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Supreme Court: कोर्ट ने खारिज की जनहित याचिका, राजनीतिक दलों को POSH कानून के दायरे में लाने की थी मांग

Fri, 01 Aug 2025 04:29 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 01 Aug 2025 04:29 PM IST
सार

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें मांग की गई थी कि राजनीतिक दलों को भी महिलाओं के यौन उत्पीड़न से सुरक्षा देने वाले पोश कानून के दायरे लाया जाए। कोर्ट ने कहा कि यह संसद का विषय है और अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। याचिकाकर्ता ने बाद में याचिका वापस ले ली और भविष्य में कानून के तहत अन्य कदम उठाने की छूट मांगी।

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SC refuses to entertain PIL to bring political parties under POSH Act
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक जनहित याचिका (पीआईए) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। याचिका में मांग की गई थी कि प्रमुख राजनीतिक दलों को भी 2013 के पोश कानून (कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम अधिनियम) के दायरे में लाया जाए। कोर्ट ने कहा कि यह मामला संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए इसमें अदालत कोई दखल नहीं दे सकती। 
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पोश कानून यानी 'कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संरक्षण, निषेध और निवारण अधिनियम' 2013 में लागू किया गया था। इसका मकसद कार्यस्थलों पर महिलाओं को यौन उत्पीड़न से बचाना और उन्हें काम करने के लिए एक सुरक्षित माहौल प्रदान करना है। 
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जनहित याचिका योगमाया एम. जी. नाम की याचिकाकर्ता ने दायर की थी। उन्होंने मांग की थी कि सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को पोश कानून के तहत लाया जाए। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता  मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ के समक्ष पेश हुईं।  उन्होंने कोर्ट से अपील की कि राजनीतिक दलों को पोश कानून के तहत नियोक्ता माना जाए। इससे उन्हें अपने संगठन में आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) बनानी होगी, ताकि महिलाओं की यौन उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों का समाधान किया जा सके। 
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इस पर मुख्य न्यायाधीश ने पूछा, यह तो संसद का अधिकार क्षेत्र है, हम इसमें कैसे हस्तक्षेप कर सकते हैं? उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता चाहें तो कुछ महिला सांसदों का समर्थन लेकर संसद में एक निजी विधेयक पेश करें। गुप्ता ने जवाब में कहा कि संसद ने अभी तक इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। उन्होंने यह भी कहा कि वह कोई नया कानून बनाने की मांग नहीं कर रही हैं, बल्कि सिर्फ मौजूदा पोश कानून की व्याख्या करने की बात कर रही हैं, ताकि इसमें राजनीतिक दल भी शामिल किए जा सकें।

 
गुप्ता ने केरल उच्च न्यायालय के 2021 के एक फैसले का हवाला भी दिया, जिसमें कहा गया था कि राजनीतिक दलों को पोश कानून के तहत आंतरिक शिकायत समिति बनाने की जरूरत नहीं है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उच्च न्यायालय के इस फैसले को अलग से चुनौती दी जा सकती है। इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, ताकि वह भविष्य में इस विषय पर अन्य कानूनी विकल्पों का सहारा ले सकें। 

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शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा, याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी है, साथ ही कानून के अनुसार आगे उचित कदम उठाने की स्वतंत्रता भी चाही है। इस याचिका में केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा कई प्रमुख राजनीतिक दलों को पक्षकार बनाया गया था, जिनमें कांग्रेस, भाजपा, माकपा, भाकपा, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी शामिल थे।



 
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