ए बुरी नजर वालों... जगह मिलने पर साइड दिया जाएगा
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कुछ संवाद जो शोले के 'कितने आदमी थे' से भी अधिक प्रसिद्ध हुए है, वे प्राय: ट्रकों और बसों के पीछे लिखे पाए जाते हैं। 'हॉर्न ओके प्लीज', 'जगह मिलने पर साइड दिया जाएगा' अथवा 'हंस मत पगली प्यार हो जाएगा' इनमें से कुछ प्रचलित उदाहरण हैं। परंतु इनमें सर्वाधिक विवादास्पद वक्तव्य है, 'बुरी नजर वाले, तेरा मुंह काला'। अत: इस समय, अन्य किसी मुद्दे के अभाव में, हम इसी व्यर्थ के विषय पर अनर्गल चर्चा करेंगे एवं बेतुकी दलीलों से अपनी बात सिद्ध करेंगे।
यह तो अच्छा है कि इस दुनिया से मार्टिन लूथर किंग और मंडेला जैसे महान आत्माओं का प्रयाण हो गया, अन्यथा हमारे इन ट्रक चालकों का रंगभेद नीति के अंतर्गत एक चालान और कट जाता। इस वाक्य का सृजन किस महानुभाव ने किया, ज्ञात नहीं, पर यदि वे अपने कार्य का पेटेंट करवा लेते तो 'प्रत्येक उपयोग पर रॉयल्टी' की दर से नगर के अतिधनाढ्यों में अपना नाम लिखवा कर ही दम लेते। वैसे यह अज्ञात सुधी संवाद-लेखक कहना क्या चाहता है? जिनकी नजर बुरी होती है, उनका चेहरा काला हो जाता है? यह कैसा श्राप, यह कैसा न्याय?
दरअसल, यह तो मूलत: काले चेहरे वालों के ऊपर गंभीर आरोप है। क्या वे बुरी नजर ले कर ही जन्म लेते हैं? मानो बुरी नजर एक सामाजिक बुराई न होकर, कोई आनुवांशिक बीमारी हो गई। हम भारतीयों से अधिक और कौन जानता है की गोरे चेहरों की नजरें भी कितनी काली होती हैं। हमने तो दो सौ सालों तक भुगता है और आज भी भुगत ही रहे हैं। पर उनका मुंह तो आज भी लुटे हुए कोहिनूर के तेज सा चमक रहा है, कभी काला तो होते हमने नहीं देखा। कदाचित इसीलिए, हमारा गोरी चमड़ी के प्रति अटूट मोह 70 वर्षों के बाद भी यथावत है। शोध का विषय है, क्या ट्रक के पीछे लिखे इन शब्दों का समाज की मानसिकता पर इतना गहरा प्रभाव हो सकता है? अथवा यह समाज की मानसिकता है जिसने हर बस और ट्रक के पीछे अपनी जगह बना ली है?
कौतुहल का विषय है कि सुप्रसिद्ध गीत, 'मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे' में गायिका इतनी विशिष्ट प्रार्थना क्यों कर रही है। यह सबरीमाला के मंदिर की घटना से प्रेरित विद्रोही गायिका समाज में अनादि काल से स्थापित नियमों के विरुद्ध कैसे जा सकती है। जहां संपूर्ण भारत, अपने श्याम वर्ण पर हीनता से ग्रस्त है वहां कोई मानसिक विक्षिप्त या उन्मादी ही ऐसी प्रार्थना कर सकता है। हां, यदि संविधान में 'श्याम वर्णियों' को पृथक आरक्षण की सुविधा होती, तो संभव है, कई गौरव-वर्णी वर्ग, चुनावों के आस पास, बसें जलाकर और ट्रेन रोक कर अपना रंग बदलने की याचना करते।
यह एक मुहावरा है पर आपत्ति भी इसी से है
यदि सरकारें किसी अन्य मुद्दे पर घिरी होतीं, तो संभव है कुछ सौभाग्यशाली अभागों को यह सुविधा मिल भी जाती, अन्य आंदोलन चुनाव समाप्ति के पश्चात ठंडे पड़ जाते। और इस पूरी प्रक्रिया में चुनिंदा उत्पाती छुट-भइये नेता अपनी काली मनसिकता और उससे भी काले चरित्र को उज्ज्वल करने में सफल हो जाते।
मुझे ज्ञात है, 'मुंह काला होना' होना मात्र एक मुहावरा है, पर महोदय, मेरी आपत्ति भी इसी से है। जो हम पहले से ही हैं, उसे मुहावरे में प्रयुक्त कर हमें क्यों निंदा के पात्र बनाना चाह रहे हैं? यदि गुस्से में चेहरा लाल पीला, लज्जा में लाल, और भय में नीला हो सकता है, तब बुरी नजर रखने वाले दुष्ट व्यक्ति का मुंह बैंगनी क्यों नहीं हो सकता। इससे एक कड़ा संदेश भी साथ जाएगा, कि ऐसे दुष्ट व्यक्ति का बैंगन की तरह ही भर्ता भी बनाया जा सकता है। ऐसे घृणित व्यक्ति की दूर से ही पहचान भी की जा सकती है, नहीं तो अब तक बुरी नजर वाले काले व्यक्ति समाज के अन्य भद्र किंतु 'काले' मनुष्यों में सुलभता से घुल मिल जाते हैं।
समाज में स्वयं को कम काला घोषित करने की होड़ वास्कोडिगामा के जहाज के भारतीय तट पर लंगर डालने के तुरंत बाद ही आरंभ हो गई थी। अंग्रेजों के जमाने में हम स्वयं को 'ब्राउन' साबित कर उच्च पद पाना चाहते थे। और अब भी, गोरापन लाने की क्रीमों से दुकानें पटी पड़ी हैं। किसी तरह हमारा चेहरा कम काला हो जाये, इसकी होड़ मची हुई है। वैवाहिकी विज्ञापन के लिए एक नए रंग की खोज भी की गई - 'गेंहुआ' - इसके क्या उद्देश्य हैं और ये किस रंग विशेष को इंगित करता है, मुझे इसकी समझ नहीं। पर इस मानसिकता से पूरे समाज में किस स्तर तक निराशा, हीनता व दुर्भावना फैली है, इसका मुझे भान अवश्य है। ये कैसा समाज है मित्रों, जहां बुरी नजर होना तो स्वीकार्य है परंतु काला चेहरा होना एक अभिशाप!
अत: सम्माननीय सदस्यों के समक्ष मैं प्रस्ताव रखता हूं कि आने वाले समय में, 'बुरी नजर वाले, तेरा बेटा जिए और बड़ा होकर तेरा खून पिये' का समर्थन करें और उज्ज्वल देश के काले लोगों का उत्साहवर्धन करें। वह गीत तो आपको याद है न, 'हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं'। सोलह आने सच!
॥इति॥
लेखक परिचय:
डॉ. आशीष जैन,
वरिष्ठ परामर्शदाता
श्वास रोग विभाग
मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल
साकेत, नई दिल्ली