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...तो क्या डूबने के कगार पर है पृथ्वी

विवेक मिश्रा/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 27 Jun 2016 01:25 AM IST
short documentary on elephant by mike h pandey name as the last migration
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हाथियों पर बनाई लघु फिल्म ‘द लास्ट माइग्रेशन’ से मशहूर पर्यावरणविद माइक एच पांडेय इन दिनों भारतीय महासागर में जहाजों के कारण प्रति वर्ष मर रहीं 350 से 400 ब्लू व्हेल को लेकर नई फिल्म बना रहे हैं। तीन बार ग्रीन ऑस्कर जीतने वाले माइक पर्यावरण शिक्षा के लिए कैमरे को अपना हथियार मानते हैं। अपनी सिनेमा के जरिये उन्होंने गिद्ध, बाघ और हाथियों पर दुनियाभर में प्रसिद्धि पाई। पेश है माइक एच पांडेय की अमर उजाला से खास बातचीत :
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मौजूदा विकास की दौड़ में विनाश का खतरा कितना है?
बीते तीन दशकों में प्रगतिशीलता और विकास के नाम पर जो गतिविधियां हुई हैं, उससे लाखों वर्षों से चला आ रहा पृथ्वी का संतुलन बिगड़ गया है। समुद्रों को हमने दुनिया का सबसे बड़ा कूड़ेदान बना दिया है। यह दुखद है कि दुनिया के सबसे अमीर देश हजारों-लाखों टन खतरनाक कचरा सीधे समुद्रों में फेंक रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि बीते वर्षों में समुद्रों का इतना अंधाधुंध दोहन हुआ है कि 2048 तक एक भी मछली समुद्र में नहीं मिलेगी। ऐसे में पृथ्वी का अस्तित्व ही संकट में है।

क्या मान लिया जाए कि पृथ्वी का बड़ा हिस्सा डूबने के कगार पर है?
यह  कल्पना नहीं हकीकत है। पृथ्वी का बड़ा हिस्सा डूबने के कगार पर है। तापमान में वृद्धि से ग्लेशियर पिघल रहे हैं। चक्रवाती तूफानों  की संख्या बढ़ रही है। हाल में सेटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि सोलोमन आइसलैंड में 12 टापू पूरी तरह डूब चुके  हैं। यदि तटवर्ती इलाके डूबे तो लोग और वन्यजीव वहां से पलायन करेंगे। इससे वन्यजीवों और आबादी के बीच संघर्ष बढ़ेगा।

हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय ने तीन राज्यों में नील गाय, बंदरों और जंगली सुअरों को मारने का आदेश दिया?
हमारे देश में दुख इस बात का है जब जीव हमें भाते हैं तो हम बंदर को हनुमान बना देते हैं और हाथी को गणेश मान लेते हैं। लेकिन जब हमें नहीं भाते तो हम उन्हें आपदा और हिंसक करार दे देते हैं। जंगल का संतुलन बिगड़ा है। इसे हमने बिगाड़ा है। हमारा एक खाद्य चक्र है। मधुमक्खी से लेकर हाथी तक सभी इसकी अहम कड़ी हैं। इनमें कोई कड़ी टूटी तो पिरामिड भरभरा जाएगा। वन्य जीवों को गोली मारना कोई विकल्प नहीं है। यदि हम जंगलों को छोड़ दें तो वे जंगल कभी नहीं छोड़ेंगे।

इन समस्याओं का समाधान क्या है?
प्रकृति हर चीज को संतुलित करती है। मैन ग्रो जंगल सबसे ज्यादा लचीले और ताकतवर होते हैं। ये 150 से 200 किलोमीटर वेग वाली हवा और तूफानी झोंको को आसानी से झेल सकते हैं। सुनामी के दौरान जिन तटवर्ती इलाकों के किनारे मैन ग्रो जंगल थे वहां जान-माल का नुकसान कम हुआ। इस पृथ्वी पर वनस्पति और जीव करोड़ों वर्षों से मौजूद हैं। मनुष्य की पैदाइश महज कोई 80 हजार साल पुरानी है। हमने प्रकृति को समझने में भूल की हैं। जागरूकता और शिक्षा पर सरकारों को ध्यान देना होगा वरना पृथ्वी जब गुर्राएगी तो बड़ा विनाश होगा। बदलाव तभी आ सकता है जब हम लोगों को शिक्षित और जागरूक कर पाएंगे।

Published By Rahul Sankrityayan
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