फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   sedition: Center seeks time from Supreme Court for response, many petitions filed against this colonial era law

राष्ट्रद्रोह को चुनौती: केंद्र ने जवाब के लिए सुप्रीम कोर्ट से मांगा वक्त, अंग्रेजी राज के इस कानून के खिलाफ कई याचिकाएं दायर

Tue, 03 May 2022 02:45 PM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Tue, 03 May 2022 02:45 PM IST
सार

शीर्ष कोर्ट ने पिछली सुनवाई में कहा था कि वह 5 मई से इस मामले में अंतिम सुनवाई शुरू करेगी और सुनवाई स्थगित करने के किसी आग्रह पर विचार नहीं करेगी। 

विज्ञापन
sedition: Center seeks time from Supreme Court for response, many petitions filed against this colonial era law
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : amar ujala

विस्तार

राष्ट्रद्रोह कानून को चुनौती देने वाली ढेरों याचिकाओं पर जवाब देने के लिए केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से मोहलत मांगी है। इन याचिकाओं में उपनिवेशकाल के इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। 

विज्ञापन

प्रधान न्यायाधीश एनवी रमण की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने 27 अप्रैल को इन याचिकाओं पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। पीठ में जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस हिमा कोहली भी शामिल हैं। शीर्ष कोर्ट ने पिछली सुनवाई में कहा था कि वह 5 मई से इस मामले में अंतिम सुनवाई शुरू करेगी और सुनवाई स्थगित करने के किसी आग्रह पर विचार नहीं करेगी। अदालत के समक्ष दायर एक अर्जी में केंद्र ने कहा कि जवाबी हलफनामे का मसौदा तैयार है, वह सक्षम प्राधिकारी से पुष्टि की प्रतीक्षा में है। 
विज्ञापन


कपिल सिब्बल रखेंगे याचिकाकर्ताओं का पक्ष
शीर्ष अदालत ने अपने अंतिम आदेश में कहा था कि वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल मामले में आईपीसी की धारा 124 ए (देशद्रोह) की वैधता के खिलाफ याचिकाकर्ता की ओर से नेतृत्व करेंगे। देशद्रोह के दंडात्मक कानून के भारी दुरुपयोग से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल जुलाई में केंद्र सरकार से पूछा था कि वह स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने और महात्मा गांधी जैसे लोगों को चुप कराने के लिए अंग्रेजों द्वारा इस्तेमाल किए गए प्रावधान को निरस्त क्यों नहीं कर रही? 
विज्ञापन
विज्ञापन


आजादी के बाद भी अंग्रेजी राज के कानून की जरूरत है?
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और पूर्व मेजर जनरल एस जी वोम्बटकेरे द्वारा आईपीसी में धारा 124 ए (देशद्रोह) की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की जांच करने के लिए सहमत होते हुए शीर्ष कोर्ट ने कहा था कि उसकी मुख्य चिंता कानून का दुरुपयोग है, जिसके कारण देशद्रोह के केस बढ़े हैं। शीर्ष अदालत ने पिछले साल जुलाई में याचिकाओं पर नोटिस जारी करते हुए प्रावधान के कथित दुरुपयोग का हवाला दिया था। सीजेआई रमण ने कहा था कि यह कानून स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए था। महात्मा गांधी, तिलक आदि को चुप कराने के लिए अंग्रेजों द्वारा इसी कानून का इस्तेमाल किया गया था। फिर भी, क्या आजादी के 75 साल बाद भी यह जरूरी है?


याचिकाएं दायर करने वालों में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी, मणिपुर के पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेमचा व छत्तीसगढ़ के कन्हैयालाल शुक्ला शामिल हैं। इस कानून में गैर-जमानती प्रावधान है। यह भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमानना या उत्तेजना या असंतोष फैलाने का प्रयास करने को अपराध मानता है। इसके तहत अधिकतम आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती है। 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed