SC: 'आपराधिक कानून बदला लेने का जरिया नहीं हो सकते'; अदालत ने कहा- निजी फायदे के लिए सिस्टम का दुरुपयोग न हो
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कानून निजी फायदे या बदला लेने का माध्यम नहीं बन सकते। अदालत ने गुवाहाटी के एक कारोबारी के खिलाफ दर्ज आईपीसी धारा 420 और 406 के मामले को रद्द करते हुए न्यायिक प्रणाली के दुरुपयोग पर चेताया।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कानून, निजी फायदे के लिए या बदला लेने का जरिया नहीं बन सकते। कोर्ट ने उस प्रवृत्ति की निंदा की जिसमें कुछ लोग अपने निजी फायदे के लिए न्यायिक प्रणाली का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने गुवाहाटी के एक कारोबारी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (भरोसा तोड़ने का अपराध) के तहत दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द करते हुए ये बातें कहीं।
यह देखते हुए कि हाल के वर्षों में कुछ लोग अपने निजी फायदे और अपने गलत इरादों को पूरा करने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, पीठ ने कहा, कोर्ट को ऐसी प्रवृत्ति के खिलाफ सतर्क रहना होगा और यह पक्का करना होगा कि हमारे समाज के ताने-बाने पर बुरा असर डालने वाले कामों को शुरू में ही खत्म कर दिया जाए। शिकायत और सबूतों को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कारोबारी इंदर चंद बागरी के खिलाफ धोखाधड़ी और भरोसा तोड़ने के अपराध के लिए कोई आधार नहीं बनता है और शिकायत करने वाले जगदीश प्रसाद बागरी के पास विवादित संपत्ति की सेल डीड को रद्द करने और अपने कॉन्ट्रैक्ट के अधिकारों के उल्लंघन के लिए हर्जाने का दावा करने के लिए सिविल कानून के तहत दूसरे उपाय मौजूद हैं।
पीठ ने कहा, आपराधिक कानून को निजी बदला लेने की कार्रवाई शुरू करने का मंच नहीं बनना चाहिए। इंदर चंद बागरी पर गलत मंशा का आरोप नहीं लगाया जा सकता इसलिए, अभियोजन की ओर से उनके खिलाफ लगाए गए आरोप टिक नहीं सकते।
पीठ ने यह देखते हुए कि भरोसा तोड़ने के अपराध और धोखाधड़ी में अंतर है, पीठ ने कहा, धोखाधड़ी के लिए, गलत या गुमराह करने वाली बात कहने के समय, यानी शुरू से ही आपराधिक मंशा जरूरी है, वहीं भरोसा तोड़ने के अपराध में, सिर्फ भरोसा तोड़ने का सबूत ही काफी है। इस तरह, भरोसा तोड़ने के अपराध में, अपराधी को कानूनी तौर पर संपत्ति सौंपी जाती है और वह बेईमानी से उसका गलत इस्तेमाल करता है। दूसरी ओर धोखाधड़ी के मामले में अपराधी धोखे या बेईमानी से किसी व्यक्ति को संपत्ति देने के लिए उकसाता है। पीठ ने कहा, ऐसी स्थिति में, दोनों अपराध एक साथ नहीं हो सकते क्योंकि दोनों एक दूसरे के उलट हैं।
पीठ ने कहा, इन बातों और कारणों को देखते हुए, हमारी पक्की राय है कि अपील करने वाले-आरोपी (इंदर चंद बागरी) के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई जारी रखने से उसे बेवजह परेशान किया जाएगा क्योंकि धारा 406 या 420 के तहत अपराध के लिए पहली नजर में कोई मामला नहीं बनता। शिकायत करने वाले ने अपीलकर्ता के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं, लेकिन वह इस कोर्ट के सामने उन्हें सही साबित करने में नाकाम रहा है।
ऐसे में शीर्ष कोर्ट ने कारोबारी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई रद्द करने से इन्कार करने वाले गुवाहाटी हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा, इससे न्यायिक प्रणाली खासकर क्रिमिनल कोर्ट पर बेवजह दबाव पड़ेगा।
ये था पूरा मामला
इस विवाद के अनुसार, 1976 में एक संपत्ति के मालिक इंदर चंद बागरी ने चार और लोगों- भगवानदास बागरी, रामकिशन बागरी, श्यामसुंदर बागरी और जगदीश प्रसाद बागरी (शिकायतकर्ता) के साथ एक मिलकर साझेदारी फर्म बनाने का फैसला किया। इसका मकसद वेयरहाउस और गोदाम बनाने का काम करना और बाद में उन्हें किसी तीसरे पक्ष को किराए पर देना था। इस फर्म ने इंदर बागरी की संपत्ति पर दो गोदाम बनाए और उन्हें फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया को पंद्रह साल के लिए 1993 तक लीज पर दे दिया। एफसीआई ने जब जमीन खाली की संबंधित संपत्ति के इस्तेमाल को लेकर विवाद आरंभ हुआ, जो सप्लीमेंट्री डीड के अनुसार असली मालिक इंदर चंद बागरी को वापस मिलनी थी। जगदीश प्रसाद बागरी ने 2011 में इंदर चंद बागरी की ओर से इस विवादित संपत्ति को अपने भतीजे को बेचने के खिलाफ एक शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें भरोसा तोड़ने और धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया था।
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