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शिवसेना बोली- अगर आपातकाल काला दिवस है तो मौजूदा सरकार में कई काले दिवस हैं

Mon, 02 Jul 2018 10:09 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 02 Jul 2018 10:09 AM IST
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Sanjay Raut said contribution of Indira cannot be ignored just because of her emergency decision
संजय राउत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा द्वारा आपातकाल के मुद्दे को उठाने पर शिवसेना के सांसद संजय राउत ने निशाना साधा है। रविवार को उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री के योगदान को केवल 1975 में लिए गए एक निर्णय की वजह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इंदिरा लोकतंत्र समर्थक थीं। इसी वजह से 1977 में आपातकाल हटाने के बाद उन्होंने चुनाव करवाए थे।

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अपने साप्ताहिक मुखपत्र सामना में राउत ने कहा कि यह राजद्रोह होगा अगर राष्ट्रीय नेताओं जैसे जवाहर लाल नेहरु, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, बीआर अंबेडकर, नेताजी बोस और वीर सावरकर के योगदान को खारिज कर दिया जाए। इस देश में किसी ने भी स्वर्गीय इंदिरा गांधी जितना प्रदर्शन नहीं किया है। केवल आपातकाल लगाने की वजह से उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। हर सरकार को परिस्थितिजन्य कुछ निर्णय लेने पड़ते हैं। कौन फैसला लेगा कि क्या सही है और क्या गलत? आपातकाल भूल जाना चाहिए।
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राउत ने कहा, 'यदि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा उस समय लगाए गए आपातकाल को काला दिवस कहा जाता है तो मौजूदा केंद्र सरकार में कई काले दिवस हैं। जिस दिन नोटबंदी की घोषणा हुई उसे भी काला दिन कहा जाना चाहिए क्योंकि उसकी वजह से आर्थिक अराजकता पैदा हुई थी।' राउत ने कहा कि बहुत से गरीब लोगों को नोटबंदी की वजह से कुछ दिनों के लिए अपनी नौकरी गंवानी पड़ी थी। छोटे व्यापारियों को काफी नुकसान हुआ था। वहीं अमीर लोगों का पैसा व्हाइट में बदला गया।
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शिवसेना सांसद ने कहा, 'प्रधानमंत्री मोदी ने दावा किया था कि नोटबंदी की वजह से काला धन निकलेगा। हालांकि काले धन की बजाए कई लोग लाइनों में खड़े होकर मर गए। भाजपा सरकार ने वादा किया था कि वह जम्मू-कश्मीर में हिंसा को रोक देगी लेकिन वहां पहले के मुकाबले हिंसा बढ़ गई है। एक बैंक जिसमें कि भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह निदेशक हैं वहां नोटबंदी के बाद 575 करोड़ रुपए के पुराने नोट केवल पांच दिनों में लाए जाते हैं। नोटबंदी के प्रभाव से अर्थव्यवस्था अभी तक पूरी तरह से उबर नहीं पाई है। आपातकाल में प्रेस की स्वतंत्रता को दबाया गया था। आज जो कुछ भी हो रहा है वो चार दशक पुराने आपातकाल से अलग नहीं हैं।'

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