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Supreme Court: 'कुलपति के बायोडाटा में शामिल किए जाएं यौन उत्पीड़न के आरोप', सुप्रीम कोर्ट ने दिया निर्देश

Sat, 13 Sep 2025 08:45 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Sat, 13 Sep 2025 08:45 PM IST
सार

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी गलत करने वाले को माफ किया जा सकता है, लेकिन उसकी गलती को नहीं भुलाया जाना चाहिए। अदालत ने निर्देश दिया कि कुलपति पर यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़ा फैसला उनके बायोडाटा का हिस्सा बनाया जाए, ताकि यह गलती हमेशा याद रहे। 

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SC directs VC to make case of alleged harassment against him part of his resume
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को कहा कि किसी गलत करने वाले को माफ किया जा सकता है, लेकिन उसकी गलती को नहीं भुलाया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक विश्वविद्यालय के कुलपति (वीसी) के खिलाफ यौन उत्पीड़न के एक मामले की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस मामले से जुड़ा उसका फैसला कुलपति के बायोडाटा का हिस्सा बनाया जाए, ताकि यह आरोप हमेशा उसका पीछा करता रहे।
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यह मामला पश्चिम बंगाल के एक विश्वविद्यालय की एक महिला संकाय सदस्य (फैकल्टी मेंबर) की ओर से दिसंबर 2023 में दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने कुलपति पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले शामिल थे। कोर्ट ने यह भी कहा कि कोलकाता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने यह तय करने में कोई गलती नहीं की कि शिकायत समयसीमा से बाहर थी और इसलिए उसे खारिज किया जाना उचित था। 
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सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी आधार पर शिकायत को खारिज करने की प्रक्रिया को सही माना, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि घटना को भुलाया नहीं जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा, यह जरूरी है कि इस तरह की घटनाएं, भले ही माफ कर दी जाएं, लेकिन गलत करने वाले के लिए यह हमेशा एक स्मृति के रूप में बनी रहे। इसलिए कोर्ट ने आदेश दिया कि कुलपति के बायोडाटा में इस फैसले को शामिल करना अनिवार्य होगा और इसकी जिम्मेदारी कुलपति की व्यक्तिगत होगी।

कोर्ट ने शिकायत की समयसीमा को लेकर बताया कि शिकायतकर्ता ने दिसंबर 2023 में लोक शिकायत समिति (एलसीसी) के पास शिकायत दर्ज कराई थी। लेकिन एलसीसी ने इसे खारिज कर दिया क्योंकि आखिरी कथित यौन उत्पीड़न अप्रैल 2023 में हुआ था और यह शिकायत तीन महीने की तय सीमा और छह महीने की अधिकतम बढ़ाई जा सकने वाली सीमा, दोनों से बाहर थी। 

शिकायत खारिज होने के बाद महिला संकाय ने हाईकोर्ट का रुख किया। मई 2024 में हाईकोर्ट के एकल जज ने एलसीसी के आदेश को रद्द कर दिया और मामले की दोबारा सुनवाई का आदेश दिया। इसके खिलाफ कुलपति ने डिवीजन बेंच में अपील की, जिसने दिसंबर 2024 में एकल जज के फैसले को पलटते हुए शिकायत को समयसीमा से बाहर माना। डिवीजन बेंच ने यह भी माना कि अप्रैल 2023 के बाद जो प्रशासनिक फैसले महिला संकाय के खिलाफ लिए गए, वे केवल कुलपति के नहीं, बल्कि कार्यकारी परिषद के सामूहिक निर्णय थे, जिसमें वरिष्ठ शिक्षाविद, न्यायविद और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के जज भी शामिल थे।


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सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत के विवरण का जिक्र करते हुए बताया कि कुलपति ने सितंबर 2019 में शिकायतकर्ता को अपने कार्यालय में बुलाया और यह कहकर उनके साथ रात्रिभोज पर चलने के लिए कहा कि इससे उन्हें व्यक्तिगत रूप से लाभ होगा। शिकायत में यह भी कहा गया कि जब उन्होंने मना किया और सिर्फ पेशेवर संबंध बनाए रखने की बात कही, तो कुलपति ने कथित तौर पर उनसे यौन संबंध की मांग की और चेतावनी दी कि मना करने पर उन्हें नुकसान होगा।

कोर्ट ने माना कि अगर शिकायत को पूरी तरह पढ़ा जाए तो पता चलता है कि यह सब सितंबर 2019 से शुरू हुआ और आखिरी घटना अप्रैल 2023 में हुई थी। ऐसे में शिकायत निश्चित रूप से देरी से दर्ज की गई थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगस्त 2023 में शिकायतकर्ता को किसी पद से हटाना एक प्रशासनिक फैसला था और इसे यौन उत्पीड़न के मामले से नहीं जोड़ा जा सकता। ऐसे फैसले लिंग के आधार पर शत्रुतापूर्ण माहौल नहीं बनाते, इसलिए इन्हें यौन उत्पीड़न की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

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