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SC Updates: रामदेव के एलोपैथी बयान पर छत्तीसगढ़ पुलिस ने दायर की क्लोजर रिपोर्ट, केंद्र ने कोर्ट को दी जानकारी
Tue, 09 Sep 2025 03:11 PM IST
पवन पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Tue, 09 Sep 2025 03:11 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
- फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट को मंगलवार को जानकारी दी गई कि छत्तीसगढ़ पुलिस ने योगगुरु रामदेव के खिलाफ दर्ज उस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है, जो उनके कोविड महामारी के दौरान ऑलोपैथिक दवाओं पर दिए गए विवादित बयान से जुड़ा था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस एमएम सुंद्रेश और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ को बताया कि रामदेव के खिलाफ दर्ज शिकायतें कुछ 'हितधारक समूहों द्वारा प्रायोजित' लगती हैं। रामदेव की ओर से वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने बताया कि पिछली सुनवाई के निर्देशों के अनुसार छत्तीसगढ़ सरकार ने अपना जवाब दाखिल कर दिया है, लेकिन बिहार सरकार की ओर से अभी जवाब नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले की सुनवाई दिसंबर तक के लिए टाल दी।
मामला कैसे शुरू हुआ था?
2021 में कोविड महामारी के समय पटना और रायपुर की इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) इकाइयों ने शिकायत दर्ज कराई थी। उनका आरोप था कि रामदेव के बयान से कोविड उपचार की प्रक्रिया पर नकारात्मक असर पड़ सकता है और लोग उचित इलाज लेने से बच सकते हैं। रामदेव ने तब कहा था कि उन्हें ऑलोपैथिक दवाओं पर भरोसा नहीं है। इस बयान पर कई डॉक्टरों ने आपत्ति जताई और आईपीसी व डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट, 2005 के तहत कई मामले दर्ज हुए। बाद में रामदेव ने तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन के पत्र के बाद अपना बयान वापस ले लिया था।
डीएमए की आपत्ति, रामदेव की याचिका
दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रामदेव को पक्षकार बनाने की मांग की। डीएमए का आरोप है कि रामदेव ने ऑलोपैथी का अपमान किया और लोगों को टीकाकरण व इलाज प्रोटोकॉल को नजरअंदाज करने के लिए उकसाया। डीएमए ने यह भी दावा किया कि रामदेव की कंपनी पतंजलि ने बिना मंजूरी के "कोरोनिल किट" बेचकर 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की। रामदेव ने सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत की मांग करते हुए कहा था कि उनके खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक मामलों की जांच पर रोक लगाई जाए। उन्होंने केंद्र, बिहार, छत्तीसगढ़ और आईएमए को पक्षकार बनाया है। अब छत्तीसगढ़ पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट के बाद सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की दिसंबर सुनवाई पर टिकी हैं।
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मामला कैसे शुरू हुआ था?
2021 में कोविड महामारी के समय पटना और रायपुर की इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) इकाइयों ने शिकायत दर्ज कराई थी। उनका आरोप था कि रामदेव के बयान से कोविड उपचार की प्रक्रिया पर नकारात्मक असर पड़ सकता है और लोग उचित इलाज लेने से बच सकते हैं। रामदेव ने तब कहा था कि उन्हें ऑलोपैथिक दवाओं पर भरोसा नहीं है। इस बयान पर कई डॉक्टरों ने आपत्ति जताई और आईपीसी व डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट, 2005 के तहत कई मामले दर्ज हुए। बाद में रामदेव ने तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन के पत्र के बाद अपना बयान वापस ले लिया था।
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डीएमए की आपत्ति, रामदेव की याचिका
दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रामदेव को पक्षकार बनाने की मांग की। डीएमए का आरोप है कि रामदेव ने ऑलोपैथी का अपमान किया और लोगों को टीकाकरण व इलाज प्रोटोकॉल को नजरअंदाज करने के लिए उकसाया। डीएमए ने यह भी दावा किया कि रामदेव की कंपनी पतंजलि ने बिना मंजूरी के "कोरोनिल किट" बेचकर 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की। रामदेव ने सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत की मांग करते हुए कहा था कि उनके खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक मामलों की जांच पर रोक लगाई जाए। उन्होंने केंद्र, बिहार, छत्तीसगढ़ और आईएमए को पक्षकार बनाया है। अब छत्तीसगढ़ पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट के बाद सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की दिसंबर सुनवाई पर टिकी हैं।
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लिंग निर्धारण विरोधी कानून की मांग पर चार हफ्तों में जवाब दें राज्य
सुप्रीम कोर्ट ने जन्म से पहले बच्चे के लिंग की पहचान करने पर रोक लगाने वाले गर्भधारण पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीसीपीएनडीटी) कानून और नियमों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए दायर याचिका पर राज्यों से चार हफ्ते में जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि पांच राज्यों ने अब तक उनका रुख नहीं बताया है। शेष राज्यों ने इस याचिका पर हलफनामा दाखिल कर दिया है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ को बताया गया कि शीर्ष अदालत ने पिछले साल सितंबर में राज्यों को हलफनामा दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने जन्म से पहले बच्चे के लिंग की पहचान करने पर रोक लगाने वाले गर्भधारण पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीसीपीएनडीटी) कानून और नियमों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए दायर याचिका पर राज्यों से चार हफ्ते में जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि पांच राज्यों ने अब तक उनका रुख नहीं बताया है। शेष राज्यों ने इस याचिका पर हलफनामा दाखिल कर दिया है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ को बताया गया कि शीर्ष अदालत ने पिछले साल सितंबर में राज्यों को हलफनामा दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया था।