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सुप्रीम कोर्ट: EWS श्रेणी में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत कोटा देने पर केंद्र से SC के सवाल

Wed, 21 Sep 2022 10:18 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Wed, 21 Sep 2022 10:18 PM IST
सार

पीठ ने कहा कि ईडब्ल्यूएस कोटे के खिलाफ दलीलें दी गई हैं कि एससी, एसटी और ओबीसी के गरीबों को उनकी जाति के आधार पर इस श्रेणी से बाहर रखा गया है।  

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Slice of cake of general seats for creamy layer OBCs reduced from 50 to 40 percent, observes SC
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ईडब्ल्यूएस श्रेणी में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत कोटा देने पर केंद्र से कई सवाल पूछे। मुख्य न्यायाधीश यू यू ललित की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने ईडब्ल्यूएस कोटा का विरोध करने वालों की दलीलों का जिक्र किया और कहा कि 10 प्रतिशत आरक्षण सामान्य वर्ग के लिए उपलब्ध सीटों पर अतिक्रमण कर रहा है, जो सभी मेधावी उम्मीदवारों के लिए खुला है और शीर्ष अदालत का उल्लंघन है। अदालत का फैसला है कि 50 प्रतिशत सीटों को खुली श्रेणी में उपलब्ध कराया जाना है और इसे दूसरों को नहीं दिया जा सकता।

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अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए केंद्र ने 103 वें संवैधानिक संशोधन का जोरदार बचाव करते हुए कहा कि इसके तहत प्रदान किया गया आरक्षण अलग था और सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) के लिए निर्धारित 50 प्रतिशत कोटा को छेड़े किए बिना दिया गया था। इसलिए, संशोधित प्रावधान संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता है।
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पीठ ने कहा कि ईडब्ल्यूएस कोटे के खिलाफ दलीलें दी गई हैं कि एससी, एसटी और ओबीसी के गरीबों को उनकी जाति के आधार पर इस श्रेणी से बाहर रखा गया है। एक खुली श्रेणी के रूप में व्यवहार किया जाना चाहिए। इसलिए यह एक साफ दिखने वाली चीज है। प्रदर्शन के आधार पर आप योग्यता में आते हैं। खुली श्रेणी में कोई भी इसमें आ सकता है। एक बार जब आप 10 प्रतिशत प्रतिबंध लगा देते हैं, तो आप जाति के आधार पर कुछ वर्गों को बाहर कर रहे हैं। यह उन लोगों के लिए आरक्षित है जिनके पास कोई आरक्षण नहीं है। जहां तक ओबीसी और एससी और एसटी का सवाल है, 50 प्रतिशत आरक्षित वर्ग में उनका ध्यान रखा गया है। वेणुगोपाल ने कहा कि अब तक क्रीमी लेयर को सामान्य वर्ग की सीटों पर ही मुकाबला करना होगा।

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दवा कंपनियों पर नियंत्रण के लिए समिति गठित
सरकार ने फार्मा कंपनियों द्वारा दवाओं और उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए प्रलोभन देने के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाने की तैयारी कर ली है। इस पर नकेल कसने के लिए उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है, जो 90 दिनों के भीतर अपनी सिफारिशें देंगी। इसका गठन केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री मनसुख मांडविया के अनुरोध पर किया गया है।

जानकारी के मुताबिक, नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. वी के पॉल की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति दवा मार्केटिंग व्यवहार की समान संहिता (यूसीपीएमपी) से संबंधित विभिन्न मुद्दों की भी समीक्षा करेगी। इसमें फार्मा विभाग की सचिव एस अपर्णा, केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के चेयरमैन नितिन गुप्ता शामिल हैं और दवा विभाग के संयुक्त सचिव (नीति) सदस्य सचिव के तौर पर शामिल हैं।

जानकारी के मुताबिक, 12 सितंबर को कार्यालय की ओर से एक ज्ञापन जारी किया गया है। इसमें लिखा है कि दवा विभाग ने फार्मा कंपनियों के लिए एक आचार संहिता यूसीपीएमपी भी लागू की है, जो एक जनवरी, 2015 से प्रभावी है।

लंबित मामलों पर होगी प्रतिदिन सुनवाई, शीर्ष अदालत ने नए मामलों को सूचीबद्ध करने के नियम में किया बदलाव
सुप्रीम कोर्ट ने नए मामलों को सूचीबद्ध करने के नियम में बदलाव किया है। इसके तहत मिश्रित मामले, जिन पर सुनवाई नहीं हो पाती है, उनको अगले दिन सुनने का नियम बनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में एक परिपत्र जारी किया है। इसके अनुसार जिन मिश्रित मामलों पर सुनवाई मंगलवार को नहीं हो पाएगी उनको अगले दिन बुधवार के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। बुधवार के मामलों को अगले दिन बृहस्पतिवार के लिए।

इसी प्रकार जिन मामलों पर सुनवाई बृहस्पतिवार को नहीं हो पाएगी, उनको अगले सप्ताह मंगलवार के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। संबंधित पीठ उन मामलों पर विचार करेगी। सूत्रों के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित की अध्यक्षता में बीते मंगलवार को एक पूर्ण-न्यायालय बैठक का आयोजन हुआ था। इसमें लंबित मामलों के बोझ को कम करने और नए मामलों की लिस्टिंग सिस्टम जैसे विषयों पर चर्चा हुई थी।

दो अलग-अलग शिफ्ट में काम कर रहे हैं न्यायाधीश
नई प्रणाली के तहत प्रत्येक सप्ताह के सोमवार और शुक्रवार को 30 न्यायाधीशों को दो समूहों में बैठना होता है और प्रत्येक बेंच को नई जनहित याचिकाओं समेत 60 से अधिक मिश्रित मामलों पर सुनवाई करनी होती है। यह व्यवस्था भी की गई है कि मंगलवार, बुधवार और बृहस्पतिवार को जज तीन-तीन के समूह में बैठेंगे और पहले (सुबह के सत्र में) उन मामलों पर विस्तृत सुनवाई करेंगे, जो एक साल पुराने हैं। लंच के बाद न्यायाधीश दो-दो के समूह में बैठेंगे और पहले स्थानांतरित याचिकाओं पर सुनवाई करेंगे। इसके बाद जनहित याचिकाओं समेत 20 से 30 ताजा मामलों पर सुनवाई करेंगे।

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