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Religion: हिंदू धर्म ग्रंथ ऋग्वेद में 6,000 साल पहले सूर्य ग्रहण का उल्लेख; अधिकांश घटनाएं ग्रंथ में मौजूद
Thu, 05 Sep 2024 06:32 AM IST
विशांत श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: विशांत श्रीवास्तव
Updated Thu, 05 Sep 2024 06:32 AM IST
सार
खगोलविदों के मुताबिक हिंदू धर्मग्रंथ ऋग्वेद में 6,000 साल पहले सूर्य ग्रहण का उल्लेख मिला है। ग्रंथ में कुछ घटनाएं और भी पुरानी हैं।
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ऋग्वेद में सूर्य ग्रहण का जिक्र।
- फोटो : Istock
विस्तार
प्राचीन हिंदू धर्म ग्रंथ ऋग्वेद में 6,000 साल पहले सूर्य ग्रहण का उल्लेख मिला है। खगोलविदों के मुताबिक, लगभग 1500 ईसा पूर्व संकलित ऋग्वेद ऐतिहासिक घटनाओं के अभिलेखों के साथ-साथ विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक विचारधाराओं से संबंधित कथनों व भजनों का एक संग्रह है। इनमें से अधिकांश घटनाएं उस समय की हैं जब ग्रंथ लिखा गया था।
इसके अलावा कुछ और अधिक पुरानी भी हैं। जर्नल ऑफ एस्ट्रोनॉमिकल हिस्ट्री एंड हेरिटेज में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के खगोलविद मयंक वाहिया व जापान की नेशनल एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरी के मित्सुरु सोमा ने इसका खुलासा किया है। ऋग्वेद के विभिन्न अंशों में वसंत विषुव (सूर्य उत्तर की ओर जाते हुए आकाशीय भूमध्य रेखा को पार करता है) के दौरान उगते सूर्य के स्थान का उल्लेख किया गया है, इसमें एक संदर्भ में बताया गया है कि यह घटना ओरियन में हुई थी, जबकि दूसरे में कहा गया है कि यह प्लेइड्स (सितारों के समूह) में हुई थी। ग्रंथ में सूर्य के अंधकार और दुष्ट प्राणियों द्वारा सूर्य की जादुई कलाओं को लुप्त करने के बारे में बताया गया है।
हालांकि, इनका राहु और केतु की कहानी से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि वे अधिक आधुनिक मिथक हैं। जबकि, ऋग्वेद उनसे काफी पुराना है।
इन उल्लेखों के बाद के अंशों ने खगोलविदों को पूर्ण सूर्य ग्रहण की समय सीमा को भी बताया है, जिससे पता चलता है कि यह घटना शरद विषुव से तीन दिन पहले हुई थी।
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इसके अलावा कुछ और अधिक पुरानी भी हैं। जर्नल ऑफ एस्ट्रोनॉमिकल हिस्ट्री एंड हेरिटेज में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के खगोलविद मयंक वाहिया व जापान की नेशनल एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरी के मित्सुरु सोमा ने इसका खुलासा किया है। ऋग्वेद के विभिन्न अंशों में वसंत विषुव (सूर्य उत्तर की ओर जाते हुए आकाशीय भूमध्य रेखा को पार करता है) के दौरान उगते सूर्य के स्थान का उल्लेख किया गया है, इसमें एक संदर्भ में बताया गया है कि यह घटना ओरियन में हुई थी, जबकि दूसरे में कहा गया है कि यह प्लेइड्स (सितारों के समूह) में हुई थी। ग्रंथ में सूर्य के अंधकार और दुष्ट प्राणियों द्वारा सूर्य की जादुई कलाओं को लुप्त करने के बारे में बताया गया है।
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हालांकि, इनका राहु और केतु की कहानी से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि वे अधिक आधुनिक मिथक हैं। जबकि, ऋग्वेद उनसे काफी पुराना है।
इन उल्लेखों के बाद के अंशों ने खगोलविदों को पूर्ण सूर्य ग्रहण की समय सीमा को भी बताया है, जिससे पता चलता है कि यह घटना शरद विषुव से तीन दिन पहले हुई थी।
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