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लॉकडाउन के चलते खेतों में मजदूरी करने को मजबूर साहित्य अकादमी विजेता लेक्चरर
Fri, 25 Sep 2020 05:48 PM IST
गौरव पाण्डेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पुणे
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पुणे
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Fri, 25 Sep 2020 05:48 PM IST
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : पिक्साबे
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कोरोना वायरस महामारी तो पूरी दुनिया में समस्या का सबब बनी ही है इसके रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन से उपजी समस्याएं भी कम नहीं हैं। लॉकडाउन के चलते जहां बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हुए तो कितने ही क्षेत्रों के लोग भी सड़क पर आ गए। ताजा मामला महाराष्ट्र के सांगली जिले के रहने वाले नवनाथ गोरे का है।
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गोरे अहमदनगर जिले के एक कॉलेज में लेक्चरर थे। लेकिन, कोविड-19 महामारी के प्रसार को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के चलते उनकी अनुबंध वाली नौकरी चली गई। साल 2018 में साहित्य अकादमी युवा लेखक पुरस्कार से सम्मानित किए गए नवनाथ गोरे अब खेतिहर मजदूर का काम करने के लिए मजबूर हैं।
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नौकरी जाने की वास्तविकता को स्वीकार करते हुए उन्होंने अपने परिवार की रोजी-रोटी की जरूरतों को पूरा करने के लिए गृह जिले में खेतिहर मजदूर का काम शुरू कर दिया। सवाल यह उठता है कि यह पुरस्कार भी ऐसे समय में किसी व्यक्ति को कैसे सांत्वना दे सकता है जो महामारी की वजह से बुरी स्थिति में फंस गया हो।
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पढ़ाई के दौरान लिखा था पहला उपन्यास
गोरे के पास कोल्हापुर जिले के शिवाजी विश्वविद्यालय से मराठी में परास्नातक की डिग्री है। उन्होंने परास्नातक की पढ़ाई के दौरान ही अपना पहला उपन्यास 'फेसाटी' लिखना शुरू किया था। यह किताब साल 2017 में प्रकाशित हुई थी और इसके लिए उन्हें अगले साल ही साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
नवनाथ गोने का कहना है कि ' पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद मुझे अहमदनगर जिले के एक कॉलेज से नौकरी की पेशकश हुई। मैंने वहां घंटे के हिसाब से व्याख्याता (लेक्चरर) के रूप में काम करना शुरू किया। इसके लिए मुझे हर महीने 10,000 रुपये की राशि मिल जाती थी।'
इस साल फरवरी में हुआ पिता का निधन
उन्होंने कहा, ' इस साल फरवरी में मेरे पिता का निधन हो गया और मेरी मां और 50 साल के दिव्यांग भाई की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई।' पिता के निधन के बाद गोरे फरवरी में घर गए थे और कोविड-19 महामारी को रोकने के लिए मार्च के अंत में लागू किए गए लॉकडाउन की वजह से वापस कॉलेज नहीं लौट सके।
उन्होंने कहा,' मैं फरवरी में गांव आया था। मेरी नौकरी अनुबंध पर थी, इसलिए कॉलेज से होने वाली कमाई भी रुक गई थी। आय नहीं होने की वजह से जरूरतें पूरी करने में मुश्किलें आने लगीं। तब से मैंने छोटे-मोटे काम करने शुरू किए और क्षेत्र में खेतिहर किसान के रूप में भी काम करना शुरू कर दिया।'
पूरे दिन काम के लिए मिलते हैं 400 रुपये
गोरे काम की तलाश में क्षेत्र में काफी दूर निकल जाते हैं। वह बताते हैं कि अगर वह पूरा दिन काम करते हैं तो उन्हें 400 रुपये मिल जाते हैं। गोरे कोल्हापुर के अपने कॉलेज के दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि परास्नातक की पढ़ाई के दौरान वह अपने परिवार की मदद के लिए एटीएम केंद्र पर गार्ड की नौकरी करते थे।
बता दें कि गोरे की किताब 'फेसाटी', जिसके लिए उन्हों साहित्य अकादमी युवा लेखक पुरस्कार मिला था, भी एक ऐसे ही युवक की कहानी को बयान करती है जो तमाम परेशानियों के बाद भी अपनी पढ़ाई पूरी करता है। इस किताब में किसानों की परेशानियों और उनकी स्थिति को दर्शाया गया है।
महाराष्ट्र के मंत्री ने की मदद की पेशकश
इसी बीच गोरे की स्थिति को देख महाराष्ट्र के मंत्री विश्वजीत कदम ने कहा कि उन्होंने गोरे को पुणे में शैक्षणिक संस्थाओं के समूह में नौकरी की पेशकश की है। कदम, भारती विद्यापीठ के प्रबंधन से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने गोरे से बात की है। उन्हें ऐसा माहौल भी मिलेगा जहां उनकी साहित्यिक प्रतिभा को बढ़ावा मिल सके।