SC: पंचायतों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व वाली याचिका पर विचार करने से इनकार, सरकार से संपर्क करने की दी अनुमति
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि विधायिका ने 30 साल पहले कानून पारित किया था, लेकिन कार्यपालिका इसे लागू करने में विफल रही है और शीर्ष अदालत इस मुद्दे को देखने के लिए एक समिति के गठन का निर्देश दे सकती है।
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें पंचायतों में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण का मुद्दा उठाया और दावा किया कि इन चुनावों में प्रतिनिधि (Proxy) प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जहां पुरुष महिलाओं के पीछे काम कर रहे हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पंचायती राज मंत्रालय को प्रतिवेदन देने की अनुमति दी। न्यायमूर्ति एसके कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने याचिकाकर्ता, उत्तर प्रदेश स्थित सामाजिक स्टार्ट-अप के वकील से कहा, हम कार्यकारी प्राधिकारी नहीं हैं।
याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ को बताया कि याचिका संविधान (73वां संशोधन) अधिनियम, 1992 से संबंधित है जो ग्रामीण स्व-सरकारी निकायों में जमीनी स्तर पर महिलाओं के प्रतिनिधित्व से संबंधित है।
वकील ने कहा कि विधायिका ने 30 साल पहले कानून पारित किया था, लेकिन कार्यपालिका इसे लागू करने में विफल रही है और शीर्ष अदालत इस मुद्दे को देखने के लिए एक समिति के गठन का निर्देश दे सकती है।
पीठ ने कहा, आप कहते हैं कि यह प्रतिनिधि द्वारा किया जा रहा है। क्या हम महिलाओं को चुनाव लड़ने से रोक सकते हैं? साथ ही पीठ ने कहा कि यह एक विकासवादी प्रक्रिया है। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि क्या उन्होंने इस बारे में किसी सरकारी विभाग को कोई प्रतिवेदन दिया है। पीठ ने कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे का कोई समाधान नहीं है या कोई समाधान प्रस्तावित नहीं है।
पीठ ने कहा, हमारा मानना है कि यह अदालत का कार्य नहीं है। हमें लगता है कि याचिकाकर्ता की शिकायत पर गौर करना प्रतिवादी- पंचायती राज मंत्रालय का काम है...। शीर्ष अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को इस मुद्दे पर मंत्रालय को प्रतिवेदन देने की अनुमति दी। याचिका में ऐसे आरोप लगाए गए हैं कि संशोधित कानून के तहत महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होने के बाद पंचायती राज संस्थाओं की महिला सदस्यों के पतियों या अन्य पुरुष रिश्तेदारों ने वास्तविक शक्ति का इस्तेमाल किया।