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पॉक्सो में 'रोमियो-जूलियट प्रावधान' क्यों जरूरी?: कानून के दुरुपयोग पर कोर्ट चिंतित, सरकार को दिया सुझाव

Fri, 09 Jan 2026 09:10 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 09 Jan 2026 09:10 PM IST
सार

पॉक्सो कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि वास्तविक किशोर प्रेम संबंधों को अपराध की श्रेणी में डालना ठीक नहीं है। इसलिए केंद्र को 'रोमियो-जूलियट' प्रावधान को जोड़ने पर विचार करना चाहिए।

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SC asks Centre to introduce Romeo-Juliet clause in POCSO to save genuine teen relationships
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : पीटीआई (फाइल)

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) के व्यापक दुरुपयोग पर संज्ञान लिया। शीर्ष कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह इस समस्या पर रोक लगाने के लिए कानून में 'रोमियो-जूलियट' नियम जोड़े, ताकि वास्तविक किशोर प्रेम संबंधों को इसके कड़े प्रावधानों से बाहर रखा जा सके। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि पॉक्सो मामलों में जमानत के दौरान हाईकोर्ट पीड़ित की उम्र का अनिवार्य मेडिकल परीक्षण कराने का आदेश नहीं दे सकता। 
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केंद्र को सुप्रीम कोर्ट ने क्या सुझाव दिया
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की बेंच ने कहा, इन कानूनों के दुरुपयोग को लेकर कई बार न्यायिक संज्ञान लिया गया है। इस फैसले की एक प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाए, ताकि इस समस्या पर रोक लगाने के लिए जरूरी कदमों पर विचार किया जा सके। इसमें वास्तविक किशोर प्रेम संबंधों को इस कानून के दायरे से बाहर रखने के लिए 'रोमियो-जूलियट' नियम जोड़ना और ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की व्यवस्था करना शामिल है, जो इन कानूनों का इस्तेमाल निजी बदले या हिसाब-किताब चुकता करने के लिए करते हैं। 
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शीर्ष कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश क्यों रद्द किया?
हालांकि, बेंच ने इस कानून को टन्याय की सबसे पवित्र अभिव्यक्तियों में से एक' बताया, जिसका उद्देश्य आज के बच्चों और कल के नेताओं की रक्षा करना है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत के दौरान पीड़ित की उम्र का मेडिकल परीक्षण कराने का निर्देश देना दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 439 के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट अपनी जमानत संबंधी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 'मिनी ट्रायल' नहीं चला सकते और न ही ऐसे अनिवार्य जांच निर्देश दे सकते हैं, जो मौजूदा कानूनों के विपरीत हों।


पॉक्सों मामलों में सबूतों से छेड़छाड़ पर शीर्ष कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने आज यह भी कहा कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में जमानत मिलने के बाद सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित किए जाने की आशंका एक वास्तविक और गंभीर चिंता है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने यह टिप्पणी उस समय की, जब उसने उत्तर प्रदेश के शामली के एक युवक को इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से दी गई जमानत को रद्द कर दिया। युवक पर आरोप है कि उसने हथियार के बल पर एक नाबालिग के साथ कई बार दुष्कर्म किया और ब्लैकमेल करने के लिए इस कृत्य का वीडियो भी रिकॉर्ड किया।

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न्याय प्रक्रिया की शुचिका बनाए रखना सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट
शीर्ष कोर्ट ने कहा, पीड़ित की सुरक्षा और न्याय प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखना सर्वोपरि है। कोर्ट ने कहा कि जमानत याचिका पर विचार करते समय अदालत का कर्तव्य है कि वह अपराध की प्रकृति और उसकी गंभीरता के साथ-साथ जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री को भी ध्यान में रखे। कोर्ट ने यह भी कहा, यह बात भी अच्छी तरह स्थापित है कि जमानत को तकनीकी रूप से न तो खारिज किया जाना चाहिए और न ही असंगत आधारों पर या महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी करके दी जानी चाहिए। 

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