Congress President Polls: हारे तो भी थरूर नहीं बनेंगे सीताराम केसरी, सोनिया को भेद गया ये शब्द 'बाण'
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विस्तार
कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए सोमवार को वोट डाले गए। अब वोटों की गिनती के बाद ही पता चलेगा कि कांग्रेस पार्टी का नया अध्यक्ष कौन होगा। इस पद के नामांकन से लेकर वोटिंग तक का दौर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। मीडिया में कई तरह की नपी-तुली बयानबाजी देखने को मिली। राजनीति के जानकारों का कहना है कि चुनाव का नतीजा जो भी रहे, मगर इतना तो यह है कि शशि थरूर, सीताराम केसरी नहीं बनेंगे। यानी जिस तरह की बेरुखी, केसरी को झेलनी पड़ी, वैसा कुछ थरूर के साथ नहीं होगा। भले ही सोनिया गांधी ने वोट डालते वक्त कहा, मैं इस दिन का लंबे समय से इंतजार कर रही थी, लेकिन थरूर का एक शब्द बाण उन्हें भेद गया। थरूर ने वोटिंग से एक दिन पहले वीडियो संदेश में कहा, ये चुनाव पार्टी में विकेंद्रीकरण, समावेशी और आधुनिकीकरण को लेकर है।
दोनों पक्षों को मिलेंगे भारी संख्या में वोट
शशि थरूर को चुनाव प्रचार से लेकर वोटिंग के दिन तक पार्टी के अधिकांश नेताओं यानी मत डालने वाले डेलिगेट्स का समर्थन नहीं मिल सका था। हालांकि वे मीडिया के समक्ष इस बात से कभी निराश नजर नहीं आए। उन्होंने कहा कि भारत को एक मजबूत कांग्रेस की जरूरत है। मैं अपने राजनीतिक भविष्य के लिए नहीं, बल्कि कांग्रेस और भारत के लिए चुनाव लड़ रहा हूं। मैं एक व्यवहार्य विकल्प के तौर पर हूं। पार्टी के काम करने का तरीका बदलना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई है कि दोनों पक्षों को काफी संख्या में वोट मिलेंगे। गांधी परिवार ने कहा था कि पार्टी का कोई आधिकारिक उम्मीदवार नहीं है। ये अलग बात है कि राजनीतिक जानकार कांग्रेस अध्यक्ष पद के दूसरे प्रत्याशी, मल्लिकार्जुन खड़गे को गांधी परिवार का उम्मीदवार बता रहे हैं। शशि थरूर के चुनाव प्रचार के दौरान कई जगहों पर ये बात देखने को मिली थी।
केसरी की बयानबाजी से कई शीर्ष नेता हुए विचलित
कांग्रेस के अतीत को देखें तो पार्टी अध्यक्ष सीताराम केसरी को काफी मुसीबतें झेलनी पड़ी थीं। बिहार के सीताराम केसरी ने 1996 से 1998 तक पार्टी अध्यक्ष की कमान संभाली थी। उन्होंने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में मंत्रालय संभाला। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उस वक्त सोनिया गांधी को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाने के लिए केसरी के साथ खराब बर्ताव किया गया था। 12वीं लोकसभा चुनाव में जब पार्टी को बहुमत नहीं मिला, तो उसका ठीकरा केसरी के सिर फोड़ा गया। सच्चाई ये थी कि केसरी, पार्टी के चुनाव प्रचार से दूर रहे थे। कांग्रेस हाईकमान के भरोसे वाले कई नेताओं ने केसरी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन्हें जाति, क्षेत्र और अपनी पढ़ाई-लिखाई को लेकर भी दूसरे खेमें के नेताओं का विरोध झेलना पड़ा। सीताराम केसरी, पिछड़ी जाति से आते थे। जो बात आज शशि थरूर कर रहे हैं, कुछ वैसा ही केसरी ने भी कह दिया था। केसरी ने कहा था, वे तो साधारण परिवार में जन्मे हैं। उनकी पढ़ाई-लिखाई भी ज्यादा नहीं है। इसके बावजूद वे कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए। उनकी इस बयानबाजी से पार्टी के कई शीर्ष नेता विचलित हो गए। नतीजा, केसरी का विरोध तेज होता चला गया।
इतना बुरा सलूक हुआ था केसरी के साथ
केसरी को हटाने के लिए दर्जनों आधार तैयार कर लिए गए। पार्टी को कोई चंदा नहीं देगा। राज्यों के विधानसभा चुनाव में नुकसान होगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये सब बातें गांधी परिवार के इशारे पर हो रही थीं। 14 मार्च 1998 को सीताराम केसरी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। रातों-रात पार्टी के कई नियम बदल डाले गए। दर्जनभर नेताओं ने प्रणब मुखर्जी के घर पर बैठक की। इसके बाद सीडब्ल्यूसी की बैठक बुलाकर केसरी से इस्तीफा देने पर अंतिम निर्णय लेने के लिए कहा गया। कुछ ही देर बाद यह घोषणा कर दी गई कि केसरी ने इस्तीफा दे दिया है। सोनिया गांधी को कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया गया है। केसरी के कमरे के बाहर लगी नेमप्लेट उखाड़ दी गई। जब वे कांग्रेस मुख्यालय से बाहर निकले तो पार्टी के कुछ शरारती कार्यकर्ताओं ने उनके कपड़े खींचने का प्रयास किया।
थरूर ने कह डाली विकेंद्रीकरण की बात
कांग्रेस में 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी अध्यक्ष पद को लेकर सवाल उठ रहे थे। कांग्रेस हाईकमान को अपने ही नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ा। पार्टी में असंतुष्ट नेताओं का समूह जी-23 बन गया। ऐसा भी नहीं है कि पार्टी एकाएक चुनाव के लिए तैयार हो गई। वह निर्णय लेने में भी तीन वर्ष लग गए। कैप्टन अमरेंद्र सिंह भाजपा में शामिल हुए, गुलाम नबी आजाद ने अपनी नई पार्टी बना ली। सांसद मनीष तिवारी, कांग्रेस हाईकमान पर अपने कटु बाण छोड़ते रहे। पंजाब, हाथ से चला गया। कपिल सिब्बल, सपा की मदद से राज्यसभा सांसद बन गए। आनंद शर्मा मौन हैं। थरूर ने अपने चुनाव प्रचार में तीन बातों पर फोकस किया। उन्होंने कहा, पार्टी में विकेंद्रीकरण, समावेशी व आधुनिकीकरण पर काम करेंगे। पार्टी में विकेंद्रीकरण शब्द पहले भी कई नेताओं को निपटा चुका है।
गांधी परिवार को पसंद नहीं ये शब्द
जी-23 समूह के नेताओं का कहना है कि ये शब्द, हाईकमान या गांधी परिवार को पसंद नहीं है। थरूर ने कहा, कांग्रेस एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में इसलिए टिकी है, क्योंकि वही 1991 में नई आर्थिक प्रणाली की गवाह रही है। 60 व 70 के दशक में हरित क्रांति, कांग्रेस ने अपनाई। 1984 की कठिन परिस्थितियों में अपनी पार्टी के बड़े नेता को खोने के बाद राजीव के रूप में लाए गए पीढ़िगत परिवर्तन को अपनाया। परिवर्तन के चलते ही कांग्रेस मजबूत बनी रही। बतौर थरूर, मेरे हिसाब से पार्टी का अध्यक्ष बदलेगा। लक्ष्य प्राप्ति का तरीका बदलेगा। कांग्रेस कार्यकर्ता साहसी हैं। उनकी वोटिंग से पता चलेगा कि उनके साहस की विरासत आज भी जिंदा है। गुप्त मतदान केंद्र में वे साहस दिखाएं। अपने साहस की विरासत का इस्तेमाल करें।