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SC: जब बच्चे गुफा में रह रहे थे, तब आप गोवा में क्या कर रहे थे? शीर्ष कोर्ट ने इस्राइली कारोबारी को लगाई फटकार
Mon, 06 Oct 2025 08:55 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Mon, 06 Oct 2025 08:55 PM IST
सार
SC: सुप्रीम कोर्ट ने एक इस्राइली कारोबारी को फटकार लगाई, जिसने अपनी कथित बेटियों की रूस वापसी रोकने की याचिका दायर की थी। कोर्ट ने सवाल किया कि जब बच्चे जंगल में रह रहे थे, तब वह गोवा में क्या कर रहा था। कर्नाटक हाईकोर्ट ने रूसी महिला और उसकी दो बेटियों की देश वापसी के लिए केंद्र को यात्रा दस्तावेज जारी करने का आदेश दिया है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई (फाइल)
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारत में रहने वाले एक इस्राइली कारोबारी को फटकार लगाई और सवाल किया कि जब उसका परिवार 'गुफा में रह रही था', तब वह गोवा में क्या कर रहा था। इस्राइली कारोबारी ने अपनी उन दो 'बेटियों' की देश वापसी रोकने के लिए याचिका दाखिल की थी, जिन्हें उनकी रूसी मां के साथ कर्नाटक के जंगल से बचाया गया था।
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉमाल्या बागची की बेंच ने नाराजगी जताते हुए कहा कि यह देश एक सुरक्षित ठिकाना (सेफ हेवन) बन गया है, जहां कोई भी आकर रह सकता है। बेंच ने इस्राइली व्यक्ति से सवाल कि क्या उसके पास भारत में रहने के लिए वैध दस्तावेज हैं। व्यक्ति अपने दो बच्चों की हिरासत चाहता है।
ये भी पढ़ें: सीएमआरएल मामले में कांग्रेस एमएलए की याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज, केरल सीएम के खिलाफ जांच की मांग की थी
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रूसी नागरिक नीना कुटिना (40 वर्षीय) और उनकी दो बेटियां (छह और पांच साल की) को 11 जुलाई को कर्नाटक के कुम्टा तालुक के गोकार्ण में रामतीर्थ हिल्स के जंगल में एक पुलिस टीम ने रोजमर्रा की गश्त के दौरान बचाया था। उस महिला और उसके बच्चों के पास भारत में रहने के लिए वैध दस्तावेज नहीं थे, इसलिए उन्हें राज्य के महिलाओं के लिए विदेशी प्रतिबंध केंद्र में भेज दिया गया था। 26 सितंबर को कर्नाटक हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को उनकी रूस वापसी के लिए यात्रा दस्तावेज जारी करने का निर्देश दिया।
गोवा में रहने वाले इस्राइली कारोबारी ड्रोर श्लोमो गोल्डस्टीन खुद को उन दो नाबालिग लड़कियों का पिता बताते उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने नाबालिगों की हिरासत मांगी और बच्चों को रूस वापस भेजे जाने से रोकने का आदेश देने की मांग की।
जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की, आप हो कौन? आपका क्या अधिकार है?.. कृपया हमें कोई आधिकारिक दस्तावेज दिखाइए, जिसमें आप इन नाबालिगों के पिता घोषित किए गए हों। उन्होंने आगे कहा, हम आपको देश से बाहर निकालने का निर्देश क्यों न दें? गोल्डस्टीन के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता इन नाबालिग लड़कियों का पिता है और उसे यह याचिका केंद्र सरकार को सौंपने की अनुमति मिलनी चाहिए। इस पर जस्टिस बघची ने वकील से कहा, यह याचिका महज लोकप्रयिता हासिल करने के लिए दायर की गई है।
ये भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से किया इनकार, तेलंगाना सरकार के आदेश को गई थी चुनौती
जस्टिस बागची ने वकील से सवाल किया, यह केवल प्रचार पाने की याचिका है। जब आपके बच्चे गुफा में रह रहे थे, तब आप क्या कर रहे थे? आप गोवा में क्या कर रहे थे? क्या आपके पास इस देश में रहने के लिए वैध दस्तावेज थे? आप नेपाल गए, वहां अपना वीजा बढ़वाया और फिर वापस गोवा आ गए। कोर्ट का रुख समझते हुए वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया। जस्टिस कांत ने टिप्पणी की, यह देश अब ऐसा सुरक्षित ठिकाना बन गया है, जहां कोई भी आकर रह सकता है।
26 सितंबर को हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह रूसी महिला और उसकी दो नाबालिग बेटियों की वापसी के लिए यात्रा दस्तावेज जारी करे। राज्य अधिकारियों ने बताया कि यह महिला और बच्चे लगभग दो महीने से बिना वैध यात्रा या निवास दस्तावेजों के वहां रह रहे थे।
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जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉमाल्या बागची की बेंच ने नाराजगी जताते हुए कहा कि यह देश एक सुरक्षित ठिकाना (सेफ हेवन) बन गया है, जहां कोई भी आकर रह सकता है। बेंच ने इस्राइली व्यक्ति से सवाल कि क्या उसके पास भारत में रहने के लिए वैध दस्तावेज हैं। व्यक्ति अपने दो बच्चों की हिरासत चाहता है।
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रूसी नागरिक नीना कुटिना (40 वर्षीय) और उनकी दो बेटियां (छह और पांच साल की) को 11 जुलाई को कर्नाटक के कुम्टा तालुक के गोकार्ण में रामतीर्थ हिल्स के जंगल में एक पुलिस टीम ने रोजमर्रा की गश्त के दौरान बचाया था। उस महिला और उसके बच्चों के पास भारत में रहने के लिए वैध दस्तावेज नहीं थे, इसलिए उन्हें राज्य के महिलाओं के लिए विदेशी प्रतिबंध केंद्र में भेज दिया गया था। 26 सितंबर को कर्नाटक हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को उनकी रूस वापसी के लिए यात्रा दस्तावेज जारी करने का निर्देश दिया।
गोवा में रहने वाले इस्राइली कारोबारी ड्रोर श्लोमो गोल्डस्टीन खुद को उन दो नाबालिग लड़कियों का पिता बताते उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने नाबालिगों की हिरासत मांगी और बच्चों को रूस वापस भेजे जाने से रोकने का आदेश देने की मांग की।
जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की, आप हो कौन? आपका क्या अधिकार है?.. कृपया हमें कोई आधिकारिक दस्तावेज दिखाइए, जिसमें आप इन नाबालिगों के पिता घोषित किए गए हों। उन्होंने आगे कहा, हम आपको देश से बाहर निकालने का निर्देश क्यों न दें? गोल्डस्टीन के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता इन नाबालिग लड़कियों का पिता है और उसे यह याचिका केंद्र सरकार को सौंपने की अनुमति मिलनी चाहिए। इस पर जस्टिस बघची ने वकील से कहा, यह याचिका महज लोकप्रयिता हासिल करने के लिए दायर की गई है।
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जस्टिस बागची ने वकील से सवाल किया, यह केवल प्रचार पाने की याचिका है। जब आपके बच्चे गुफा में रह रहे थे, तब आप क्या कर रहे थे? आप गोवा में क्या कर रहे थे? क्या आपके पास इस देश में रहने के लिए वैध दस्तावेज थे? आप नेपाल गए, वहां अपना वीजा बढ़वाया और फिर वापस गोवा आ गए। कोर्ट का रुख समझते हुए वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया। जस्टिस कांत ने टिप्पणी की, यह देश अब ऐसा सुरक्षित ठिकाना बन गया है, जहां कोई भी आकर रह सकता है।
26 सितंबर को हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह रूसी महिला और उसकी दो नाबालिग बेटियों की वापसी के लिए यात्रा दस्तावेज जारी करे। राज्य अधिकारियों ने बताया कि यह महिला और बच्चे लगभग दो महीने से बिना वैध यात्रा या निवास दस्तावेजों के वहां रह रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी वित्तीय संपत्तियों के लिए केंद्रीकृत पोर्टल बनाने की मांग पर आरबीआई से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और अन्य से उस याचिका पर जवाब मांगा है जिसमें विभिन्न संस्थाओं में मौजूद सभी वित्तीय परिसंपत्तियों की व्यापक सूची तक पहुंचने के लिए एक केंद्रीकृत पोर्टल स्थापित करने के निर्देश देने की मांग की गई है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए आरबीआई, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी), केंद्र और अन्य को नोटिस जारी कर याचिका पर उनके जवाब मांगे हैं। साथ ही मामले की सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की है। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि यह मामला छोटे निवेशकों या जमाकर्ताओं से जुड़ा है। वकील ने कहा, आज की तारीख में यह 3.5 लाख करोड़ रुपये का मामला है। उन्होंने कहा कि यह राशि उनके असली निवेशकों को वापस नहीं की गई है।
याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ को बताया कि उन्होंने इस मुद्दे पर पहले हाईकोर्ट का रुख किया था। वकील ने आगे कहा, उच्च न्यायालय ने कहा कि यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन इसे अधिकारियों को देखना है और इसमें किसी भी तरह का न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। पीठ आकाश गोयल नामक व्यक्ति की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में संबंधित प्राधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे अपने विनियमित निकायों को प्रत्येक वित्तीय परिसंपत्ति के लिए नामित व्यक्ति के बारे में न्यूनतम विवरण दर्ज करने के लिए अनिवार्य नियम बनाने के लिए दिशानिर्देश जारी करें।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और अन्य से उस याचिका पर जवाब मांगा है जिसमें विभिन्न संस्थाओं में मौजूद सभी वित्तीय परिसंपत्तियों की व्यापक सूची तक पहुंचने के लिए एक केंद्रीकृत पोर्टल स्थापित करने के निर्देश देने की मांग की गई है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए आरबीआई, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी), केंद्र और अन्य को नोटिस जारी कर याचिका पर उनके जवाब मांगे हैं। साथ ही मामले की सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की है। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि यह मामला छोटे निवेशकों या जमाकर्ताओं से जुड़ा है। वकील ने कहा, आज की तारीख में यह 3.5 लाख करोड़ रुपये का मामला है। उन्होंने कहा कि यह राशि उनके असली निवेशकों को वापस नहीं की गई है।
याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ को बताया कि उन्होंने इस मुद्दे पर पहले हाईकोर्ट का रुख किया था। वकील ने आगे कहा, उच्च न्यायालय ने कहा कि यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन इसे अधिकारियों को देखना है और इसमें किसी भी तरह का न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। पीठ आकाश गोयल नामक व्यक्ति की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में संबंधित प्राधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे अपने विनियमित निकायों को प्रत्येक वित्तीय परिसंपत्ति के लिए नामित व्यक्ति के बारे में न्यूनतम विवरण दर्ज करने के लिए अनिवार्य नियम बनाने के लिए दिशानिर्देश जारी करें।
संदेह चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो सबूत की जगह नहीं ले सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा क संदेह चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता। न्यायालय ने 2007 में 10 वर्षीय एक लड़के की हत्या के आरोप से तीन लोगों को बरी कर दिया।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष के मामले में काफी कमियां सामने आई हैं। रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य किसी भी तरह से आरोपियों के अपराध की ओर इशारा करने वाली परिस्थितियों की शृंखला को पूरा नहीं कर सकते। पीठ ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के नवंबर 2017 के फैसले को चुनौती देने वाली तीन आरोपियों की अपील स्वीकार कर ली। हाईकोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी थी। पीठ ने कहा, वैज्ञानिक परीक्षणों की अनदेखी करते हुए संदिग्ध गवाही के आधार पर दोषी ठहराना सबूत की जगह संदेह को स्थापित करना है। पीठ ने कहा, जैसा कि सर्वविदित है, संदेह, चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता। इस तरह अपीलकर्ता संदेह का लाभ पाने के हकदार हैं। यह देखते हुए कि मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित है, पीठ ने कहा कि पहली और सबसे स्पष्ट परिस्थिति प्राथमिकी में दोनों अपीलकर्ताओं के नामों का छूट जाना था। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस चूक को स्वीकार किया, लेकिन इसे महत्वहीन बताकर खारिज कर दिया। यह दृष्टिकोण अस्वीकार्य है। पीठ ने कहा, सिर्फ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामले में, प्रत्येक परिस्थिति की कठोर जांच होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा क संदेह चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता। न्यायालय ने 2007 में 10 वर्षीय एक लड़के की हत्या के आरोप से तीन लोगों को बरी कर दिया।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष के मामले में काफी कमियां सामने आई हैं। रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य किसी भी तरह से आरोपियों के अपराध की ओर इशारा करने वाली परिस्थितियों की शृंखला को पूरा नहीं कर सकते। पीठ ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के नवंबर 2017 के फैसले को चुनौती देने वाली तीन आरोपियों की अपील स्वीकार कर ली। हाईकोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी थी। पीठ ने कहा, वैज्ञानिक परीक्षणों की अनदेखी करते हुए संदिग्ध गवाही के आधार पर दोषी ठहराना सबूत की जगह संदेह को स्थापित करना है। पीठ ने कहा, जैसा कि सर्वविदित है, संदेह, चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता। इस तरह अपीलकर्ता संदेह का लाभ पाने के हकदार हैं। यह देखते हुए कि मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित है, पीठ ने कहा कि पहली और सबसे स्पष्ट परिस्थिति प्राथमिकी में दोनों अपीलकर्ताओं के नामों का छूट जाना था। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस चूक को स्वीकार किया, लेकिन इसे महत्वहीन बताकर खारिज कर दिया। यह दृष्टिकोण अस्वीकार्य है। पीठ ने कहा, सिर्फ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामले में, प्रत्येक परिस्थिति की कठोर जांच होनी चाहिए।
अदालती कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग के संरक्षण और वकीलों व वादियों के लिए उन्हें सुलभ बनाने के निर्देश देने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दी। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने अधिवक्ता मैथ्यूज जे नेदुमपुरा व अन्य की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया।
सुनवाई के दौरान, अधिवक्ता नेदुमपुरा ने दलील दी कि देशभर की अधिकांश अदालतों और न्यायाधिकरणों में वर्चुअल सुनवाई होने के बावजूद अदालती रिकॉर्डिंग को संरक्षित करने की कोई व्यवस्था नहीं है। याचिका में कार्यवाही की अनिवार्य वीडियो रिकॉर्डिंग, ऐसे अभिलेखों के संरक्षण और वादियों, वकीलों और हितधारकों के अधिकार के रूप में उन तक पहुंच के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग के संरक्षण और वकीलों व वादियों के लिए उन्हें सुलभ बनाने के निर्देश देने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दी। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने अधिवक्ता मैथ्यूज जे नेदुमपुरा व अन्य की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया।
सुनवाई के दौरान, अधिवक्ता नेदुमपुरा ने दलील दी कि देशभर की अधिकांश अदालतों और न्यायाधिकरणों में वर्चुअल सुनवाई होने के बावजूद अदालती रिकॉर्डिंग को संरक्षित करने की कोई व्यवस्था नहीं है। याचिका में कार्यवाही की अनिवार्य वीडियो रिकॉर्डिंग, ऐसे अभिलेखों के संरक्षण और वादियों, वकीलों और हितधारकों के अधिकार के रूप में उन तक पहुंच के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी।
न्यायिक अधिकारी विनय कुमार द्विवेदी की इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के रूप में नियुक्ति को मंजूरी
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सोमवार को न्यायिक अधिकारी विनय कुमार द्विवेदी की इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के रूप में नियुक्ति को मंजूरी दी। कॉलेजियम की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई कर रहे थे। कॉलेजियम की इस बैठक में मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के साथ न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति विक्रमनाथ भी शामिल थे। यह फैसला सोमवार को हुई बैठक में लिया गया।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सोमवार को न्यायिक अधिकारी विनय कुमार द्विवेदी की इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के रूप में नियुक्ति को मंजूरी दी। कॉलेजियम की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई कर रहे थे। कॉलेजियम की इस बैठक में मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के साथ न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति विक्रमनाथ भी शामिल थे। यह फैसला सोमवार को हुई बैठक में लिया गया।