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अध्ययन: मौसम के अनुसार बदल जाता है विश्व की 60 फीसदी झीलों का आकार, वैश्विक शोध में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
Mon, 09 Jun 2025 04:40 AM IST
शिव शुक्ला
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: शिव शुक्ला
Updated Mon, 09 Jun 2025 04:40 AM IST
सार
झीलों में आने वाले मौसमी उतार-चढ़ाव केवल जलीय जीवन तक सीमित नहीं रहते बल्कि उनका असर सीधे-सीधे मानवीय जीवन पर भी पड़ता है। जल संकट, कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव, मछली पालन में गिरावट और स्थानीय तापमान में असंतुलन जैसे संकट उत्पन्न हो सकते हैं।
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सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो : Adobe Stock
विस्तार
झीलें केवल स्थिर जलराशि नहीं होतीं बल्कि वे जीवंत और संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा हैं, जो मौसम के हर छोटे-बड़े बदलाव पर प्रतिक्रिया देती हैं। बांगोर विश्वविद्यालय (ब्रिटेन) और चीन के सिंघुआ विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक वैश्विक अध्ययन से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि दुनिया की लगभग 60 फीसदी झीलों की सतह का आकार मौसमी बदलावों के अनुसार घटता-बढ़ता है। यह अध्ययन वर्ष 2001 से 2023 के बीच 14 लाख झीलों पर निगरानी के आधार पर तैयार किया गया है।
अध्ययन से वैज्ञानिकों ने उपग्रह आंकड़ों के माध्यम से झीलों की सतही संरचना पर नजर रखी। शोध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डीप लर्निंग और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग जैसी तकनीकों का सहारा लिया गया, जिससे यह विश्लेषण संभव हुआ कि वर्ष भर के मौसम सर्दी,गर्मी, बारिश और सूखा किस प्रकार झीलों के आकार को प्रभावित करते हैं। अध्ययन से पता चला कि विश्व की लगभग दो-तिहाई झीलें मौसमी परिवर्तनों के अनुसार अपनी सतह का विस्तार या संकुचन करती हैं। क्षेत्रफल के हिसाब से ये झीलें पूरी दुनिया के झीलों के कुल भूभाग का 66 और संख्या के लिहाज से 60 फीसदी हैं। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि विश्व की लगभग 90 फीसदी जनसंख्या इन्हीं क्षेत्रों में निवास करती है जहां झीलें मौसम के अनुसार बदलती हैं।
झीलों के सिकुड़ने से मीथेन जैसी हानिकारक गैसें फैलने का खतरा
झीलों के अचानक सिकुड़ने से तल में जमी गाद और तलछट सतह पर आ जाते हैं, जिससे मीथेन जैसी हानिकारक गैसें का वातावरण में फैलने का खतरा बढ़ जाता है। यह स्थानीय जलवायु को प्रभावित करता है और झीलों की जैव विविधता खतरे में पड़ सकती है। बदलावों से झीलों की खाद्य श्रृंखला भी प्रभावित होती है। शैवालों की मात्रा में असंतुलन, जलीय जीवों के आवास में बदलाव और पौधों की संरचना में विचलन जैसे दुष्परिणाम देखने को मिलते हैं।
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मानव जीवन के लिए भी है खतरे की घंटी
झीलों में आने वाले मौसमी उतार-चढ़ाव केवल जलीय जीवन तक सीमित नहीं रहते बल्कि उनका असर सीधे-सीधे मानवीय जीवन पर भी पड़ता है। जल संकट, कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव, मछली पालन में गिरावट और स्थानीय तापमान में असंतुलन जैसे संकट उत्पन्न हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने इस बात पर बल दिया है कि मौसमी बदलावों की सटीक निगरानी और समझ ही झीलों के संरक्षण, ताजे जल के संसाधनों के सुव्यवस्थित प्रबंधन और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए अनिवार्य है। यह अध्ययन वैश्विक जलवायु नीति निर्धारण में भी दिशा-निर्देश प्रदान कर सकता है।
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अध्ययन से वैज्ञानिकों ने उपग्रह आंकड़ों के माध्यम से झीलों की सतही संरचना पर नजर रखी। शोध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डीप लर्निंग और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग जैसी तकनीकों का सहारा लिया गया, जिससे यह विश्लेषण संभव हुआ कि वर्ष भर के मौसम सर्दी,गर्मी, बारिश और सूखा किस प्रकार झीलों के आकार को प्रभावित करते हैं। अध्ययन से पता चला कि विश्व की लगभग दो-तिहाई झीलें मौसमी परिवर्तनों के अनुसार अपनी सतह का विस्तार या संकुचन करती हैं। क्षेत्रफल के हिसाब से ये झीलें पूरी दुनिया के झीलों के कुल भूभाग का 66 और संख्या के लिहाज से 60 फीसदी हैं। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि विश्व की लगभग 90 फीसदी जनसंख्या इन्हीं क्षेत्रों में निवास करती है जहां झीलें मौसम के अनुसार बदलती हैं।
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झीलों के सिकुड़ने से मीथेन जैसी हानिकारक गैसें फैलने का खतरा
झीलों के अचानक सिकुड़ने से तल में जमी गाद और तलछट सतह पर आ जाते हैं, जिससे मीथेन जैसी हानिकारक गैसें का वातावरण में फैलने का खतरा बढ़ जाता है। यह स्थानीय जलवायु को प्रभावित करता है और झीलों की जैव विविधता खतरे में पड़ सकती है। बदलावों से झीलों की खाद्य श्रृंखला भी प्रभावित होती है। शैवालों की मात्रा में असंतुलन, जलीय जीवों के आवास में बदलाव और पौधों की संरचना में विचलन जैसे दुष्परिणाम देखने को मिलते हैं।
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मानव जीवन के लिए भी है खतरे की घंटी
झीलों में आने वाले मौसमी उतार-चढ़ाव केवल जलीय जीवन तक सीमित नहीं रहते बल्कि उनका असर सीधे-सीधे मानवीय जीवन पर भी पड़ता है। जल संकट, कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव, मछली पालन में गिरावट और स्थानीय तापमान में असंतुलन जैसे संकट उत्पन्न हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने इस बात पर बल दिया है कि मौसमी बदलावों की सटीक निगरानी और समझ ही झीलों के संरक्षण, ताजे जल के संसाधनों के सुव्यवस्थित प्रबंधन और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए अनिवार्य है। यह अध्ययन वैश्विक जलवायु नीति निर्धारण में भी दिशा-निर्देश प्रदान कर सकता है।