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दिसंबर 2018 में सुरक्षा बलों की पकड़ से बच निकला था रियाज नायकू, सिर पर था 12 लाख रुपये का ईनाम

Wed, 06 May 2020 09:23 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 06 May 2020 09:23 PM IST
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security forces encounter hizbul mujahideen top commander riyaz naikoo
रियाज अहमद नायकू

रविवार को 21 राइफल्स के कमांडिंग आफिसर कर्नल आशुतोष शर्मा और मेजर अनुज सूद की शहादत से दुखी सेना के अफसरों, जवानों को बुधवार की दोपहर में थोड़ा सुकून मिला है।

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हिजबुल का टॉप और बेहद चालाक, शातिर कमांडर रियाज अहमद नायकू बेहद जटिल मुठभेड़ में मार गिराया गया, लेकिन खुफिया और सुरक्षा एजेंसी के अफसर इसे बस कुछ दिन की राहत मान रहे हैं।

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लंबी चलेगी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई

सूत्र बताते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई में फिलहाल इससे कोई बड़ा बदलाव नहीं आना है। सीमा के उस पार कोटली, मुजफ्फराबाद से लेकर बहावलपुर के आतंकी शिविरों में जिहाद के नाम पर जैश-ए-मोहम्मद भी लगातार बड़े आतंकी हमले की फिराक में है। सूत्र का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के हटने के बाद से आतंकियों में एक खास किस्म की बौखलाहट है।

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सीमापार के संगठन देश के अन्य हिस्से में अब कोई आतंकी वारदात को अंजाम नहीं दे पा रहे हैं। बताते हैं इंडियन मुजाहिद्दीन समेत कई छोटे-बड़े आतंकी संगठनों के स्लीपर सेल, नेटवर्क भारतीय खुफिया एवं सुरक्षा एजेंसियों द्वारा ध्वस्त किए जाने के बाद पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई अब इस छद्मयुद्ध का लगातार नया प्लॉट तैयार करने में लगी है।

संगठन के नाम पर मत जाइए....सब एक हैं

सीमापार से संचालित आतंकी गतिविधियों का विश्लेषण करने वाले सूत्र बताते हैं कि मारा गया कमांडर हिजबुल का था या जैश का, इस पर मत जाइए। आपरेशन बालाकोट जैसी स्थिति की तरफ बढ़ रहे अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद आतंकी संगठनों ने जिंदा रहने की रणनीति बनाई है।

अब सभी आतंकी संगठन एक हैं। सभी के ऑपरेशन की कमान पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के हाथ में है। सभी आतंकी संगठनों का मकसद भी एक ही है।

दिसंबर 2018 में ही नायकू का अंत तय था

पैरामिलिट्री बल की खुफिया ईकाई से जुड़े एक सूत्र के अनुसार 2018 में ही रियाज अहमद नायकू को मुठभेड़ में मार गिरा देना तय था। हिज्बुल कमांडर सबजार भट्ट 2012 में मुठभेड़ में मारा गया था। उसके बाद से नायकू ने आतंकी आपरेशन को अंजाम देना शुरू किया था।

खुफिया और सुरक्षा बलों ने इस आतंकी के बारे में सूचना देने पर 12 लाख रुपये का ईनाम घोषित किया था और कई बार इसे मुठभेड़ में घेरने की कोशिश हुई, लेकिन कामयाबी नहीं मिली थी।

यह भूमिगत रास्तों (सुरंग) का इस्तेमाल करने में माहिर था। दिसंबर 2018 में सैन्य बलों के पास समय से सूचना भी आ गई थी। उस दिन भी वह बेगपुरा में अपने घर आया था। आपरेशन भी शुरू हो गया, लेकिन शातिर दिमाग से भूमिगत रास्तों (सुरंगों) के जरिए बच निकला था।

बताते हैं इस बार भी यही हुआ। कुछ समय से रणनीतिकारों को लग रहा था कि नायकू फिर आएगा। सही समय पर सही सूचना मिलने के बाद सैन्य बलों ने फिर गोपनीय तरीके से आपरेशन की योजना बनाई। पूरे गांव और क्षेत्र को घेर कर रात 2 बजे से ही आपरेशन को अंजाम देने की रणनीति बनी।

इसके लिए जेसीवी मशीन समेत उपाय किए गए। आतंकी के भागने के सभी संभावित ठिकानों को घेरकर रखा गया, लेकिन किसी तरह की कोई सुगबुगाहट न देखकर एक बार फिर आतंकी के भाग निकलने का भ्रम हो गया था। लेकिन कुछ ही समय बाद मोर्चा खोल देने की रणनीति ने सारा खेल बदल दिया। एक जटिल मुठभेड़ में हिजबुल कमांडर और उसके साथी को सुरक्षा बलों ने मार गिराया।

अब तो प्रशिक्षण और हथियार दोनों ही दांत तले अंगुली दबाने वाले

सेना के एक पिछले साल रिटायर हुए कर्नल की सुनिए। सेना की प्रतिष्ठित राष्ट्रीय राइफल को जांबाजी से भरी सेवाएं देने वाले सूत्र के अनुसार इनके पास हथियार भी पहले की तुलना में काफी अच्छे बरामद हो रहे हैं। जूते, कपड़े, स्तरीय साजो-सामान के साथ-साथ चीन की बनी स्टील बुलेट का इस्तेमाल कर रहे हैं।



बताते हैं कि स्टील बुलेट भारतीय सुरक्षा बलों के पारंपरिक हेलमेट या बुलट प्रूफ जैकेट को आसानी से भेद जाती है। सूत्र का कहना है कि आतंकियों के ऑपरेशन से ही पता चल जाता है कि सीमा पार मिल रही उच्च ट्रेनिंग पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के सहयोग के संभव ही नहीं है।

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