Supreme Court: नाबालिग मुस्लिम लड़की अपनी पसंद की शादी कर सकती है या नहीं? अब SC करेगा याचिका की जांच
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने कहा था कि मामले में विचार करने का मुद्दा शादी की वैधता के संबंध में नहीं था, बल्कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उनके जीवन और स्वतंत्रता के लिए खतरे की आशंका को दूर करने के लिए था।
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सुप्रीम कोर्ट ने 16 वर्षीय मुस्लिम लड़की को विवाह की अनुमति देने के पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के हालिया फैसले को चुनौती देने वाली राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की याचिका पर सोमवार को नोटिस जारी किया। हाईकोर्ट ने फैसले में कहा था कि एक मुस्लिम लड़की यौवन प्राप्त करने के बाद या 15 साल की उम्र में शादी का अनुबंध कर सकती है।
जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अभय एस ओका की पीठ ने इस मामले में परीक्षण का निर्णय लेते हुए इस मुद्दे पर सहायता के लिए वरिष्ठ वकील आर राजशेखर राव को न्यायमित्र नियुक्त किया है। पीठ ने राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है। एनसीपीसीआर की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाईकोर्ट के फैसले में की गई टिप्पणियों पर रोक लगाने का अनुरोध किया। उन्होंने पीठ से हाईकोर्ट के फैसले के दो पैराग्राफ पर रोक लगाने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा, दूसरे हाईकोर्ट भी ऐसा निर्णय ले सकते हैं। बाल विवाह पर प्रतिबंध और पॉक्सो अधिनियम पर प्रभाव को देखते हुए यह एक गंभीर मुद्दा है। इस पर पीठ ने कहा, जब सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर विचार कर रहा है तो क्या कोई अदालत उस फैसले का पालन कर सकती है? पीठ ने कहा, पहले हम न्यायमित्र का विचार सुनना चाहेंगे। इसके बाद देखा जाएगा कि क्या कोई अंतरिम आदेश पारित किया जा सकता है। मेहता ने अगली तारीख इस हफ्ते निर्धारित करने की मांग की, लेकिन पीठ ने इससे नकार दिया। ब्यूरो
हाईकोर्ट ने यह दिया था फैसला
हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह योग्य उम्र की लड़की को ध्यान में रखते हुए एक मुस्लिम जोड़े को सुरक्षा प्रदान की थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि एक मुस्लिम लड़की की शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ द्वारा शासित होती है।
याचिकाकर्ता ने कहा-हाईकोर्ट का फैसला पॉक्सो कानून की भावना के खिलाफ
एनसीपीसीआर ने याचिका में कहा, हाईकोर्ट का फैसला अनिवार्य रूप से बाल विवाह की अनुमति दे रहा है और यह बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 का उल्लंघन है। अधिनियम के प्रावधान धर्मनिरपेक्ष हैं और सभी धर्मों पर लागू होते हैं। इसके अलावा हाईकोर्ट का निर्णय पॉक्सो कानून की भावना के भी खिलाफ है।
- कानून के मुताबिक 18 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा वैध सहमति नहीं दे सकता। याचिका में आगे तर्क दिया गया कि बाल संरक्षण कानूनों को जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देने वाले संविधान के अनुच्छेद- 21 के साथ अलग कर नहीं देखा जा सकता है।
मामले की सुनवाई सात नवंबर को
एनसीपीसीआर की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह एक गंभीर मुद्दा है और फैसले में टिप्पणियों पर रोक लगाने की मांग की। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इस मुद्दे की जांच करेगी और मामले की सुनवाई सात नवंबर को तय की है। उच्च न्यायालय की एकल-न्यायाधीश पीठ ने 13 जून को पठानकोट के एक मुस्लिम दंपती की याचिका पर यह आदेश पारित किया था, जिन्होंने सुरक्षा के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
क्या कहा था पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने?
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने कहा था कि मामले में विचार करने का मुद्दा शादी की वैधता के संबंध में नहीं था, बल्कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उनके जीवन और स्वतंत्रता के लिए खतरे की आशंका को दूर करने के लिए था। इसने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, पठानकोट को याचिकाकर्ताओं के प्रतिनिधित्व पर फैसला करने और कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।