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सुप्रीम कोर्ट ने काला जादू, जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए दायर याचिका को किया खारिज
Fri, 09 Apr 2021 11:55 AM IST
Tanuja Yadav
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Tanuja Yadav
Updated Fri, 09 Apr 2021 11:55 AM IST
सार
- अवैध धर्म परिवर्तन की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की
- प्रसार के मकसद से दाखिल की गई याचिका - सुप्रीम कोर्ट
- 18 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को धर्म परिवर्तन का अधिकार संविधान देता है - कोर्ट
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सर्वोच्च न्यायालय
- फोटो : पीटीआई
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने अवैध तरीके से धर्म परिवर्तन के खिलाफ दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया है। याचिका में कहा गया था कि गरीब, अशिक्षित लोगों का काला जादू और अंधविश्वास का डर दिखाकर धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये याचिका प्रसार के उद्देश्य से दाखिल की गई है।
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A Bench headed by Justice Rohinton F Nariman expressing strong displeasure on the plea filed by advocate Ashwini Kumar Upadhyay said PIL was a "publicity interest litigation". Bench also threatened to impose heavy fine on petitioner, thereafter Upadhyay's advovate withdrew plea.
— ANI (@ANI) April 9, 2021विज्ञापन
कोर्ट ने कहा कि देश में 18 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को अपना धर्म चुनने का अधिकार है और देश का संविधान उन्हें ये अधिकार देता है। इस याचिका को वकील अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर किया गया था और इसे न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन ने याचिका पर कड़ी नाराजगी जताई। वहीं बेंच ने याचिकाकर्ता पर भारी जुर्माना लगाने की भी धमकी दी, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली।
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न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति ऋषिकेष रॉय की पीठ ने याचिकाकर्ता वकील अश्विनी उपाध्याय की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शंकरनारायण से कहा ने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत यह किस तरह की याचिका है। हम आप पर भारी जुर्माना लगाएंगे। आप अपने जोखिम पर बहस करेंगे।
पीठ ने कहा कि 18 साल से ज्यादा आयु वाले किसी व्यक्ति को उसका धर्म चुनने की अनुमति नहीं देने का कोई कारण नहीं हैं। पीठ ने शंकरनारायण से कहा, “संविधान में प्रचार शब्द को शामिल किए जाने के पीछे कारण है।” इसके बाद शंकरनारायण ने याचिका वापस लेने और सरकार एवं विधि आयोग के समक्ष प्रतिवेदन दायर करने की अनुमति मांगी।
पीठ ने विधि आयोग के समक्ष प्रतिवेदन की अनुमति देने से इनकार कर दिया और कहा, “हम आपको यह इजाजत नहीं दे सकते।” न्यायालय ने वापस ली गई याचिका के रूप में इसका निस्तारण किया।