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Siddaramaiah: कर्नाटक के लंबे समय तक पद पर रहने वाले मुख्यमंत्री बने सिद्धारमैया, ऐसा है सियासी सफर

Tue, 06 Jan 2026 12:09 PM IST
अस्मिता त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: अस्मिता त्रिपाठी Updated Tue, 06 Jan 2026 12:09 PM IST
सार

सिद्धारमैया कर्नाटक के सबसे लंबे समय तक के मुख्यमंत्री रहने का रिकॉड अपने नाम किया। आइए जानते हैं कैसा है उनका सियासी सफर?

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Siddaramaiah became the longest-serving Chief Minister of Karnataka, such is his political journey
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कर्नाटक में कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री पद के लिए खींचतान चली। इस समय सिद्धारमैया को कुछ तनावपूर्ण क्षणों का सामना भी करना पड़ा। हालांकि सिद्धारमैया ने अब एक नया रिकॉड अपने नाम कर लिया हैं। वह कर्नाटक के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले व्यक्ति बन गए हैं। सिद्धारमैया दो दशकों से अधिक समय से जनता परिवार से जुड़े रहे। इस समय वह कांग्रेस विरोधी मुखर रुख के लिए जाने गए, लेकिन 77 वर्षीय व्यक्ति के लिए यह एक उल्लेखनीय बदलाव रहा है। उन्होंने मंगलवार को अपने साथी मैसूर निवासी देवराज उर्स के कार्यकाल के दिनों की संख्या के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली।

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दो बार के मुख्यमंत्री उर्स का रिकॉड तोड़ा

सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले बन गए हैं। उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में अबतक 2,792 दिन पूरे किए हैं। इस रिकॉड से अब सिद्धारमैया मुख्यमंत्री के रूप में उर्स के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली है। इसके साथ ही अगला रिकॉड 7 जनवरी से उनके नाम रहेगा। 

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वहीं, राज्य में सामाजिक न्याय और भूमि सुधारों के प्रतीक माने जाने वाले उर्स दो बार मुख्यमंत्री रहे। वह पहली बार 1972 में मुख्यमंत्री बने। उनका यह कार्यकाल 1977 में पूरा हुआ। इसके बाद उनका दूसरा कार्यकाल 1978-1980 तक रहा। सिद्धारमैया, जो उर्स के बाद पांच साल पूरे करने वाले एकमात्र मुख्यमंत्री भी हैं। सिद्धारमैया का पहला कार्यकाल 13 मई, 2013 से 15 मई, 2018 तक 1,829 दिनों तक रहा। इसके बाद 20 मई, 2023 से अब तक अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने 963 दिन पूरे कर लिए हैं, लेकिन इससे पहले उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के समर्थकों ने 2023 के सत्ता-साझाकरण फार्मूले की अफवाहों के अनुरूप अपने नेता की पदोन्नति की पुरजोर मांग करके बाधा डालने की कोशिश की।
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जिस पार्टी के कभी विरोध रहे, बाद में उसी में शामिल हुए

1980 के दशक की शुरुआत से लेकर 2005 तक, एक गरीब किसान परिवार से आने वाले सिद्धारमैया कांग्रेस के कट्टर विरोधी थे। लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा द्वारा जेडी(एस) से निकाले जाने के बाद वह राजनीतिक रूप से दुविधा में पड़ गए। इसके बाद अंत में उन्होंने उसी पार्टी में शामिल हो गए, जिसका उन्होंने कभी विरोध किया था। अपने धैर्य और दृढ़ता के बल पर सिद्धारमैया ने अपने जीवन भर के सपने को साकार किया। इसके बाद 2013 में कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री बने। इसके साथ ही वह नौ बार के विधायक बने। इसके बाद सिद्धारमैया 2023 में एक बार फिर कर्नाटक के मुख्यमंत्री  बने।सिद्धारमैया, जिन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल अंतिम बार पूरा करने की अपनी महत्वाकांक्षा को कभी नहीं छिपाया है। वह एक शानदार विदाई की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि, चुनावी राजनीति में बने रहने के बारे में उन्होंने मिले-जुले संकेत दिए हैं।

दो नेताओं को पछाड़कर मुख्यमंत्री बनने का श्रेय मिला

इसके साथ ही सिद्धारमैया को कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को पछाड़कर मुख्यमंत्री बनने का श्रेय जाता है।  2023 में शिवकुमार और एक दशक पहले एम मल्लिकार्जुन खरगे को। 2004 के खंडित जनादेश के बाद, कांग्रेस और जेडी(एस) ने गठबंधन सरकार बनाई, जिसमें जेडी(एस) में रहे सिद्धारमैया को कांग्रेस के एन. धरम सिंह का उप मुख्यमंत्री बनाया गया, जो मुख्यमंत्री बने। सिद्धारमैया को इस बात का मलाल है कि उन्हें उस समय राज्य का नेतृत्व करने का अवसर मिला था, लेकिन गौड़ा ने उनकी संभावनाओं को खत्म कर दिया।
इसके बाद, 2005 में, कर्नाटक की तीसरी सबसे बड़ी जाति कुरुबा से ताल्लुक रखने वाले सिद्धारमैया ने खुद को पिछड़े वर्गों के नेता के रूप में स्थापित करने का फैसला किया। एएचआईएनडीए  (अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों के लिए कन्नड़ संक्षिप्त नाम) सम्मेलनों का नेतृत्व किया।  संयोग से उस समय जब पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे एचडी कुमारस्वामी देवे को पार्टी के उभरते सितारे के रूप में देखा जा रहा था।

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राजनीति से संन्यास तक लेने की बात कही

सिद्धारमैया को जेडी(एस) से बर्खास्त कर दिया गया, जहां उन्होंने पहले इसकी राज्य इकाई के प्रमुख के रूप में कार्य किया था। पार्टी के आलोचकों का कहना है कि उन्हें इसलिए हटाया गया क्योंकि देवेगौड़ा कुमारस्वामी को बढ़ावा देने के इच्छुक थे। उस समय सिद्धारमैया ने राजनीतिक संन्यास की बात की। यहां तक कि वकालत में वापस लौटने के विचार पर भी गौर किया। उन्होंने क्षेत्रीय दल बनाने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि उनके पास धन की कमी है। उस समय भाजपा और कांग्रेस दोनों ने उन्हें लुभाने की कोशिश की थी। लेकिन सिद्धारमैया ने कहा कि वह भाजपा की विचारधारा से सहमत नहीं थे। 2006 में अपने अनुयायियों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए। यह एक ऐसा कदम था जिसे कुछ साल पहले तक अकल्पनीय माना गया।

16 बार राज्य के बजट पेश किया

2004 में, वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने का मौका बाल-बाल चूक गए। क्योंकि तत्कालीन मुख्यमंत्री देवे गौड़ा प्रधानमंत्री बन गए थे। सिद्धारमैया को जे.एच. पटेल ने पीछे छोड़ दिया, जिनके मंत्रिमंडल में वह उपमुख्यमंत्री थे। गौड़ा और पटेल दोनों के मंत्रिमंडल में उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में कार्य किया। इसके साथ ही सिद्धारमैया, जो एक जन नेता के रूप में उभरे हैंं। उन्होंने 16 बार राज्यों के बजट पेश किया। जनता परिवार के सदस्य, वह डॉ. राम मनोहर लोहिया द्वारा प्रतिपादित समाजवादी आदर्शों से प्रभावित थे। उन्होंने राजनीतिक करियर बनाने के लिए अपने वकालत के पेशे को अलविदा कह दिया। 

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पहली बार 1983 में विधायक बने

पहली बार वह 1983 में लोक दल पार्टी के टिकट पर मैसूरु के चामुंडेश्वरी विधानसभा सीट से चुने गए।  इसके बाद उन्हें 1989 और 1999 के विधानसभा चुनाव और 1991 के लोकसभा चुनाव कोप्पल से हार मिली। कांग्रेस में शामिल होने के बाद, वह  2008 के चुनावों में केपीसीसी की प्रचार समिति के अध्यक्ष थे। उस चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद, वह विपक्ष के नेता बने। उन्होंने भ्रष्टाचार, घोटालों और अवैध खनन के मुद्दों पर भाजपा सरकार की जमकर आलोचना की।

2018 के चुनाव में मिली हार 

अपनी प्रशासनिक कुशलता के लिए जाने जाने वाले सिद्धारमैया ने 2013-18 के बीच कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में पांच साल का सफल कार्यकाल संभाला। हालांकि, लोकप्रिय भाग्य योजनाओं के कारण लोकप्रियता हासिल करने के बावजूद, कांग्रेस को 2018 में हार का सामना करना पड़ा।सिद्धारमैया खुद 2018 का चुनाव मैसूर के चामुंडेश्वरी में जद (एस) के जीटी देवगौड़ा से 36,042 वोटों से हार गए थे। हालांकि, उन्होंने बागलकोट जिले के बादामी से जीत हासिल की। 2018 के चुनावों के बाद, सिद्धारमैया ने कांग्रेस-जेडी(एस) सरकार की गठबंधन समन्वय समिति के प्रमुख के रूप में कार्य किया, और गठबंधन सरकार के पतन और भाजपा के सत्ता में आने के बाद, वह विपक्ष के नेता बन गए। 2023 के चुनावों को अपना अंतिम चुनाव घोषित करते हुए, सिद्धारमैया अपने गृह क्षेत्र वरुणा लौट गए और वहां से एक बार फिर जीत हासिल की। उन्होंने तब कहा था कि यह उनका अंतिम चुनाव हो सकता है, लेकिन इसके बाद भी वह राजनीति में सक्रिय रहेंगे।

 


 

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