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SC ने कहा- यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चों की काउंसलिंग प्रशिक्षित मनोविज्ञानी करें, शिक्षा राज्य की जिम्मेदारी

Thu, 12 Oct 2023 03:57 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ज्योति भास्कर Updated Thu, 12 Oct 2023 03:57 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यौन उत्पीड़न के शिकार नाबालिगों की काउंसलिंग प्रशिक्षित मनोविज्ञानी को करनी चाहिए। देश की शीर्ष अदालत ने कहा कि काउंसलिंग सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी लीगल सर्विसेज अथॉरिटीज की है।

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SC child molestation survivors counselling trained psychologist education state duty
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

विस्तार

यौन उत्पीड़न के शिकार नाबालिगों की काउंसलिंग के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि राज्यों के कानूनी सेवा प्राधिकरण को नाबालिगों की काउंसलिंग की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। कोर्ट ने कहा, प्राधिकरण को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि काउंसलिंग प्रशिक्षित मनोविज्ञानी करें।
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कोर्ट ने बताई राज्य सरकार की जवाबदेही
जस्टिस अभय एस ओका और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल की पीठ ने कहा कि जिन मासूमों का यौन उत्पीड़न हुआ है उन्हें सदमे से बाहर निकालने के लिए काउंसलिंग जरूरी है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में काउंसलिंग के लिए चाइल्ड काउंसलर या प्रशिक्षित मनोविज्ञानी की मदद लेनी चाहिए। कोर्ट ने ये भी कहा कि ऐसे बच्चों की शिक्षा में कोई रुकावट नहीं आए, ये सुनिश्चित करना भी राज्य सरकार की जवाबदेही है।
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आघात से उबरने और बेहतर जीवन में मदद मिलेगी
पीठ ने कहा कि जब भी कोई बच्चा यौन उत्पीड़न का शिकार होता है, तो राज्य सरकार या प्रदेश के कानूनी सेवा प्राधिकरणों को प्रशिक्षित बाल परामर्शदाता या बाल मनोवैज्ञानिक की मदद लेनी चाहिए। कोर्ट ने कहा, ऐसे पीड़ितों को परामर्श की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए। इससे पीड़ित बच्चों को आघात से बाहर आने में मदद मिलेगी। काउंसलिंग की मदद से बच्चे भविष्य में बेहतर जीवन जीने में सक्षम बन पाएंगे।
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बेटी-बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के तहत लड़कियों का पुनर्वास
अदालत ने कहा कि बाल यौन उत्पीड़न के शिकार पीड़ितों के आसपास का सामाजिक माहौल हमेशा पुनर्वास के लिए अनुकूल नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया, ऐसे मामलों में सिर्फ आर्थिक मुआवजा ही काफी नहीं है। सिर्फ मुआवजा देने से सही मायनों में पुनर्वास नहीं होगा। शायद पीड़ित लड़कियों का पुनर्वास केंद्र सरकार के 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' अभियान का हिस्सा होना चाहिए।"

पीड़ितों का पुनर्वास राज्य का कर्तव्य 
दो जजों की पीठ ने सरकारों को संविधान के तहत वेलफेयर स्टेट करार दिया और कहा, पीड़ितों का पुनर्वास सरकार का कर्तव्य है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम निर्देश दे रहे हैं कि इस फैसले की प्रतियां राज्य के संबंधित विभागों के सचिवों को भेजी जानी चाहिए।

14 साल की सजा काटनी होगी
गौरतलब है कि शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी राजस्थान सरकार की तरफ से दायर एक याचिका पर की। इसमें राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने एक बच्ची से बलात्कार के दोषी को दी गई सजा को उम्रकैद से घटाकर 12 साल कर दिया गया था। उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए, शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि दोषी को बिना किसी छूट के 14 साल की सजा काटनी होगी।

राजस्थान सरकार को निर्देश-
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, हम राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देते हैं कि संबंधित पीड़ित मुआवजा योजना के तहत यदि मुआवजे का भुगतान नहीं किया गया है तो पीड़ित को उसकी पात्रता के अनुसार मुआवजा तुरंत दिया जाए। 

गिरफ्तारी पर कोर्ट ने क्या कहा?
पीठ ने कहा, यदि दोषी को उच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार सजा भुगतने के बाद रिहा किया जा चुका है, तो उसे तुरंत गिरफ्तार किया जाएगा और शीर्ष अदालत के फैसले के अनुसार 14 साल की कैद में बाकी सजा भुगतने के लिए जेल भेजा जाएगा।

ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने दोषी की जाति क्यों बताई
शीर्ष अदालत ने इस मामले के टाइटल में दोषी की जाति का उल्लेख किए जाने पर भी हैरानी जताई। कोर्ट ने कहा कि मुकदमे के टाइटल में किसी वादी की जाति या धर्म का उल्लेख कभी नहीं किया जाना चाहिए। जब अदालत किसी मामले की सुनवाई करती है तो आरोपी का कोई जाति या धर्म नहीं होता है। हम यह समझने में असफल हैं कि उच्च न्यायालय और ट्रायल कोर्ट के निर्णयों में आरोपी की जाति का उल्लेख क्यों किया गया है?


जाति-धर्म के उल्लेख पर SC का अहम आदेश
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, "फैसले के वाद शीर्षक (Cause Title) में किसी मुकदमेबाज की जाति या धर्म का उल्लेख कभी नहीं किया जाना चाहिए।" शीर्ष अदालत ने 14 मार्च, 2023 के अपने आदेश का जिक्र करते हुए दोहराया, "अदालत स्पष्ट कर चुकी है कि इस तरह की प्रथा का पालन कभी नहीं किया जाना चाहिए।"
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