सियाचिन के उत्तरी ग्लेशियर के पास सोमवार को हुए हिमस्खलन में सेना के चार जवानों समेत दो कुली मारे गए। घटना के बाद व्यापक पैमाने पर तलाशी लेने के बाद सेना ने इसकी पुष्टि कर दी है। जिस दौरान हिमस्खलन हुआ, उस दौरान आठ जवानों का एक दल गश्त पर था।
दुनिया की वो खतरनाक जगह जहां दुश्मनों से अधिक हैं भारतीय जवानों के लिए चुनौतियां
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तापमान शून्य से - 50 डिग्री सेल्सियस तक नीचे
सियाचिन ठंड के मौसम में सैनिकों के लिए सबसे खतरनाक बन जाता है। तापमान शून्य से -50 डिग्री सेल्सियस तक नीचे पहुँच जाता है।
एक रस्सी सबकी कमर में बंधी होती है
चौकियों पर जाने वाले सैनिक एक के पीछे एक लाइन में चलते हैं और एक रस्सी सबकी कमर में बंधी होती है। कमर में रस्सी इसलिए बांधी जाती है क्योंकि बर्फ कहां धस जाए इसका पता नहीं रहता और अगर कोई एक व्यक्ति खाई में गिरने लगे तो बाकी लोग उसे बचा सकें।
सांसों का संकट, ऑक्सीजन की भारी कमी
ऑक्सीजन की कमी होने की वजह से सैनिकों को बहुत धीरे-धीरे चलना पड़ता है क्योंकि तेज चलने के लिए अधिक ऑक्सीजन की जरूरत और रास्ता कई हिस्सों में बंटा होता है। साथ ही ये भी तय होता है कि एक निश्चित स्थान पर उन्हें किस समय तक पहुँच जाना है और फिर वहाँ कुछ समय रुककर आगे बढ़ जाना है।
आंखों की रोशनी जाने का खतरा
इतनी बर्फ गिरती है कि अगर दिन में सूरज चमके और उसकी चमक बर्फ पर पड़ने के बाद अचानक आंखों में जाए तो आंखों की रोशनी जाने का खतरा बना रहता है। तेज चलती ठंड हवाओं के बीच अगर बाहर निकल जाएं तो शायद हमारा शरीर बर्फों से ढक जाएगा।
सोते समय जान जाने का खतरा बना रहता है
सैनिक लकड़ी की चौकियों पर स्लीपिंग बैग में सोते हैं, मगर खतरा सोते समय भी मंडराता रहता है क्योंकि ऑक्सीजन की कमी की वजह से कभी-कभी सैनिकों की सोते समय ही जान चली जाती है।
दाढ़ी बनाने की मनाही, नहाने की सोच भी नहीं सकते
नहाने के बारे में सोचा नहीं जा सकता और सैनिकों को दाढ़ी बनाने के लिए भी मना किया जाता है क्योंकि वहाँ त्वचा इतनी नाजुक हो जाती है कि उसके कटने का खतरा काफी बढ़ जाता है और अगर एक बार त्वचा कट जाए तो वो घाव भरने में काफी समय लगता है।
हेलिकॉप्टर उन चौकियों पर सिर्फ 30 सेकेंड के लिए ही रुकता
चीता हेलिकॉप्टर उन चौकियों पर सिर्फ 30 सेकेंड के लिए ही रुकता है। संघर्ष विराम से पहले ये इसलिए किया जाता था जिससे विरोधी पक्ष जब तक निशाना साधेगा तब तक हेलिकॉप्टर उड़ जाएगा। मगर अब भी वही प्रक्रिया अपनाई जाती है जिससे सेना किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहे।