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Supreme Court: टूटे रिश्तों को दुष्कर्म बताने की आदत चिंताजनक, शीर्ष अदालत ने कहा- अपराध की गंभीरता कम होती है
Tue, 25 Nov 2025 12:51 AM IST
शिवम गर्ग
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: शिवम गर्ग
Updated Tue, 25 Nov 2025 12:51 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि टूटे रिश्तों को दुष्कर्म बताने की बढ़ती प्रवृत्ति चिंताजनक है। इससे गंभीर अपराध की गंभीरता कम होती है और न्याय प्रणाली का दुरुपयोग होता है।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने नाकाम या टूटे रिश्तों को दुष्कर्म या अन्य अपराध का रूप दिए जाने को परेशान करने वाली आदत बताते हुए कहा कि ऐसे मामले में आपराधिक न्याय प्रणाली का गलत इस्तेमाल चिंता की बात है। ऐसे ही दुष्कर्म के एक आरोप में एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, हर खराब रिश्ते को दुष्कर्म का जुर्म बताना न सिर्फ अपराध की गंभीरता को कम करता है, बल्कि आरोपी पर कभी न मिटने वाला कलंक लगाता है और गंभीर अन्याय करता है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि दुष्कर्म का अपराध सबसे गंभीर किस्म का है और इसे सिर्फ उन्हीं मामलों में लगाया जाना चाहिए जहां असल में, जबरदस्ती या बिना सहमति के यौन हिंसा हुई हो।
पीठ ने कहा, एक अच्छे रिश्ते के दौरान बने शारीरिक संबंधों को सिर्फ इसलिए दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता क्योंकि रिश्ता शादी में नहीं बदल पाया। हालांकि पीठ ने यह भी कहा कि कानून को उन असली मामलों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए जहां भरोसा टूटा हो और इज्जत का उल्लंघन हुआ हो। कोर्ट ने कहा, इस कोर्ट ने कई मौकों पर इस परेशान करने वाली आदत पर ध्यान दिया है, जिसमें नाकाम या टूटे हुए रिश्तों को अपराध का रंग दे दिया जाता है।
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शीर्ष कोर्ट ने एक शख्स की अपील पर अपने फैसले में यह टिप्पणी की। इस शख्स ने बॉम्बे हाई कोर्ट के मार्च, 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें छत्रपति संभाजीनगर में अगस्त 2024 में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की उसकी अर्जी खारिज कर दी गई थी। शीर्ष कोर्ट ने कहा, इस मामले में दुष्कर्म का आरोप पूरी तरह शिकायतकर्ता महिला के इस दावे पर टिका है कि आदमी ने शादी का झूठा भरोसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
तीन साल तक चला रिश्ता
पीठ ने कहा, हमें लगता है कि यह मामला ऐसा नहीं है जिसमें अपीलकर्ता ने प्रतिवादी महिला को सिर्फ शारीरिक सुख के लिए फुसलाया और फिर गायब हो गया। यह रिश्ता तीन साल तक चला, जो लंबा समय है। पीठ ने कहा, ऐसे मामलों में, एक सही चलते रिश्ते के दौरान हुई शारीरिक निकटता को सिर्फ इसलिए दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता क्योंकि रिश्ता शादी में नहीं बदल पाया।
दुष्कर्म के असली मामलों के प्रति संवेदनशील होना जरूरी
पीठ ने कहा, हमें इस बात का एहसास है कि हमारे देश में शादी का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है। ऐसे में कानून को उन असली मामलों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए जहां भरोसा तोड़ा गया हो और इज्जत को ठेस पहुंचाई गई हो, ताकि पहले के भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (दुष्कर्म के लिए सजा) का सुरक्षा का दायरा असल में परेशान लोगों के लिए सिर्फ एक औपचारिकता बनकर न रह जाए। साथ ही, इस सिद्धांत का इस्तेमाल भरोसेमंद सबूतों और ठोस तथ्यों पर आधारित होना चाहिए, न कि बिना सबूत वाले आरोपों या नैतिक अंदाजों पर।
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प्राथमिकी से ही पता चलता है कि रिश्ता सहमति से बना था
पीठ ने कहा, हाईकोर्ट यह समझने में नाकाम रहा कि प्राथमिकी को सीधे पढ़ने से ही पता चलता है कि पार्टियों के बीच रिश्ता असल में आपसी सहमति से बना था। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जिन कामों की शिकायत की गई है, वे उस समय अपनी मर्जी से बने रिश्ते के दायरे में हुए थे। प्राथमिकी और आरोपपत्र रद्द करते हुए पीठ ने कहा, ऐसे मामलों में अभियोजन जारी रखना कोर्ट मशीनरी का गलत इस्तेमाल करने जैसा होगा।
यह है मामला
अभियोजन के मुताबिक, एक महिला ने अपने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी और बाद में एलिमनी/मेंटेनेंस की मांग करते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। इसी सिलसिले में वह अपीलकर्ता शख्स से मिली जो वकील है। समय के साथ, उनके बीच करीबी रिश्ता बन गया। महिला का कहना था कि संबंधित व्यक्ति ने उससे शादी की इच्छा जताई थी, लेकिन तब शादीशुदा जीवन में परेशानियों के कारण, उसने प्रस्ताव ठुकरा दिया। बाद में महिला गर्भवर्ती हो गई। उसका गर्भपात करा दिया गया। बाद में महिला ने शादी के लिए दबाव बनाया लेकिन तब अपीलकर्ता ने इससे इंकार कर दिया।
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जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि दुष्कर्म का अपराध सबसे गंभीर किस्म का है और इसे सिर्फ उन्हीं मामलों में लगाया जाना चाहिए जहां असल में, जबरदस्ती या बिना सहमति के यौन हिंसा हुई हो।
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पीठ ने कहा, एक अच्छे रिश्ते के दौरान बने शारीरिक संबंधों को सिर्फ इसलिए दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता क्योंकि रिश्ता शादी में नहीं बदल पाया। हालांकि पीठ ने यह भी कहा कि कानून को उन असली मामलों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए जहां भरोसा टूटा हो और इज्जत का उल्लंघन हुआ हो। कोर्ट ने कहा, इस कोर्ट ने कई मौकों पर इस परेशान करने वाली आदत पर ध्यान दिया है, जिसमें नाकाम या टूटे हुए रिश्तों को अपराध का रंग दे दिया जाता है।
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शीर्ष कोर्ट ने एक शख्स की अपील पर अपने फैसले में यह टिप्पणी की। इस शख्स ने बॉम्बे हाई कोर्ट के मार्च, 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें छत्रपति संभाजीनगर में अगस्त 2024 में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की उसकी अर्जी खारिज कर दी गई थी। शीर्ष कोर्ट ने कहा, इस मामले में दुष्कर्म का आरोप पूरी तरह शिकायतकर्ता महिला के इस दावे पर टिका है कि आदमी ने शादी का झूठा भरोसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
तीन साल तक चला रिश्ता
पीठ ने कहा, हमें लगता है कि यह मामला ऐसा नहीं है जिसमें अपीलकर्ता ने प्रतिवादी महिला को सिर्फ शारीरिक सुख के लिए फुसलाया और फिर गायब हो गया। यह रिश्ता तीन साल तक चला, जो लंबा समय है। पीठ ने कहा, ऐसे मामलों में, एक सही चलते रिश्ते के दौरान हुई शारीरिक निकटता को सिर्फ इसलिए दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता क्योंकि रिश्ता शादी में नहीं बदल पाया।
दुष्कर्म के असली मामलों के प्रति संवेदनशील होना जरूरी
पीठ ने कहा, हमें इस बात का एहसास है कि हमारे देश में शादी का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है। ऐसे में कानून को उन असली मामलों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए जहां भरोसा तोड़ा गया हो और इज्जत को ठेस पहुंचाई गई हो, ताकि पहले के भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (दुष्कर्म के लिए सजा) का सुरक्षा का दायरा असल में परेशान लोगों के लिए सिर्फ एक औपचारिकता बनकर न रह जाए। साथ ही, इस सिद्धांत का इस्तेमाल भरोसेमंद सबूतों और ठोस तथ्यों पर आधारित होना चाहिए, न कि बिना सबूत वाले आरोपों या नैतिक अंदाजों पर।
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प्राथमिकी से ही पता चलता है कि रिश्ता सहमति से बना था
पीठ ने कहा, हाईकोर्ट यह समझने में नाकाम रहा कि प्राथमिकी को सीधे पढ़ने से ही पता चलता है कि पार्टियों के बीच रिश्ता असल में आपसी सहमति से बना था। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जिन कामों की शिकायत की गई है, वे उस समय अपनी मर्जी से बने रिश्ते के दायरे में हुए थे। प्राथमिकी और आरोपपत्र रद्द करते हुए पीठ ने कहा, ऐसे मामलों में अभियोजन जारी रखना कोर्ट मशीनरी का गलत इस्तेमाल करने जैसा होगा।
यह है मामला
अभियोजन के मुताबिक, एक महिला ने अपने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी और बाद में एलिमनी/मेंटेनेंस की मांग करते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। इसी सिलसिले में वह अपीलकर्ता शख्स से मिली जो वकील है। समय के साथ, उनके बीच करीबी रिश्ता बन गया। महिला का कहना था कि संबंधित व्यक्ति ने उससे शादी की इच्छा जताई थी, लेकिन तब शादीशुदा जीवन में परेशानियों के कारण, उसने प्रस्ताव ठुकरा दिया। बाद में महिला गर्भवर्ती हो गई। उसका गर्भपात करा दिया गया। बाद में महिला ने शादी के लिए दबाव बनाया लेकिन तब अपीलकर्ता ने इससे इंकार कर दिया।
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