फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Skinny robot opened the secret of melting glaciers, Icefin Robot reached 1925 feet in Doomsday

सफलता: पेंसिल जितने पतले रोबोट ने खोला ग्लेशियरों के पिघलने का रहस्य, डूम्सडे में 1925 फुट नीचे पहुंचा आईसफिन

Fri, 17 Feb 2023 05:37 AM IST
देव कश्यप एजेंसी, नई दिल्ली।
एजेंसी, नई दिल्ली। Published by: देव कश्यप Updated Fri, 17 Feb 2023 05:37 AM IST
सार

शोधार्थी एरिन पेटिट ने कहा कि हमने पांच साल पहले जो सोचा था, उसके बदलने की रफ्तार उससे कहीं ज्यादा है। मुझे तो लगता है कि आने वाले कुछ वर्षों में यह और भी बदलेगी और तेज होती जाएगी।

विज्ञापन
Skinny robot opened the secret of melting glaciers, Icefin Robot reached 1925 feet in Doomsday
Icefin Robot - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

पेंसिल जितने पतले रोबोट ने ग्लेशियर के पिघलने के रहस्य का पता लगा लिया है। 13 फुट लंबा आईसफिन नामक रोबोट ने तैरते हुए अंटार्कटिक में डूम्सडे (प्रलयंकारी ग्लेशियर कहे जाने वाले हिमखंड) के नीचे उस जगह पहुंचा, जहां समुद्र का पानी बर्फ बनना शुरू होता है। यह जगह करीब 1925 फुट नीचे थी। वैज्ञानिकों ने देखा कि बर्फ की यह परत सिर्फ पिघल नहीं रही, बल्कि टूट-टूटकर अलग हो रही है।

विज्ञापन


ओशनोग्राफर पीटर डेविस ने कहा कि ग्लेशियरों का पिघलना उसके नीचे हो रही प्रक्रिया का नतीजा भी हो सकता है, जहां गर्म पानी के बुलबुले बनते हैं। शोधार्थी एरिन पेटिट ने कहा कि हमने पांच साल पहले जो सोचा था, उसके बदलने की रफ्तार उससे कहीं ज्यादा है। मुझे तो लगता है कि आने वाले कुछ वर्षों में यह और भी बदलेगी और तेज होती जाएगी।
विज्ञापन


पांच करोड़ डॉलर की मदद से बहुवर्षीय शोध परियोजना पर काम हो रहा है, दुनिया के इस सबसे चौड़े हिमखंड को समझने के लिए। इस हिमखंड का आकार अमेरिका के फ्लोरिडा प्रांत जितना है। इसे डूम्सडे ग्लेशियर नाम इसलिए दिया गया था क्योंकि इस हिमखंड में इतनी बर्फ है कि अगर वो पूरी पिघल जाए तो समुद्र का जलस्तर दो फुट से ज्यादा बढ़ जाएगा और प्रलय जैसे हालात हो जाएंगे।

विज्ञापन
विज्ञापन
  • गहराई में बनने वाले गर्म पानी के बुलबुले हो सकते हैं वजह।

पहुंच से दूर थी जगह
आईसफिन को बनाने वाली कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की पोलर वैज्ञानिक ब्रिटनी श्मिट ने कहा, वैज्ञानिकों ने डूम्सडे ग्लेशियर या थॉटीज ग्लेशियर के नीचे वह जगह देखी, जहां यह तेजी से पिघल रहा है और टूट-टूट कर अलग हो रहा है। शोधकर्ता विमान से वहां नहीं जा सकते थे, क्योंकि विमान को उस जगह उतारना खतरनाक था। बर्फ में एक छेद भी नहीं किया जा सकता था, क्योंकि उससे बर्फ के और ज्यादा टूटने का खतरा था।


तेज हो रही प्रक्रिया  
नेचर पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में श्मिट ने कहा, हिमखंड पतला होकर नहीं, बल्कि टूट कर बिखर रहा है। उन्होंने कहा, ग्लेशियर में हो रहे हिमखंड से बर्फ की पूरी तह के टूटकर पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। नतीजतन यह टूटकर बिखरते हुए खत्म हो सकता है।


जितना ज्यादा टूटेंगे ग्लेशियर, उतनी पिघलेगी बर्फ
वैज्ञानिकों के मुताबिक, ग्लेशियर जितना ज्यादा टूटेगा और पीछे हटेगा, उतनी ही ज्यादा बर्फ पानी पर तैरेगी। यह समस्या इसलिए है, क्योंकि बर्फ जितने ज्यादा पानी पर तैरने आएगी, विस्थापन के कारण जलस्तर उतना ज्यादा बढ़ता जाएगा। बुरी खबर ये है कि यह टूटना डूम्सडे के पूर्वी हिस्से में हो रहा है, सबसे बड़ा और स्थिर हिस्सा माना जाता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed