नहीं होना चाहते। ताकि किसी पर राय पर उनका प्रभाव न पड़े।
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दिनभर चली बैठक के बाद देर रात राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद ने बताया कि कार्यसमिति के पांच समूहों की रिपोर्ट और नेताओं से रायशुमारी में सोनिया का नाम ही अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर सामने आया। पहले तो उन्होंने इनकार कर दिया था, मगर वरिष्ठï नेताओं के बेहद आग्रह पर उन्होंने पार्टी की कमान संभालने के लिए हामी भर दी।
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राहुल का इस्तीफा मंजूर, तीन प्रस्ताव पास
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बताया कि बैठक में तीन प्रस्ताव पास किए गए। पहला प्रस्ताव यह था कि राहुल गांधी ने पार्टी को शानदार नेतृत्व दिया। उनसे अध्यक्ष पद पर बने रहने की गुजारिश की गई, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। दूसरे प्रस्ताव में कार्यसमिति ने सोनिया से अंतरिम अध्यक्ष बनने की मांग की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। तीसरा प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर को लेकर है, जिसमें राज्य के मौजूदा हालात को लेकर चिंता जताई गई।

दिन की रायशुमारी के बाद रात 8 बजे कार्यसमिति की बैठक दोबारा शुरू हुई। इसमें सोनिया, प्रियंका गांधी, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया और एके एंटनी समेत कई बड़े नेता मौजूद रहे। काफी कहने के बाद राहुल भी बैठक में पहुंचे। सभी पांचों समूहों ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अधिकतर नेताओं ने राहुल को ही कमान सौंपने की बात कही है।

अध्यक्ष के नाम को लेकर पांच समूहों ने देश भर से आए प्रदेश अध्यक्ष, विधानसभाओं में दल के नेता, सांसद आदि से राय जानी।

राहुल आए बोले, कश्मीर पर स्थिति साफ करे सरकार और लौट गए

जब कार्यसमिति की बैठक चल ही रही थी, तभी अचानक राहुल ने मीडिया के सामने आकर पार्टी के अध्यक्ष पद के चयन पर कुछ न बोलकर उल्टे जम्मू-कश्मीर में हो रही हिंसा को लेकर सरकार को घेरा। उन्होंने कहा, सरकार को बताना चाहिए कि वहां क्या चल रहा है। इतना कहकर राहुल चले गए। जब उनसे पूछा गया कि अध्यक्ष के चयन का क्या हुआ तो उन्होंने कहा जम्मू-कश्मीर पर चर्चा की वजह से बैठक रोकनी पड़ी।

राहुल ने कहा, कश्मीर में हालात बहुत खराब हैं। कुछ रिपोर्टों में जम्मू-कश्मीर में हिंसा की खबरें चल रही हैं। यह बेहद चिंताजनक है। सरकार को यह बताना चाहिए कि वहां क्या हो रहा है। कार्यसमिति की बैठक रोक दी गई और यह रिपोर्ट आई कि जम्मू-कश्मीर में हालात बदतर हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार को पारदर्शिता के साथ देश को यह बताना चाहिए कि वहां क्या हो रहा है।

राहुल का दावा बेबुनियाद साबित
लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद आलोचकों के निशाने पर आए राहुल गांधी ने 25 मई को इस्तीफा दे दिया था। उस वक्त राहुल ने साफ तौर पर कहा था कि गांधी परिवार का कोई व्यक्ति अध्यक्ष नहीं बनेगा और वह इसकी चयन प्रक्रिया में भी शामिल नहीं होंगे।

इन पांच समूहों ने जानी थी राय

नेताओं की राय जानने के लिए कार्यसमिति के सदस्यों को पांच समूहों में बांटा गया था। पूर्वोत्तर क्षेत्र के समूह में अहमद पटेल, अंबिका सोनी और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत थे। पूर्वी क्षेत्र के समूह में संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी सैलजा थे। उत्तरी क्षेत्र समूह में प्रियंका गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया और पी चिदंबरम थे।

पश्चिमी क्षेत्र समूह में गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खडग़े, एके एंटनी और मोतीलाल वोरा थे। वहीं, दक्षिणी समूह में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, आनंद शर्मा और मुकुल वासनिक थे। इनके अलावा बैठक में पहुंचे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, उनके डिप्टी सचिन पायलट, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पुड्ïडुचेरी के सीएम वी नारायणसामी से भी राय मांगी गई।

19 साल संभाल चुकीं कांग्रेस की कमान
सोनिया गांधी 19 साल तक कांग्रेस की अध्यक्ष रह चुकी हैं। सीताराम केसरी के बाद 14 मार्च 1998 को उन्होंने अध्यक्ष पद संभाला और 16 दिसंबर 2017 तक इस पद पर रहीं। 17 दिसंबर 2017 को राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने। राहुल ने 3 जुलाई, 2019 को अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था।

सोनिया गांधी के सामने हैं ये आठ बड़ी चुनौतियां

- सोनिया गांधी भले ही अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर कार्यभार संभालेंगी। लेकिन इसके बावजूद वर्तमान दौर में कांग्रेस को उबारना उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा। केंद्र सरकार के लगातार दो बार के कार्यकाल के कामकाज, फैसलों और उठाए गए मुद्दों के बीच उभरकर सामने आए भाजपा नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तिलिस्म को तोड़ना इनमें सबसे बड़ी चुनौती होगी।

- भारतीय जनता पार्टी की आक्रामक प्रचार शैली के साथ शुरू हुए सदस्यता अभियान के साथ ही कांग्रेस की लोकप्रियता में भी गिरावट देखने को मिली है। वहीं कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी फूट किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में जमीन खोती जा रही पार्टी को टूट और बिखराव से बचाना सोनिया के लिए चुनौती होगी।

- इधर भाजपा अपने प्रचार अभियान के दौरान राजनीति में युवाओं और युवा चेहरों पर फोकस करती रही है। ऐसे में कांग्रेस के भीतर युवा और बुजुर्ग नेताओं के बीच मौजूद वैचारिक मतभेदों को दूर कर आपसी सामंजस्य बिठाना भी किसी चुनौती से कम नहीं।

- इसके साथ ही आने वाले समय में होने वाले कई राज्यों के चुनाव में कांग्रेस पार्टी के प्रदर्शन को सुधारने के लिए भी सोनिया गांधी को खासी मशक्कत करनी होगी। पार्टी का जनाधार बचाए रखने के लिए यह सबसे जरूरी है।

- अनुच्छेद 370 जैसे अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर तत्काल पार्टी लाइन तय करना बेहद जरूरी होगा। ताकि ऐसे मुद्दों पर सीधे जनता और देश से जुड़ाव का संदेश दिया जा सके। 

- पार्टी के देशभर में मौजूद तमाम कार्यकर्ताओं में लगातार दो आम चुनावों 2014, 2019 की हार से निराशा का भाव है। ऐसे में सुस्त पड़े कार्यकर्ताओं के दोबारा जोश और उत्साह भरना भी काफी चुनौती भरा होगा।

- सोनिया गांधी को पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी के बीच बेहतर राजनीतिक इस्तेमाल और भूमिका तय करनी होंगी। ताकि पार्टी अपनी खोती हुई जमीन को वापस पाने के लिए आगे बढ़ सके।

- अंत में सबसे अहम बात होगी पार्टी के ऐसे नेताओं पर लगाम कसना जो विवादित बयानों को लेकर जाने जाते हैं। यह इसलिए भी जरूरी होगा क्योंकि मोदी सरकार के समक्ष किसी भी मुद्दे पर पार्टी लाइन से हटकर बयान देने का असर कांग्रेस की छवि पर पड़ सकता है।
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