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SC का आदेश, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्रियों को खाली करने होंगे सरकारी बंगले

Tue, 02 Aug 2016 06:35 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 02 Aug 2016 06:35 AM IST
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SC orders , the former Chief Ministers of Uttar Pradesh will have two months to vacate the house
supreme court of india

केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह, समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव, बसपा सुप्रीमो मायावती समेत उत्तर प्रदेश के पूर्व छह मुख्यमंत्रियों को दो महीने के भीतर लखनऊ स्थित अपने सरकारी आवास को खाली करना होगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाए गए उस नियम को निरस्त कर दिया, जिसमें राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी आवास देने का प्रावधान था।
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साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि किसी संस्था या ट्रस्ट को अगर टोकन रेंट (मसलन एक रुपये पर) पर सरकारी संपत्ति दी गई हो तो उसे भी न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
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1997 में बनाए गए इस नियम के तहत पूर्व मुख्यमंत्रियों को लखनऊ में टाइप-चार सरकारी आवास देने का प्रावधान था। राजनाथ, मुलायम और मायावती के अलावा इस सूची में कल्याण सिंह, नारायण दत्त तिवारी और राम नरेश यादव भी हैं।

न्यायमूर्ति अनिल आर दवे, न्यायमूर्ति एनवी रमण और न्यायमूर्ति आर भानुमति की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री आवास आवंटन नियम, 1997 को कानून के मुताबिक गलत बताया है।

शीर्ष अदालत ने इन सभी को न केवल दो महीने के भीतर सरकारी आवास खाली करने का आदेश दिया है बल्कि जितने समय तक इन लोगों ने अनधिकृत तरीके से सरकारी आवास पर कब्जा रखा था, उसका किराया भी वसूला जाएगा। 

पीठ ने 1997 के नियमों के तहत पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी आवास देने को अतार्किक बताया। शीर्ष अदालत ने कहा है कि सरकार को बिना उचित सोच-विचार किए सरकारी संपत्तियों को निजी लोगों या संस्था को देने का अधिकार नहीं है।

पीठ ने अपने फैसले में यह भी कहा कि इन पूर्व मुख्यमंत्रियों को मंत्री, राज्यपाल या सांसद होने के नाते भी सरकारी आवास मिला हुआ है लिहाजा किसी व्यक्ति को दो स्थायी सरकारी आवास अलॉट करना सही नहीं है। शीर्ष अदालत ने यह फैसला ‘लोक प्रहरी’ नामक संगठन द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर दिया है।

क्या था नियम

SC orders , the former Chief Ministers of Uttar Pradesh will have two months to vacate the house
इंडिया कहो या भारत, नाम में क्या रखा है: सुप्रीम कोर्ट्र - फोटो : Reuters

याचिकाकर्ता संगठन की दलील थी कि 1997 के नियम उत्तर प्रदेश मंत्री अधिनियम, 1981 के खिलाफ है। 1981 के अधिनियम में मुख्यमंत्री को कार्यकाल खत्म होने के 15 दिनों के बाद सरकारी आवास खाली करने का प्रावधान है।  

संस्थान की ओर से यह भी दलील दी गई थी कि सरकारी आवास की भारी कमी है, ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी आवास देने का क्या औचित्य है।

यह देखते हुए कि राज्यपाल, मंत्री, सेवानिवृत्त जजों के लिए यह सुविधा नहीं है तो पूर्व मुख्यमंत्रियों को क्यों सरकारी आवास मिलना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने यूपी सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया कि इन सभी को जेड-सिक्योरिटी मिली हुई है, ऐसे में उनकी सुरक्षा के लिए उचित आवास जरूरी है।

राज्य की ओर से याचिकाकर्ता संगठन के लोकस को भी लेकर सवाल उठाया था। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि बिना उचित सोच-विचार के सरकारी संपत्तियों को इधर-उधर नहीं बांटा जाना चाहिए।

अगर कोई विशेष प्रावधान न हो, ऐसे में अगर सरकारी आवास किसी को आवंटित किया जाए तो उससे बाजार के हिसाब से किराया वसूला जाना चाहिए।

अदालत ने कहा कि वैधानिक प्रावधान न होने के कारण अगर कोई आवंटन हुआ तो उसे रद्द कर दिया जाना चाहिए और सरकार को सरकारी संपत्ति को अपने कब्जे में ले लेना चाहिए।

गौरतलब है कि सिर्फ राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को ही कार्यकाल के बाद भी सरकारी आवास देने का प्रावधान है। 1997 में बनाए गए नियम के तहत पूर्व मुख्यमंत्रियों को लखनऊ में टाइप-चार सरकारी आवास देने का प्रावधान था।

राजनाथ, मुलायम और मायावती के अलावा कल्याण सिंह, नारायण दत्त तिवारी और राम नरेश यादव को भी ऐसे मकान मिले हुए हैं। अदालत ने यह कहा बिना उचित सोच-विचार के सरकारी संपत्तियों को इधर-उधर नहीं बांटा जाना चाहिए।

अगर कोई विशेष प्रावधान न हो और सरकारी आवास किसी को आवंटित किया जाए तो उससे बाजार के हिसाब से किराया वसूला जाना चाहिए। 

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