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यूपीए नेतृत्व को लेकर शिवसेना का फिर कांग्रेस पर तंज, 'बड़ी पार्टी' होने पर खड़े किए सवाल

Tue, 29 Dec 2020 09:06 AM IST
अनवर अंसारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: अनवर अंसारी Updated Tue, 29 Dec 2020 09:06 AM IST
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Shiv Sena again taunts Congress over UPA leadership, questions raised over being a big party
संजय राउत - फोटो : ANI

शिवसेना ने एक बार फिर यूपीए गठबंधन की कमान संभालने वाली कांग्रेस पर सवाल उठाया है। शिवसेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' में लिखा है कि एक समय था जब कांग्रेस पत्थर को भी खड़ा करती थी, तो उसे लोगों का समर्थन हासिल होता था। लेकिन अब कांग्रेस के समर्थन वाली मतपेटी बदल चुकी है। गौरतलब है कि इससे पहले भी शिवसेना ने यूपीए का नेतृत्व एनसीपी प्रमुख शरद पवार को सौंपने की वकालत की थी। सामना के संपादकीय में कहा गया है कि यूपीए के नेतृत्व के लिए कांग्रेस को प्रदर्शन करके दिखाना होगा। संपादकीय में हाल में हुए चुनाव का जिक्र करते हुए कांग्रेस की दुर्दशा के बारे में बताया गया है। 

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यूपीए को मजबूत कर भाजपा के समक्ष खड़ा करना जरूरी
सामना के संपादकीय में लिखा गया है, 'संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन अर्थात ‘यूपीए’ का मजबूत होना समय की मांग है। लेकिन ये कैसे होगा? फिलहाल विरोधियों की एकता पर राष्ट्रीय मंथन शुरू है। ‘यूपीए’ का नेतृत्व कौन करेगा यह विवाद का मुद्दा नहीं है। मुद्दा ये है कि यूपीए को मजबूत बनाना है और भाजपा के समक्ष चुनौती के रूप में उसे खड़ा करना है। कांग्रेस पार्टी ये सब करने में समर्थ होगी तो उसका स्वागत है। कांग्रेस के नेता हरीश रावत का कहना है कि गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी के पास ही गठबंधन का नेतृत्व होता है। वे सही बोले हैं लेकिन ये बड़ी पार्टी जमीन पर न चले। लोगों की अपेक्षा है कि वो एक बड़ी उड़ान भरे।' 
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विरोधी दल का खालीपन, विपक्ष को एक झंडे के नीचे लाना जरूरी
कांग्रेस के बड़ी पार्टी होने को लेकर सामना में निशाना साधते हुए लिखा गया, 'नि:संदेह कांग्रेस आज तक बड़ी पार्टी है लेकिन बड़ी मतलब किस आकार की? कांग्रेस के साथ ही तृणमूल और अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियां संसद में हैं और ये सारी पार्टियां भाजपा विरोधी हैं। देश के विरोधी दल में एक खालीपन बन गया है और बिखरे हुए विपक्ष को एक झंडे के नीचे लाने की अपेक्षा की जाए तो कांग्रेस के मित्रों को इस पर आश्चर्य क्यों हो रहा है? देश में भाजपा विरोधी असंतोष की चिंगारी भड़क रही है। लोगों को बदलाव चाहिए ही चाहिए इसलिए वैकल्पिक नेतृत्व की आवश्यकता है। सवाल यह है कि ये कौन दे सकता है?'

कर्नाटक में जेडीएस को समझाने का काम कौन करेगा?

कर्नाटक में जिस तरह से जेडीएस ने अकेले विधानसभा चुनाव लड़ने का एलान किया है, इसे लेकर भी कांग्रेस को घेरा गया है। शिवसेना ने सामना में लिखा, 'कर्नाटक में 2023 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इस चुनाव के संदर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा ने बड़ी घोषणा की है। 2023 का चुनाव जनता दल-सेक्युलर मतलब जेडीएस स्वतंत्र रूप से अपने बल पर लड़नेवाली है। कभी देवेगौड़ा कांग्रेस के साथी थे। कर्नाटक में उनके सुपुत्र कुमारस्वामी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई। लेकिन आज दोनों पार्टियों में दरार है। देवेगौड़ा की पार्टी द्वारा अलग से चुनाव लड़ने का फायदा भारतीय जनता पार्टी को ही होगा। कर्नाटक ऐसा राज्य है जहां महाराष्ट्र की तरह कांग्रेस गांव-गांव तक फैली है। कर्नाटक में कांग्रेस को अच्छा नेतृत्व मिला हुआ है। यह कांग्रेस के अच्छे भविष्यवाला राज्य है। लेकिन मत विभाजन के खेल में भाजपा को फायदा हो जाता है इसलिए देवेगौड़ा और कुमारस्वामी को समझाने का काम कौन करेगा?'

कांग्रेस-राजद के विधायकों को तोड़कर नीतीश को बाहर का रास्ता दिखा सकती है भाजपा
वहीं, बिहार का जिक्र करते हुए कहा गया है, 'बिहार की नीतीश कुमार सरकार असंतोष की ज्वालामुखी में धधक रही है। ‘जदयू’ के अरुणाचल प्रदेश से छह विधायकों को भाजपा ने अपने में मिला ही लिया। साथ ही खबर है कि बिहार की ‘जदयू’ में सुरंग लगाकर भाजपा अपने दम पर मुख्यमंत्री को बिठाने की तैयारी में है। वे बिहार में कांग्रेस और राजद जैसी पार्टियों के विधायक तोड़नेवाले हैं, ऐसा कहा जा रहा है। इसे रहने दें लेकिन जिस नीतीश कुमार को गोद में बिठाकर वे राजसत्ता चला रहे हैं, उन्हीं नीतीश कुमार की पार्टी को कमजोर करने का काम शुरू कर दिया गया है। इससे नीतीश कुमार बेचैन हैं और उन्होंने नाराजगी व्यक्त की है। नीतीश कुमार ने ‘जदयू’ का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ दिया है। इस उठापटक को देश के विरोधी दल को गंभीरता से लेना चाहिए।'

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आज कांग्रेस के समर्थनवाली मतपेटी पहले जैसी नहीं रही
सामना में लिखा गया है, 'कांग्रेस बड़ी पार्टी है ही। आजादी की लड़ाई में और आजादी के बाद देश को बनाने में कांग्रेस का बड़ा योगदान रहा है। लेकिन तब कांग्रेस के सामने कोई विकल्प नहीं था। विरोधी दल नाममात्र का था। पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे लोकप्रिय नेतृत्व से देश समृद्ध था। कांग्रेस अगर पत्थर को भी खड़ा कर देती तो लोग उसे खूब मतदान करते थे। उस दौरान कांग्रेस के विरोध में बोलना अपराध ठहराया जाता था। कांग्रेस को दलित, मुसलमान और ओबीसी का अच्छा-खासा समर्थन प्राप्त था। कांग्रेस एक विचारधारा थी और कांग्रेस के लिए लोग लाठियां खाने को भी तैयार थे। आज कांग्रेस के समर्थनवाली मतपेटी पहले जैसी नहीं रही। राज्यों की स्थानीय पार्टियों ने अपनी एक जगह बनाई है।'

'बड़ी पार्टी' को दी शुभकामनाएं
संपादकीय में लिखा गया है, 'कांग्रेस नेतृत्व को ऐसा लग रहा है कि इस मामले में दूसरे लोगों को नहीं बोलना चाहिए। कांग्रेस बड़ी पार्टी है और गठबंधन का नेतृत्व बड़ी पार्टी ही करती है, ऐसा भी उनके नेता कहते हैं। हमारा भी कुछ अलग विचार नहीं है। बड़ी पार्टी को इस यात्रा के लिए हमारी शुभकामनाएं!' 

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