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हत्यारोपी को सुप्रीम कोर्ट ने दी जमानत: कहा- बिना ट्रायल लंबे समय तक हिरासत में रखना मौलिक अधिकार का हनन
Tue, 05 May 2026 06:18 PM IST
Rahul Kumar
आईएएनएस, नई दिल्ली
आईएएनएस, नई दिल्ली
Published by: Rahul Kumar
Updated Tue, 05 May 2026 06:18 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। इसी सिद्धांत को दोहराते हुए शीर्ष अदालत ने हत्या के एक मामले में आरोपी को जमानत दे दी, जो करीब चार साल से जेल में बंद था और अब तक एक भी गवाह का बयान दर्ज नहीं हुआ था।
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जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने यह आदेश साहिल मनोज मचारे की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए दिया। मनोज मचारे ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। यह मामला महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के शाहापुर थाने में दर्ज है।
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सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि आरोपी 1 नवंबर 2022 से न्यायिक हिरासत में है, हालांकि ट्रायल कोर्ट ने 2024 में आरोप तय कर दिए थे, लेकिन इसके बावजूद अब तक एक भी गवाह की गवाही नहीं हुई है। अदालत ने कहा, "हम यह देखते हैं कि याचिकाकर्ता 1 नवंबर 2022 से हिरासत में है। 2024 में आरोप तय होने के बाद भी आज तक एक भी गवाह का परीक्षण नहीं हुआ है।"
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अदालत ने इस स्थिति को गंभीर मानते हुए कहा कि इतनी लंबी अवधि तक बिना ट्रायल के आरोपी को जेल में रखना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। पीठ ने कहा, "ऐसी परिस्थितियों में हमारे पास यह कहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है कि आरोपी के त्वरित सुनवाई के अधिकार का हनन हुआ है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित है।"
अदालत ने कहा, "हम जानते हैं कि आरोपी पर हत्या का आरोप है, लेकिन हमने बार-बार कहा है कि चाहे अपराध कितना भी गंभीर हो, यदि त्वरित सुनवाई का अधिकार प्रभावित होता है, तो अदालत को जमानत पर विचार करना ही होगा।"
करीब चार साल तक बिना किसी ठोस प्रगति के जेल में रहने को देखते हुए कोर्ट ने आरोपी को तुरंत जमानत देने का आदेश दिया। साथ ही यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट आवश्यक शर्तें तय करेगा और यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे रिहा किया जाए।
यह मामला भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 और 34 के तहत दर्ज किया गया था। अभियोजन के अनुसार, यह घटना कोल्हापुर के तारदाल गांव में एक पारिवारिक कार्यक्रम के दौरान हुई थी, जहां एक व्यक्ति पर धारदार हथियार से हमला किया गया और बाद में उसकी मौत हो गई। एक प्रत्यक्षदर्शी ने सह आरोपी की पहचान साहिल मनोज मचारे के रूप में की थी।
बॉम्बे हाईकोर्ट में आरोपी ने दलील दी थी कि उसका नाम एफआईआर में नहीं है, उसके पास से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ और मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। इसके बावजूद मार्च 2026 में हाईकोर्ट ने जमानत याचिका खारिज कर दी थी, यह कहते हुए कि अपराध की गंभीरता और आरोपी की संलिप्तता के प्रथम दृष्टया साक्ष्य जमानत के पक्ष में नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को रद्द करते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों में लंबे समय तक हिरासत को उचित नहीं ठहराया जा सकता और आरोपी को जमानत दी जानी चाहिए।